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Medically Verified By: Dr. (Major) Rajesh Bhardwaj
मौसम में बदलाव होने पर गले की परेशानी होना आम बात है।
फिर से गले में दर्द... फिर से बुखार। मौसम में बदलाव होते ही बहुत से लोगों के लिए ये लाइन हर महीने की कहानी बन जाती है। और जब डॉक्टर गले में टॉर्च डालकर देखते हैं तो कहते हैं - टॉन्सिल बढ़े हुए हैं।टॉन्सिल का नाम सुनते ही सबसे पहला सवाल मन में आता है क्या ऑपरेशन करवाना पड़ेगा? अगर आपके साथ भी ऐसा होता है तो बिल्कुल डरिए मत। हर बार टॉन्सिल बढ़ने का मतलब ऑपरेशन नहीं होता है। दिल्ली के मेडफर्स्ट ईएनटी सेंटर के ENT Specialist डॉ. (मेजर) आर. के. भारद्वाज का कहना है कि बढ़े हुए टॉन्सिल के कुछ ही मामलों में ऑपरेशन की जरूरत पड़ती है। तो चलिए जानते हैं कब पड़ती है टॉन्सिल में ऑपरेशन की जरूरत।
डॉ. भारद्वाज बताते हैं कि हमारे गले में पीछे की तरफ दोनों तरफ बादाम के आकार की 2 गिल्टियां होती हैं। इन्हें ही टॉन्सिल कहते हैं। इन्हें आप शरीर का पहला सिक्योरिटी गार्ड समझ लीजिए। नाक और मुंह से जाने वाले बैक्टीरिया और वायरस को ये पहले पकड़ते हैं ताकि वो फेफड़ों तक न पहुंचें। लेकिन दिक्कत तब आती है जब ये खुद ही इंफेक्शन का शिकार हो जाते हैं। इस कंडीशन को मेडिकल भाषा में टॉन्सिलाइटिस कहा जाता है।
टॉन्सिल की परेशानी गंभीर होती है।
टॉन्सिलाइटिस के आम लक्षण हैं
इस सवाल का जवाब देते हुए डॉक्टर बताते हैं कि टॉन्सिल के ऑपरेशन यानी टॉन्सिलेक्टॉमी का फैसला 3 चीजों पर होता है - कितनी बार हुआ, कितना सीवियर था और दवाइयों से फायदा हुआ या नहीं। डॉक्टर आमतौर पर इन 5 स्थितियों में ऑपरेशन की सलाह देते हैं:
किसी व्यक्ति को बार- बार इंफेक्शन हो रहा है तो इस स्थिति में ऑपरेशन करवाने की सलाह ज्यादा दी जाती है। डॉक्टर कहते हैं कि अगर 1 साल में 7 बार से ज्यादा या 2 साल में हर साल 5 बार से ज्यादा, 3 साल में हर साल 3 बार से ज्यादा टॉन्सिलाइटिस हो रहा है, तो डॉक्टर ऑपरेशन सोचते हैं। आसान भाषा में कहें तो हर 2 महीने में एंटीबायोटिक खानी पड़ रही है तो ये नॉर्मल नहीं है।
कई बार इंफेक्शन इतना जिद्दी होता है कि 10-14 दिन की एंटीबायोटिक के बाद भी बुखार और दर्द नहीं जाता। मवाद बन जाता है। इसे पेरिटॉन्सिलर एब्सेस कहते हैं। ऐसी स्थिति में टॉन्सिल निकालना ही एकमात्र रास्ता बचता है।
मौसम में बदलाव होने पर यह परेशानी होना आम बात है।
कुछ बच्चों और बड़ों के टॉन्सिल जन्म से ही बहुत बड़े होते हैं। वो इतने बढ़ जाते हैं कि गले का रास्ता आधा बंद कर देते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि रात में खर्राटे, सांस रुक-रुक कर आना जिसे स्लीप एपनिया कहते हैं और खाना निगलने में दिक्कत हो सकती है। इस स्थिति में भी डॉक्टर ऑपरेशन करवाने की सलाह दे सकते हैं।
अगर सिर्फ एक तरफ का टॉन्सिल बहुत ज्यादा बढ़ जाए, उसमें छाले या सफेद पैच बन जाएं जो ठीक न हों, तो डॉक्टर बायोप्सी के लिए उसे निकालने की सलाह देते हैं। ये बहुत कम होता है पर इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।
कुछ लोगों के टॉन्सिल में छोटे-छोटे सफेद पत्थर जैसे बन जाते हैं। इन्हें टॉन्सिलोलिथ कहते हैं। इनसे मुंह से बहुत बदबू आती है और बार-बार गले में खराश होती है। जब सफाई और दवाओं से आराम न मिले तो आखिरी ऑप्शन ऑपरेशन ही होता है।
इस सवाल का जवाब देते हुए डॉ. भारद्वाज कहते हैं कि टॉन्सिल का ऑपरेशन हर किसी के लिए नहीं है। डॉक्टर इन स्थितियों में टालने की सलाह देते हैं:
डॉक्टर बताते हैं कि टॉन्सिल का ऑपरेशन कोई बहुत बड़ी सर्जरी नहीं है। पर ये भी जरूरी नहीं कि हर गले के दर्द में चाकू चले। अगर टॉन्सिल आपकी रोजमर्रा की जिंदगी खराब कर रहे हैं, स्कूल व ऑफिस छूट रहा है, सांस लेने में दिक्कत है या हर महीने दवा खानी पड़ रही है - तो डॉक्टर से ऑपरेशन के बारे में बात जरूर करें।
Disclaimer: यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है। अगर आपको बार- बार टॉन्सिल की परेशानी हो रही है तो इस बारे में अपने डॉक्टर से बात करें।