
विद्या शर्मा
विद्या शर्मा को डिजिटल मीडिया में लगभग 3 साल का अनुभव है। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता ... Read More
Medically Verified By: Dr. Malini Saba
पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर
Post Traumatic Stress Disorder Kya Hota Hai: आपने देखा होगा कि कुछ लोग एक पर्टिकुलर घटना को लेकर इतने डर जाते हैं कि वह डर उनके मन में घर कर लेता है। आसान शब्दों में पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर के बारे में बताएं तो यह एक मानसिक स्वास्थ्य स्थिति है। यह तब होती है, जब कोई व्यक्ति किसी बहुत डरावनी, खतरनाक या जानलेवा घटना को देखता है या उससे गुजरता है। दिमाग उस घटना को प्रोसेस नहीं कर पाता और बार-बार उसे वापस लाता है।
क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉक्टर मालिनी सबा कहती हैं कि “एक मेंटल हेल्थ प्रोफेशनल के तौर पर मैं अक्सर देखती हूं कि लोग सोचते हैं "समय के साथ सब ठीक हो जाएगा"। लेकिन PTSD में ऐसा नहीं होता। यहां दिमाग सुरक्षा मोड में फंस जाता है। ऐसे में लोग हर बार उसी घटना के होने से पहले या दौरान डर में रहने लगते हैं।” आइए इस विषय पर हम थोड़ा विस्तार से जानते हैं कि PTSD क्यों और किन परिस्थितियों में हो सकता है।
PTSD किसी एक तरह की घटना से नहीं होता है। कोई भी ऐसी घटना जो आपको सहन न हो पाए, डरा हुआ या खतरे में महसूस कराए, ट्रिगर बन सकती है। पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर होने के कई कारण हो सकते हैं, जैसे-
प्राकृतिक आपदाएं—भूकंप, बाढ़, सुनामी, आग आदि, जिनसे जान का डर बहुत गहरा होता है।
दुर्घटनाएं- सड़क हादसा, प्लेन क्रैश, फैक्ट्री में बड़ा हादसा।
हिंसा और हमला- मारपीट, लूट, चाकूबाजी, आतंकी हमला।
युद्ध और सैन्य अनुभव- युद्ध के मैदान में लड़ना या बमबारी देखना।
यौन शोषण या उत्पीड़न- बचपन या वयस्क अवस्था में हुआ शोषण। यह PTSD का एक प्रमुख कारण हो सकता है।
गंभीर बीमारी या चोट- कैंसर का पता चलना, ICU में रहना, किसी अपने को अस्पताल में तड़पते देखना।
किसी अपने की अचानक मौत- एक्सीडेंट, हत्या या आत्महत्या से किसी करीबी को खोना।
जरूरी नहीं कि घटना आपके साथ ही हुई हो। टीवी पर भयानक खबर देखना और अपने बच्चे या पार्टनर के साथ हुई दर्दनाक घटना के बारे में जानना भी PTSD होने का कारण बन सकता है।
पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर के लक्षण घटना के कुछ हफ्तों या महीनों बाद भी आ सकते हैं। 4 मुख्य तरह के लक्षणों से आप इसे पहचान सकते हैं-
1. दोबारा जीना-घटना के फ्लैशबैक आना, बुरे सपने आना, अचानक ऐसा लगना जैसे घटना फिर से हो रही है। पटाखे की आवाज से सैनिक को युद्ध याद आ जाना इसी का उदाहरण है।
2. बचाव-उन जगहों, लोगों, बातों से दूर भागना जो घटना की याद दिलाएं। टीवी न्यूज न देखना, उस रास्ते से न जाना।
3. सोच और मूड में बदलाव- खुद को, दूसरों को या दुनिया को गलत समझने लगना। "दुनिया अब सुरक्षित नहीं है", "इसमें मेरी गलती थी" जैसा सोचना। खुशी महसूस न कर पाना, अपनों से कट जाना।
4. हाइपरअलर्ट-बहुत चिड़चिड़ापन, गुस्सा, नींद न आना, छोटी आवाज से डर जाना, हमेशा सतर्क रहना। दिल का तेज धड़कना, पसीना आना।
अगर ये लक्षण 1 महीने से ज्यादा समय तक बने रहें और आपकी नौकरी, रिश्ते, रोजमर्रा की जिंदगी पर असर डालें तो इसे नजरअंदाज न करें।
डॉक्टर सबा कहती हैं कि हां, बिल्कुल है। और अच्छी खबर ये है कि सही मदद से 80% लोग काफी बेहतर हो जाते हैं। 3 तरह के इलाज से इस डिसऑर्डर को ठीक किया जा सकता है-
PTSD कमजोरी नहीं है। यह किसी असामान्य और दर्दनाक घटना के प्रति दिमाग की सामान्य प्रतिक्रिया है। अगर आप या आपका कोई अपना इन लक्षणों से गुजर रहा है, तो शर्म न करें। किसी साइकेट्रिस्ट या क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट से बात करें। मदद मांगना बहादुरी है।
डिस्क्लेमर: ट्रॉमा आपकी पूरी कहानी नहीं है। इलाज के साथ आप फिर से सामान्य, शांत और खुशहाल जीवन जी सकते हैं। अगर आपको लगे कि आपकी स्थिति गंभीर हो रही है या खुद को नुकसान पहुंचाने के विचार आ रहे हैं, तो तुरंत नजदीकी डॉक्टर या हेल्पलाइन से संपर्क करें।