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Breastfeeding Tips For New Mothers: मां बनने का एहसास जितना खूबसूरत होता है, उतनी ही नई जिम्मेदारियों और सवालों से भरा भी होता है। खासतौर पर, जब बात स्तनपान की आती है, तो हर मां चाहती है कि वह अपने शिशु को भरपूर पोषण और प्यार दे सके। लेकिन अक्सर नई मांओं के ज़हन में ब्रेस्टफीडिंग को लेकर कई तरह के सवाल होते हैं। स्तनपान कराने का क्या सही तरीका है? शिशु को ब्रेस्टफीड कब और कैसे कराना चाहिए? इन सभी सवालों का जवाब जानना जरूरी है, ताकि नई मां और बच्चे, दोनों का स्वास्थ्य बना रहे। ब्रेस्टफीडिंग से जुड़े ऐसे ही सवालों के जवाब जानने के लिए हमने डॉ रुजुल झावेरी, कंसल्टेंट ऑब्सटेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजी, नारायणा हेल्थ एसआरसीसी चिल्ड्रन हॉस्पिटल, मुंबई से बातचीत की। आइए, जानते हैं नई मां के लिए ब्रेस्टफीड कराने के जरूरी टिप्स (Breastfeeding tips for new mothers in hindi)।
डॉ रुजुल झावेरी के अनुसार, गर्भावस्था के दौरान महिला के शरीर में कई तरह के हार्मोनल बदलाव होते हैं, जिनमें मुख्य भूमिका एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन की होती है। ये हार्मोन ब्रेस्ट को दूध उत्पादन के लिए तैयार करते हैं। डिलीवरी से कुछ समय पहले प्रोलैक्टिन हार्मोन का उत्पादन तेजी से बढ़ता है, जो दूध बनने की प्रक्रिया को शुरू करता है। जब बच्चे का जन्म हो जाता है और वह मां का दूध पीना शुरू करता है, तो निप्पल और एरिओला की नसों में उत्तेजना होती है जो सीधे दिमाग को सिग्नल भेजती है।
महिला के स्तनों के भीतर छोटे-छोटे ग्रंथियों के समूह होते हैं जिन्हें एलवियोलाई (Alveoli) कहते हैं। दूध इन्हीं में बनता है। गर्भावस्था के दौरान हार्मोनल प्रभाव के कारण ये एलवियोलाई कई गुना बढ़ जाते हैं और फैल जाते हैं। एक गर्भवती महिला के स्तन में करीब 1।5 लाख एलवियोलाई होते हैं, जो एक सामान्य महिला से कई गुना अधिक हैं। इन एलवियोलाई के अंदर मौजूद सेक्रेटरी सेल्स दूध के मुख्य तत्व – प्रोटीन, फैट, लैक्टोज और इम्यून फैक्टर्स का निर्माण और स्त्राव करते हैं। जब बच्चा स्तनपान करता है, तो ऑक्सीटोसिन नामक हार्मोन दिमाग से निकलता है, जो मिल्क इंजेक्शन रिफ्लेक्स (Milk Ejection Reflex) को ट्रिगर करता है। यह दूध को एलवियोलाई से दबाकर निप्पल तक पहुंचाता है। दूध बनने की प्रक्रिया पूरी तरह डिमांड और सप्लाई पर निर्भर करती है। यानी जितनी बार और जितने अच्छे से बच्चा दूध पिएगा, शरीर उतना ही अधिक दूध बनाएगा। जब स्तन पूरी तरह खाली हो जाते हैं, तो शरीर को संकेत मिलता है कि अगली बार और दूध बनाना है।
चाहे आप बच्चे को ब्रेस्टफीडिंग करवाएं या बॉटल फीडिंग, सबसे जरूरी बात है कि बच्चा पूरा पोषण पाए और मां भी स्वस्थ रहे। ब्रेस्टफीडिंग के कई फायदे हैं, लेकिन हर महिला की स्थिति अलग होती है। ऐसे में, सबसे अच्छा विकल्प वही है जो मां और बच्चे दोनों के लिए अनुकूल हो।
कप फीडिंग बॉटल फीडिंग की तुलना में कई मामलों में बेहतर मानी जाती है। इसमें बच्चा नैचुरल तरीके से दूध पीता है, जिससे निप्पल कंफ्यूजन नहीं होता। इससे ओवरफीडिंग का खतरा भी कम होता है और मुंह की मांसपेशियों का बेहतर विकास होता है। यह सस्ता, साफ रखने में आसान और कान व दांत की समस्याओं के खतरे को भी कम करता है। खासकर, प्रीमैच्योर या बीमार बच्चों के लिए कप फीडिंग ज्यादा फायदेमंद होती है।
कुछ सामान्य और सुविधाजनक स्तनपान की पोजीशन में क्रेडल होल्ड, क्रॉस-क्रेडल होल्ड, लेट-बैक या रीक्लाइन्ड पोजीशन, फुटबॉल होल्ड और साइड-लाइंग पोजीशन शामिल हैं। ये सभी पोजीशन मां और शिशु ,दोनों के लिए अलग-अलग स्तर का सहारा और आराम प्रदान करती हैं, जिससे ये अलग-अलग परिस्थितियों और पसंद के लिए उपयुक्त हो जाती हैं।
डॉ रुझुल के अनुसार, पहले छह महीने तक सिर्फ मां का दूध देना चाहिए। इसके बाद दो साल या उससे अधिक समय तक बच्चे को ठोस आहार के साथ ब्रेस्टफीडिंग जारी रखी जा सकती है।
अक्सर मांओं को लगता है कि उनका दूध कम बन रहा है, लेकिन ऐसा जरूरी नहीं। सही पोषण लेने से दूध की मात्रा और गुणवत्ता दोनों बेहतर होती है।
Disclaimer: प्रिय पाठकों यह आर्टिकल केवल सामान्य जानकारी और सलाह देता है। यह किसी भी तरह से चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है। इसलिए अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करें। thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।