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पीलिया (jaundice) एक ऐसा रोग है जिसे लेकर कई भ्रम हैं। लेकिन वास्तव में यह एक लक्षण है जिससे पता चलता है कि आपके शरीर में कुछ गड़बड़ है। यानि इसका मतलब है कि आपका लीवर बीमार है। इस स्थिति का सबसे आम लक्षण त्वचा का पीला और आंखों का सफेद हो जाना है। खून में बिलीरुबिन लेवल बहुत ज्यादा होने कारण पीलापन होता है। बिलीरुबिन एक बाइल पिग्मेंट है, जो खून में होता है। वास्तव में लीवर का मुख्य कार्य इस यौगिक को शरीर से बाहर निकालना होता है।
पीलिया का मुख्य कारण हैपेटाइटिस ए वायरस है जो दूषित पानी या भोजन से फैलता है। इसके लक्षणों में बुखार, बीमारी, पेट दर्द, मतली, सिरदर्द और पीली दस्त शामिल हैं।
एलोपैथिक दवाओं में हेपेटाइटिस ए के इलाज की कोई व्यवस्था नहीं है। इतना ही नहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन भी इस बीमारी के लिए कोई चिकित्सा की सिफारिश नहीं करता है। इसके बजाय, रोगी को सलाह दी जाती है कि वह अपनी पोषण संबंधी जरूरतों का ध्यान रखे और कुछ दिनों तक काम ना करे।
इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि अधिक से अधिक लोग इस समस्या के उपचार के लिए आयुर्वेद की तरफ बढ़ रहे हैं। मुंबई के मशहूर आयुर्वेदिक इंस्टीट्यूट 'डॉक्टर वैद्य न्यू ऐज आयुर्वेद' के सीईओ डॉक्टर अर्जुन वैद्य के अनुसार, यहां हेपेटाइटिस ए के इलाज कराने वाले लोगों की कोई कमी नहीं है। सबसे बड़ी बात पीलिया के इलाज में आयुर्वेदिक दवाओं के अच्छे परिणाम दिख रहे हैं। डॉक्टर वैद्य के आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉक्टर सूर्य भगवती आपको पीलिया का आयुर्वेदिक उपचारों के बारे में बता रही हैं।
आयुर्वेद के अनुसार पीलिया होने के कारण
आयुर्वेद में सभी रोग तीन दोषों मे यानि वात, पित्त और कफ के असंतुलन के कारण होते हैं। आयुर्वेद में, पीलिया पित्त दोष इस विकार का परिणाम है। कभी-कभी, लीवर शरीर में प्रवेश करने वाले विषाक्त पदार्थों से निपटने में विफल रहता है। इससे लीवर में सूजन पैदा हो सकती है जिसके परिणामस्वरूप पीलिया होता है। अधिक तेल, मसालेदार, नमकीन और गर्म भोजन लीवर पर असर डालते हैं। कभी-कभी, अत्यधिक भय, क्रोध, तनाव और चिंता जैसी मनोवैज्ञानिक कारक भी इस स्थिति को बढ़ा सकते हैं। टाइफाइड, मलेरिया और तपेदिक जैसे बीमारियों से लीवर प्रभावित होता है। इन कारकों के कारण पित्त प्रभावित होता है और बाइल खून में चले जाते हैं जिससे आंखें, त्वचा, नाखून और पेशाब पीला हो जाता है।
आयुर्वेद में पीलिया का उपचार
डॉक्टर भगवती के अनुसार, पीलिया के इलाज के लिए आयुर्वेद में विभिन्न जड़ी बूटियों को शामिल किया जाता है। इस दवा को लिविटअप (LIVitup) कैप्सूल के रूप में जाना जाता है। यह अर्गोग्यवर्धिनी और कलमेघ का मिश्रण है। इसके अलावा मरीजों को अर्गोग्यवर्धिनी वती और अवितापिकार चूर्ण भी दी जाती है। हेपेटाइटिस से पीड़ित लोगों का कुमारीअश्व जैसा टॉनिक भी दिया जाता है।
पित्त को संतुलित करें- डॉक्टर के अनुसार, चूंकि हेपेटाइटिस ए का और पीलिया का कारण पित्ता का असंतुलन होना है। इसलिए आयुर्वेद शरीर में होमियोस्टेसिस बनाए रखने की सलाह देता है। आयुर्वेद का उद्देश्य शरीर को अन्य दोषों के संतुलन के द्वारा पित्त दोष को संतुलन करना है।
डायट का रखें ध्यान- आयुर्वेद में लीवर को प्रभावित होने से बचाने के लिए बेहतर खानपान का पालन करना जरूरी बताया गया है। बेहतर खानपान से लीवर पर असर नहीं पड़ता है और खून साफ होता है। आयुर्वेद में पाचन तंत्र को बेहतर बनाए रखने के लिए क्या करें और क्या ना करें पर भो जोर दिया जाता है।
इसका कोई दुष्प्रभाव नहीं है- डॉक्टर क्व अनुसार, आयुर्वेद के उपचार में हर्बल कन्क्लेक्शन और डायट चेंजेस शामिल हैं। इस प्रणाली में रासायनिक दवाओं का अतिरिक्त बोझ के बिना लीवर तेजी से सही होता है।
लीवर सेल्स का पुनर्जन्म- पीलिया उपचार में लीवर को मजबूत करना शामिल है और आयुर्वेद ऐसा ही करता है। यह अप्रभावी लीवर सेल्स को पुनर्जन्म करके लीवर मेटाबोलिज्म को सही करता है। ये जड़ी बूटियां लीवर को शुद्ध करती हैं और उसे मजबूत बनाती हैं।
बॉडी से बाइल निकालना- पीलिया के लिए आयुर्वेदिक उपचार का लक्ष्य शरीर से अधिक पित्त को निकालना है जो शरीर पर अधिक बोझ बना सकता है। लीवर को स्वस्थ होने के लिए पर्याप्त समय देकर, जड़ी बूटियां मूत्रवर्धक के रूप में कार्य करती हैं और शरीर में सूजन को कम करती हैं।
दर्द से राहत- पीलिया के दौरान रोगियों को पेट दर्द की समस्या रहती है। भूमि अम्लाकी जैसी जड़ी-बूटियां इससे निपटने में मददगार हैं। इनकें एंटीबैक्टीरियल, एंटीस्पास्मोडिक और एनाल्जेसिक गुण हैं, जो न केवल परेशानी पैदा करने वाले कारणों को खत्म करती हैं बल्कि रोगियों में दर्द को भी कम करती हैं।
रोगी को उपचार कब तक करना है?
जब तक आपको लैब की रिपोर्ट से पॉजिटिव रिजल्ट नहीं मिल जाता है, तब तक आपको उपचार जारी रखना चाहिए। मरीज त्वचा, आंखों और नाखूनों के रंग पर बारीकी से ध्यान देकर ठीके होने की स्थिति पर नजर रख सकते हैं। जब तक कि मूत्र का रंग सामान्य नहीं हो जाता, जब तक व्यक्ति की भूख और पाचन सुधार न हो जाए और जब तक वह ऊर्जावान और सक्रिय महसूस ना करने लगे, तब तक दवाएं ली जानी चाहिए।
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अनुवादक – Usman Khan
चित्र स्रोत - Shutterstock