पेसमेकर कब लगाया जाता है? जानें कैसे काम करता है यह डिवाइस
हृदय रोगियों के दिल की धड़कन अनियमित होने पर पेसमेकर लगाया जाता है, ताकि इलेक्ट्रिकल सिग्नल सही तरीके से पहुंच सके। इससे मरीज की दिल की धड़कन को सामान्य करने में मदद मिल सकती है।
Pacemaker of Heart: क्या आपने कभी पेसमेकर के बारे में सुना है? अगर नहीं, तो आपको बता दें कि यह एक डिवाइस है जो दिल की धड़कन को सामान्य बनाए रखने का काम करता है। दरअसल, दिल लगातार धड़कता है और पूरी शरीर में खून पहुंचाने का काम करता है। लेकिन, कई बार दिल सामान्य से कम या तेज धड़कता है। यानी दिल की धड़कन अनियमित हो जाती है। ऐसे में कार्डियोलॉजिस्ट (दिल के डॉक्टर) पेसमेकर लगाने की सलाह देते हैं। आइए, जानते हैं कि पेसमेकर कब, कैसे और क्यों लगाया जाता है?
पेसमेकर क्या होता है?
आपको बता दें कि पेसमेकर एक छोटा-सा इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस होता है। इसे छाती के अंदर त्वचा के नीचे लगाया जाता है। यह डिवाइस दिल की धड़कन को नियंत्रित करने का काम करता है। जब दिल की धड़कन धीमी होती है, तब पेसमेकर इलेक्ट्रिकल सिग्नल भेजकर उसे नॉर्मल बनाए रखने में मदद करता है।
पेसमेकर कब लगाया जाता है?
- पेसमेकर हर दिल के मरीज में नहीं लगाया जाता है। डॉक्टर, मरीज की स्थिति के अनुसार ही पेसमेकर लगाते हैं। आमतौर पर इन स्थितियों में मरीज में पेसमेकर लगाया जाता है।
- जब किसी दिल के रोगी की धड़कन 60 से कम हो जाती है और इसकी वजह से व्यक्ति को चक्कर आने, कमजोरी या बेहोशी जैसी समस्याएं होती हैं, तो इस स्थिति में डॉक्टर पेसमेकर लगवा सकते हैं।
- जब हृदय के इलेक्ट्रिकल सिग्नल सही तरीके से नहीं पहुंचते हैं, तो दिल की धड़कन रुक-रुक कर चलती है। इस स्थिति में पेकमेकर की जरूरत पड़ सकती है।
- दिल की धड़कन अनियमित यानी कभी तेज या कभी धीमी, होने पर भी पेसमेकर लगाया जा सकता है।
- जब हृदय रक्त को सही तरीके से पंप नहीं कर पाता है, तब भी पेसमेकर का उपयोग किया जाता है।
- हृदय की सर्जरी के बाद कुछ लोगों की हार्ट बीट को कंट्रोल करने के लिए पेसमेकर लगाया जाता है।
कैसे काम करता है पेसमेकर?
पेसमेकर, हार्ट बीट को मॉनिटर करता है। जैसे ही यह महसूस करता है कि दिल की धड़कन धीमी या अनियमित हो रही है, पेसमेकर तुरंत इलेक्ट्रिकल सिग्नल भेजना शुरू करता है। इससे दिल की धड़कन सामान्य गति से धड़कने लगती है।
पेसमेकर को एक छोटी सर्जरी की मदद से लगाया जाता है। इसमें मरीज को लोकल एनेस्थीसिया दिया जाता है। इस प्रक्रिया में करीब 1 से 2 घंटे का समय लगता है।
पेसमेकर के प्रकार के होते हैं?
आपको बता दें कि पेसमेकर अलग-अलग प्रकार के होते हैं, मरीज की स्थिति के आधार पर पेसमेकर का चुनाव किया जाता है।
- सिंगल चैंबर पेसमेकर: इस पेसमेकर में सिर्फ एक वायर होती है, जिसे आमतौर पर दिल के राइट वेंट्रिकल में लगाया जाता है। जब दिल की धड़कन बहुत धीमी होती है, तब इसका उपयोग किया जाता है।
- ड्यूल चैंबर पेसमेकर: इस पेसमेकर में दो वायर्स होते हैं। इसमें एक अट्रियम के ऊपरी चैंबर और दूसरा वेंट्रिकल के निचले चैंबर में लगाया जाता है। इस पेसमेकर को तब लगाया जाता है, जब अट्रियम और वेंट्रिकल के बीच सही तरीके से सिग्नल नहीं पहुंचता है।
- बायवेंट्रिकुलर पेसमेकर: इस पेसमेकर में तीन वायर होती हैं, जिन्हें राइट अट्रियम, राइट वेंट्रिकल और लेफ्ट वेंट्रिकल में लगाया जाता है। इससे दिल रक्त को सही तरीके से पंप कर पाता है। आमतौर पर हार्ट फेलियर के मरीजों में इस पेसमेकर को लगाया जा सकता है।
पेसमेकर लगने के बाद इन बातों का रखें ध्यान
- पेसमेकर लगने के बाद डॉक्टर से रेगुलर चेकअप करवाना जरूरी होता है।
- इस लगाने के बाद भारी वजन उठाने से बचना चाहिए।
- पेसमेकर लगने के बाद मोबाइल या किसी अन्य इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस को दिल के पास न रखें।
- अगर पेसमेकर लगने के बाद चक्कर आने या सांस फूलने जैसी समस्या महसूस हो तो तुरंत डॉक्टर से कंसल्ट करें।
Disclaimer: पेसमेकर को हृदय रोगियों के लिए एक जीवनरक्षक डिवाइस माना जाता है। जिन लोगों की दिल की धड़कन अनियमित होती है, उनके लिए यह डिवाइस काम करता है। यह व्यक्ति के जीवन की गुणवत्ता में सुधार करता है। अगर आपको पेसमेकर लगाने के बाद बार-बार चक्कर आना, कमजोरी आदि की दिक्कत हो तो तुरंत डॉक्टर के पास जाएं।