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Written By: Jitendra Gupta | Published : February 25, 2021 2:42 PM IST
क्या है नेचुरोपैथी ट्रीटमेंट, जानें क्यों फेफड़ों के लिए फायदेमंद है ये तरीका
क्या आप जानते हैं कि फेफड़े या फिर सांस से संबंधित समस्याओं से पीड़ित लगभग 53 फीसदी लोग डायबिटीज,हाइपरटेंशन और मोटापा जैसी जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों से पीड़ित है। इन सब समस्याओं के बीच हर एक रोगी को इन्फेक्शन को लेकर बहुत सावधान रहने की जरूरत है। बीते कुछ वक्त से वातावरण में पार्टिकुलेट प्रदूषण में बेतहाशा वृद्धि देखी गयी है और साल 1998 से लगातार पार्टीकुलेट प्रदूषण 42 फीसदी की औसत से बढ़ रहा है। वायु प्रदूषण का बढ़ता हुआ स्तर चिंता का विषय है क्योंकि यह फेफड़ों से जुड़ी बीमारियां, हाइपरटेंशन, स्ट्रोक, डायबिटीज और हार्ट अटैक जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बनता है।
हाल ही में जिंदल नेचरक्योर इंस्टीट्यूट ने एक ऑनलाइन स्टडी में ये पाया कि लगभग 93 फीसदी मरीजों को लगता है कि कोरोना के कारण लगे लॉकडाउन के बाद से वायु प्रदूषण में वृद्धि हुई है, जिसके कारण सांस से जुड़े कई रोग बढ़े हैं, और उनमें से 39 फीसदी मरीज सांस से जुड़े रोगों का ही शिकार हैं। वहीं इनमें से 53 फीसदी लोग डायबिटीज, हाइपरटेंशन, मोटापे जैसी जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों से परेशान हैं।
जिंदल नेचरक्योर की चीफ मेडिकल ऑफिसर डॉ. बबीना एनएम कहती हैं कि दिल्ली, बेंगलुरु, गाजियाबाद, और अन्य महानगरों में वायु प्रदूषण का बढ़ता स्तर एक गंभीर समस्या बन चुका है। यहां पर लोग विशेष रूप से प्रदूषित हवा के संपर्क में आ रहे हैं, जिसके कारण उन्हें गंभीर बीमारियों को लेकर अधिक सतर्क रहने की जरूरत है। इसके अलावा वे लोग जो बहुत अरसे से मेडिकल समस्याओं से जूझ रहे हैं उन्हें पहले के मुकाबले ज्यादा ध्यान देने की जरुरत है।
उन्होंने बताया कि इस स्टडी में हमने यह पाया कि वे लोग, जो सांस से सम्बंधित समस्याओं और फेफेड़े के संक्रमण की शिकायत कर रहे है और इनमे से ज्यादातर लोग दिल्ली, लखनऊ, चंडीगढ़ के रहने वाले हैं। उन्होंने कहा कि हमने डायबिटीज, मोटापे और हाइपरटेंशन के मरीजों में सांस से सम्बंधित समस्या को ज्यादा पाया है। मौजूदा वक्त में सांस से सम्बंधित समस्याओं और फेफड़े से सम्बंधित समस्याओं के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है।
अमेरिका स्थित हेल्थ इफेक्ट इंस्टीटयूट द्वारा ग्लोबल एयर 2020 की रिपोर्ट में कहा गया है कि लॉन्ग-टर्म एक्सपोजर और इनडोर प्रदूषकों के संपर्क में आने से दिल का दौरा पड़ने से, स्ट्रोक, डायबिटीज, क्रोनिक फेफड़े की बीमारी, फेफड़े के कैंसर और नवजात रोग से 1.67 मिलियन से अधिक लोगों की मौत 2019 में हुई। वायु प्रदूषण के प्रतिकूल प्रभावों का मुकाबला करने और कोविड इन्फेक्शन के खतरे को कम करने के लिए लोग ओवरआल कल्याण के लिए नेचुरोपैथी ट्रीटमेंट (प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति) की ओर आकर्षित हो रहे हैं। ट्रीटमेंट की इस प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति में बीमारी होने के कारणों पर ध्यान दिया जाता है और फिर मरीज को व्यक्तिगत जरूरतों के आधार पर एक पर्सनाइज्ल्ड ट्रीटमेंट एप्रोच प्रदान किया जाता है।
डॉ. बबीना ने वायु प्रदूषण से शरीर पर होने वाली जटिलताओं के बारे में बताते हए कहा कि COPD, अस्थमा और क्रोनिक ब्रोंकाइटिस से पीड़ित लोगों में प्रदूषण के बढ़े हुए लेवल से मोर्बिडिटी और मोर्टेलिटी रेट ज्यादा होता है।
उन्होंने कहा कि फेफड़ों के स्वास्थ्य को बरकरार रखने के लिए हमें निश्चित रूप से नेचुरोपैथी तरीका अपनाना चाहिए क्योंकि ये विभिन्न बीमारियों का इलाज करने में कारगर साबित हो रही है। नैचुरेपैथ के जरिए अन्य बीमारी को जड़ से उखाड़ फेंकने में मदद मिल रही है। जैसा कि हम जानते हैं कि प्रदूषण हर साल बढ़ रहा है और वायु प्रदूषण नियंत्रण से बाहर होता जा रहा है ऐसे में जरूरी हो जाता है कि शरीर के इम्यून सिस्टम को अन्दर से दुरुस्त रखा जाए और खुद सांस से सम्बंधित बीमारियों से बचाए रख पाने के लिए कुछ ठोस कदम उठाएं।
हमें नेचुरोपैथी उपाय जैसे कि
योग
प्राणायाम
डाइट में बदलाव
गहरी सांस लेने के तरीके
हर्बल ट्रीटमेंट
भाप / सौना
जालानेटी, और सुतारानी जैसे प्राकृतिक उपचार फेफड़ों के लिए बेहतर है।
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