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ROP टेस्ट क्या होता है? जानिए कब होती है रोप स्क्रीनिंग की जरूरत

Is a ROP test necessary for a newborn : जन्म के बाद बच्चों का ROP टेस्ट जरूरी होता है। ताकि समय पर आंखों से जुड़ी परेशानी का पता लगाया जा सके। आइए जानते हैं क्या है ROP और क्यों है इस टेस्ट की जरूरत?

ROP टेस्ट क्या होता है? जानिए कब होती है रोप स्क्रीनिंग की जरूरत
ROP Test
VerifiedVERIFIED By: Dr. Bhanu Prakash M

Written by Kishori Mishra |Published : February 11, 2026 7:36 AM IST

What is ROP Screening Test : आज के समय में न सिर्फ बड़े-बुजुर्गों, बल्कि शिशुओं को भी आंखों से जुड़ी परेशानियां हो रही हैं। इन परेशानियों में ROP की समस्या शामिल है। ROP मुख्य रूप से समय से पहले जन्में बच्चों को होता है,  यह आंखों से जुड़ी एक गंभीर परेशानी होती है। इसमें रेटिना में असमान्य ब्लड वेसल बन जाती है। इस स्थिति का समय पर पता लगाने के लिए रोप स्क्रीनिंग की जाती है। मुख्य रूप से 31 सप्ताह से पहले जन्में बच्चों का ROP टेस्ट किया जाता है। इस लेख में हम आपको ROP के बारे में विस्तार से बताएं। इस विषय की जानकारी के लिए हमने डॉ. भानु प्रकाश एम, यशोदा हॉस्पिटल्स, हैदराबाद में सीनियर कंसल्टेंट मोतियाबिंद कॉर्निया और रिफ्रैक्टिव सर्जन से बातचीत की है। आइए जानते हैं इस विषय के बारे में विस्तार से-

क्या है ROP टेस्ट?

डॉ. भानु प्रकाश एम का कहना है कि ROP का मतलब है रेटिनोपैथी ऑफ प्रीमैच्योरिटी, यह आंखों की एक गंभीर बीमारी हो सकती है, जो प्रीमैच्योर बच्चों को प्रभावित करती है। इसमें रेटिना में असामान्य ब्लड वेसल बन जाती हैं, जो आंख के पीछे की लाइट-सेंसिटिव परत होती है। ROP टेस्ट या स्क्रीनिंग एग्जाम, एक नॉन-इनवेसिव प्रोसीजर है, जिसे ऑप्थल्मोलॉजिस्ट इसका जल्दी पता लगाने के लिए करते हैं, जिससे नजर जाने या अंधेपन को रोका जा सके।

ROP मुख्य रूप से प्रीटर्म बच्चों में होता है, जो प्रेग्नेंसी के 31 हफ़्ते से पहले पैदा होते हैं या जिनका वजन 1,500 ग्राम से कम होता है, क्योंकि उनकी रेटिना की ब्लड वेसल कच्ची होती हैं और NICU में ऑक्सीजन के उतार-चढ़ाव के प्रति सेंसिटिव होती हैं। दूसरे जोखिमों में लंबे समय तक ऑक्सीजन थेरेपी, सांस की समस्याएं या सेप्सिस जैसे इन्फेक्शन शामिल हैं। स्क्रीनिंग के बिना, गंभीर ROP तेजी से बढ़ सकता है, जिससे रेटिना अलग हो सकता है। जल्दी पता चलने पर लेजर थेरेपी या इंजेक्शन जैसे समय पर इलाज किया जा सकता है, जिससे 90% से ज्यादा मामलों में आंखें बच जाती है।

ROP स्क्रीनिंग कब जरूरी है?

इंडियन एकेडमी ऑफ़ पीडियाट्रिक्स जैसी संस्थाओं या इंटरनेशनल स्टैंडर्ड्स की गाइडलाइंस के अनुसार, हाई रिस्क में जन्में बच्चे या फिर 31 सप्ताह से पहले जन्में बच्चों की रोप स्क्रीनिंग जरूरी होती है। पहला एग्जाम आमतौर पर 4-6 हफ्ते में होता है। जन्म के बाद या बहुत ज्यादा प्रीटर्म बच्चों यानि 27 सप्ताह से पहले जन्मे बच्चे का आरओपी 31 सप्ताह के बाद होता है।

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कबतक होता है फॉलो-अप्स

वहीं, फॉलो-अप हर 1-2 सप्ताह में होते हैं, जब तक कि रेटिना पूरी तरह से वैस्कुलराइज न हो जाए, आमतौर पर फुल-टर्म उम्र (40 हफ़्ते) तक फॉलो-अप्स लेने की सलाह दी जाती है। हॉस्पिटल जन्म के वज़न, प्रेग्नेंसी और शुरुआती नतीजों के आधार पर शेड्यूल बनाते हैं। सभी प्रीमीज़ में ROP नहीं होता; कई अपने आप ठीक हो जाते हैं, लेकिन स्क्रीनिंग से उन बच्चों की पहचान हो जाती है जिन्हें एक्शन की ज़रूरत है।

कैसा होता है ROP प्रोसेस?

डॉक्टर भानु प्रकाश का कहना है कि रोप का प्रोसेस सीधा है लेकिन इसके लिए एक्सपर्टाइज की जरूरत होती है। सबसे पहले, पुतलियों को चौड़ा करने के लिए डाइलेटिंग ड्रॉप्स डाली जाती हैं, जिन्हें काम करने में 30-45 मिनट लगते हैं। सुन्न करने वाली ड्रॉप तकलीफ को कम करती है। लेंस वाले इनडायरेक्ट ऑप्थाल्मोस्कोप का इस्तेमाल करके डॉक्टर आख को खुला रखने के लिए एक स्पेकुलम के जरिए रेटिना की जांच करते हैं, इसमें कोई चीरा या दर्द नहीं होता।

डिजिटल इमेजिंग दूर से रिव्यू या रिकॉर्ड के लिए रेटिना की फोटो ले सकती है। बच्चों को शांत रखने के लिए पहले से लपेटा जाता है या खिलाया जाता है, हर आंख की जांच 5-10 मिनट तक चलती है। कुछ समय के लिए धुंधला दिखना या हल्की जलन जैसे साइड इफेक्ट जल्दी ठीक हो जाते हैं।

कुछ जरूरी सलाह

पेरेंट होने के नाते, अटेंड करें हर स्क्रीनिंग, यह आपके बच्चे के लिए ज़िंदगी भर नजर की कमी से बचने का सबसे अच्छा तरीका है। शुरुआती ROP स्क्रीनिंग ने दुनिया भर में अंधेपन की दर में काफी कमी की है।

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Highlights

  • नवजात शिशुओं का ROP टेस्ट जरूर होता है।
  • 31 सप्ताह से पहले जन्मे बच्चों का ROP स्क्रीनिंग जरूरी होता है।
  • आंखों की समस्या का पहले पता लगाने के लिए ROP जरूरी होता है।