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Written By: Atul Modi | Published : October 12, 2022 6:15 PM IST
Thrombosis In Leg: शरीर में डीप वेन थ्रोंबोसिस की स्थिति में ब्लड क्लॉट यानी कि रक्त का थक्का बनता है और यह स्थिति अक्सर निचले पैरों में या घुटने से ऊपर जांघो में हो सकती है। कभी-कभी यह स्थिति शरीर के किसी अन्य भाग में भी हो सकती है। थ्रांबोसिस के कारण दिल का पूरी तरह से कार्य न करना या विकलांगता या फिर भावनात्मक चोट जैसे लक्षण हो सकते हैं। आसान शब्दों में कहा जाए तो इनको पहचानना मुश्किल होता है,लेकिन अगर इन्हें समय से पहचान लिया जाए तो यह मृत्यु से बचाने में मदद कर सकता है।
वैसे तो कोई भी व्यक्ति इसका शिकार हो सकता है लेकिन कुछ ऐसे ग्रुप हैं जिनमें इसके होने की ज्यादा संभावनाएं रहती हैं और वह ग्रुप हैं : वृद्ध लोग, गर्भवती महिलाएं, जो लोग ज्यादा लंबे समय तक बिस्तर (बेड रिडेन) पर रहते हैं, जो लोग बार बार विदेश घूमने जाते हैं, जो महिलाएं ज्यादा बार अबॉर्शन जैसी स्थिति झेल चुकी हों, जो महिलाएं कम उम्र में ही ओरल गर्भनिरोधक गोलियां (कॉन्ट्रासेप्टीव पिल्स) का सेवन कर रही हों, या हाल ही में कोविड के मरीज रह चुके लोग इसके रिस्क में ज्यादा होते हैं।
यह क्लॉट काफी कारणों की वजह से बन सकता है, जैसे पहले से ही मौजूद दिल से जुड़ी स्थिति, हाइपो थायरॉयडिज्म, कैंसर होना या फिर शरीर में विटामिन सी और एस की कमी होना।
निचले अंगों (लिंब्स) में किसी तरह की अचानक से सूजन आ जाना और इसका कारण भी न पता होना इसका लक्षण होता है। इस लक्षण को नजर अंदाज न करके तुरंत डॉक्टर के पास जाना चाहिए। कई बार स्किन लाल या फिर नीली भी हो जाती है और पैरों में सूजन आ जाने के साथ-साथ बुखार भी आने लगता है। कई बार अगर इन क्लॉट्स पर ध्यान नहीं दिया जाता है तो यह टुकड़ों में बंट (ब्रेक हो) कर फेफड़ों तक पहुंच सकते हैं और तुरंत सांस न आने का कारण बन सकते हैं। अगर आपको इस तरह का लक्षण दिखता है या सांस नहीं आता है तो तुरंत डॉक्टर के पास जरूर जाएं।
मेडिकल ट्रीटमेंट से पहले हर कोई कुछ बचाव के टिप्स का पालन करके खुद को सुरक्षित रखने की कोशिश कर सकता है। रिस्क ग्रुप में आने वाले लोगों को तो ऐसा जरूर करना चाहिए। कुछ बेसिक फुट एक्सरसाइज, लंबी फ्लाइट्स के दौरान पैरों को ऊपर नीचे करना और लंबी यात्राओं के दौरान डीवीडी स्टॉकिंग का पहनना आपकी कुछ हद तक मदद कर सकता है। घर पर ही एयर मैट्रेस रख सकते हैं। इन सारे आसान चरणों (सिंपल स्टेप्स) से डीवीटी के रिस्क को कम किया जा सकता है।
डॉक्टर कुछ बेसिक ब्लड टेस्ट जैसे डी डाइमर, एपीटीटी, प्रोटीन सी और एस, वीनस डॉलर और कई तरह के सीटी स्कैन जैसे टेस्ट से इसका पता लगा सकते हैं।
वैसे तो डॉक्टर इसे ठीक करने के लिए कई सारी एंटी थ्रोंबोटिक दवाइयां दे सकते हैं। जिनसे क्लॉट्स को (डिसोल्व होने) घुलने में मदद मिल सकती है। लेकिन कई बार इन्हें हटाने के लिए सर्जिकल तरीकों का भी प्रयोग करना पड़ सकता है। दवाइयों का सेवन नियमित रूप से करना चाहिए और नियमित रूप से कार्रवाई (फॉलो अप) भी लेते रहने चाहिए। दवाइयों को बंद करने या फिर बदलने से पहले एक बार डॉक्टर से जरूर राय लेनी चाहिए।
(इनपुट्स: डॉक्टर मयंक गोयल, असिस्टेंट प्रोफेसर, डिपार्टमेंट ऑफ इंटरनल मेडिसिन, शारदा अस्पताल, नोएडा)