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Medically Verified By: Dr. Arun Chowdary Kotaru
Puri Neend Na Le To Kya Hoga: रात से सुबह तक नींद पूरी नहीं हुई? 'कोई बात नहीं, ज्यादा से ज्यादा क्या हो जाएगा! ऑफिस में काम पर मन नहीं लगेगा या थोड़ा सिर दर्द होगा बस।' अगर आप भी इसी तरह पूरी नींद नहीं ले पा रहे हैं और फिर बस यह सोचकर बैठे रहें कि ज्यादा से ज्यादा क्या हो जाएगा, तो बता दें यह अगर सही से नहीं सोए तो जान से हाथ धोना पर जाएगा! कैसे? अरे भई नींद हमारी सेहत के लिए बहुत ही जरूरी है, लेकिन अक्सर हम नींद को हल्के में लेते हैं। टाइम पर न सोना तो जैसे हमारी हैबिट बन चुकी है। कोई दो राय नहीं कि इसके कई कारण हो सकते हैं जैसे लेट नाइट ऑफिस वर्क, पढ़ाई और कुछ लोग देर रात तक फोन चलाकर नींद प्रभावित करते हैं।
हमने थोड़ा विस्तार से जानने के लिए आर्टेमिस हॉस्पिटल के रेस्पिरेट्री डिजीज एंड स्लीप मेडिसिन के यूनिट हेड और जाने माने पल्मनोलॉजिस्ट डॉक्टर अरुण चौधरी कोटारू से बात की। उन्होंने बताया कि हम सबके जेहन में एक बात बैठ गई है कि नींद तो कभी भी पूरी हो जाएगी, लेकिन ऐसा करते करते यह आदत बन जाती है और हम स्लीप डेप्रिवेशन यानी नींद की कमी के शिकार हो जाते हैं। आसान शब्दों में कहें, तो अगर जितनी शरीर को नींद की जरूरत है उतनी न मिले तो इसे स्लीप डेप्रिवेशन कहा जाता है। इससे शरीर के साथ साथ मानसिक समस्याएं जन्म लेती हैं। आइए जानते हैं कम नींद की वजह से होने वाले 5 बड़े नुकसान के बारे में
नींद की कमी का सबसे ज्यादा असर दिमाग पर पड़ता है। जब आप ठीक से नहीं सोते, तो आपका दिमाग कोई भी बात प्रोसेस करने, याद रखने और फैसले लेने में मुश्किल महसूस करता है।
लंबे समय तक नींद की कमी रहने पर ब्रेन फॉग जैसी समस्या भी हो सकती है, जिसमें व्यक्ति मानसिक रूप से सुस्त और कन्फ्यूजन महसूस करता है।
चिड़चिड़ापन, मूड स्विंग और छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा आने जैसी समस्याएं शुरू हो सकती हैं। लंबे समय तक यही स्थिति बनी रहे, तो डिप्रेशन और एंग्जायटी जैसी मानसिक समस्याएं पैदा हो सकती हैं।
हमारा शरीर सोते समय खुद को रिपेयर करता है और इम्यून कोशिकाओं को मजबूत बनाता है। लेकिन जब नींद पूरी नहीं होती तब शरीर संक्रमणों का आसानी से शिकार होने लगता है, बार-बार सर्दी-खांसी या बुखार हो सकता ह, इलाज का असर भी कम हो सकता है।
नींद की कमी का सीधा असर शरीर के हार्मोन्स पर पड़ता है। भूख नियंत्रित करने वाले दो हार्मोन, घ्रेलिन और लेप्टिन, नींद की कमी में असंतुलित हो जाते हैं। घ्रेलिन बढ़ जाता है, जिससे आपको बार-बार भूख लगती है, खासकर जंक फूड खाने की इच्छा होती है। लेप्टिन कम हो जाता है, जिससे पेट भरने का संकेत दिमाग को नहीं मिलता। नतीजा—ओवरईटिंग और वजन बढ़ना। इसके अलावा, स्लीप डेप्रिवेशन इंसुलिन को भी प्रभावित करता है, जिससे ब्लड शुगर बढ़ने लगता है और डायबिटीज का खतरा बढ़ सकता है।
नींद की कमी दिल पर भी गहरा असर छोड़ती है। दिल धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है। इसे ऐसे समझ सकते हैं कि जब आप सोते हैं तो इस दौरान रक्तचाप स्वाभाविक रूप से कम होता है, जिससे दिल को आराम मिलता है। लेकिन जब आप कम सोते हैं, तो ब्लड प्रेशर लगातार हाई रहने लगता है।
हाई ब्लड प्रेशर, सूजन और तनाव हार्मोन कोर्टिसोल का स्तर बढ़ने लगता है। ये सभी चीज़ें मिलकर हृदय रोग, स्ट्रोक और हार्ट अटैक के खतरे को बढ़ाती हैं।अगर कोई व्यक्ति रोज सिर्फ 4–5 घंटे ही सोता है, तो उसे दिल से जुड़ी बीमारियां होने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।
अच्छी नींद हमारी त्वचा के लिए भी उतनी ही जरूरी है।इसलिए कुछ लोग ब्यूटी स्लीप भी खूब लेते हैं। पर्याप्त नींद को अक्सर ब्यूटी स्लीप कहा जाता है क्योंकि नींद के दौरान शरीर कोलेजन बनाता है, जो त्वचा को सख्त, चमकदार और जवान बनाए रखता है।
नींद की कमी से कोलेजन का उत्पादन घट जाता है, जिससे त्वचा पर झुर्रियां जल्दी आने लगती हैं। डार्क सर्कल, सुस्ती, चेहरे पर पफीनेस और स्किन का ग्लो कम होने लगता है। लंबे समय तक नींद कम मिली, तो त्वचा डल और बेजान दिखने लगती है।
Disclaimer: प्रिय पाठकों यह आर्टिकल केवल सामान्य जानकारी और सलाह देता है। यह किसी भी तरह से चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है। इसलिए अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करें। thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।
सोते समय खर्राटें लेना, मुंह से सांस लेना और सांस लेने से जुड़ी परेशानियां स्लीप एप्निया के प्रमुख लक्षण हैं।
स्लीप एप्निया एक प्रकार का स्लीपिंग डिसॉर्डर है जिसमें मरीज को सोते समय ठीक तरीके से सांस लेने में दिक्कतें आ सकती हैं।
Guinness World Records के अनुसार एक मनुष्य बिना नींद के 11 दिन (264 घंटे) तक रह सकता है।
आपको किसी भी चीज या काम करने में ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई महसूस हो सकती है। बीच-बीच में मूड स्विंग्स या चिड़चिड़ापन हो सकता है। कोई काम करने या किभी तरह का निर्णय लेने की क्षमता में गिरावट।