
विद्या शर्मा
विद्या शर्मा को डिजिटल मीडिया में लगभग 3 साल का अनुभव है। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता ... Read More
Medically Verified By: Dr. Malini Saba
माइक्रो स्टेस
ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि अगर आप डिप्रेशन में नहीं हैं या एंग्जाइटी नहीं हो रही है, तो इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं कि उस व्यक्ति को स्ट्रेस नहीं है। जब हम तनाव की बात करते हैं, तो अक्सर हमारे मन में कई बातें आती हैं जैसे जॉब का प्रेशर, आर्थिक परेशानियां या अपने किसी रिश्ते में चल रही समस्याएं आती है। ये ऐसी चीजें हैं जिन्हें हम डेली लाइफ से जोड़कर नॉर्मल समझ लेते हैं।
लेकिन कई बार यही बातें हमारी मेंटल हेल्थ को बुरी तरह से प्रभावित करती हैं। इन्हीं छोटी-छोटी परेशानियों से होने वाले स्ट्रेस को माइक्रो स्ट्रेस कहा जाता है। इसे लेकर साइकोलॉजिस्ट और महिला एवं मानवाधिकारों की समर्थक डॉक्टर मालिनी सबा से बात की गई। वह क्या कहती हैं, आइए विस्तार से जानते हैं।
पहले आप नीचे दिए गए उदाहरण से माइक्रो स्ट्रेस को समझें, फिर उसके बाद हम आपको बताएंगे कि यह हमारे दिमाग को कैसे प्रभावित करता है।
ये सभी छोटे तनाव शरीर में कोर्टिसोल हार्मोन का स्तर बढ़ा सकता है, जिसका असर नींद, मूड और एकाग्रता पर पड़ सकता है। आइए अब हम जानें कि माइक्रो स्ट्रेस धीरे-धीरे दिमाग को कैसे प्रभावित करता है?
साइकोलॉजिस्ट बताती हैं कि जब आप लगातार छोटे स्ट्रेस को लेकर दिमाग को हमेशा अलर्ट मोड में बनाए रखते हैं तो यह मानसिक थकान का कारण बन सकता है। इससे व्यक्ति को बिना किसी बड़ी वजह के भी थकान और लो एनर्जी महसूस हो सकती है। अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन के अनुसार "तनाव लंबे समय तक बना रहता है, तो इसका प्रभाव मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों पर पड़ता है, जिसमें थकान, मेंटल हेल्थ प्रॉब्लमस और अन्य लंबे समय तक रहने वाले प्रभाव शामिल हैं।"
जब हमारा दिमाग बार-बार छोटी-छोटी बातों की चिंता के बारे में सोचता है और उन्हीं से घिरा रहता है, तो किसी एक काम पर लंबे समय तक ध्यान लगाना मुश्किल हो सकता है। इससे सबसे ज्यादा फर्क हमारी व हमारे शरीर की काम करने की क्षमता और निर्णय लेने की क्षमता पर पड़ सकता है।
माइक्रो स्ट्रेस व्यक्ति को बहुत अधिक चिड़चिड़ा, बेचैन या इमोशनली सेंसीटिव बना सकता है। छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा आना या उदासी महसूस करना इसके संकेत हो सकते हैं।
डॉक्टर बताती हैं कि जाहिर सी बात है कि जब आप दिनभर स्ट्रेस लेते हैं तो यह जमा हुआ तनाव रात में दिमाग को शांत होने नहीं देता है। इसके कारण सोने में परेशानी, बार-बार नींद टूटना या सुबह उठने पर ताजगी महसूस न होना जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
अगर कोई भी व्यक्ति लंबे समय तक माइक्रो स्ट्रेस को अनदेखा करता है, तो यह इमोशनल टायर्डनेस, काम से दूरी और मोटीवेशन में कमी जैसी समस्याओं को क्रीएट कर सकता है, जिसे बर्नआउट कहा जाता है।
अपनी सीमाएं तय करें। यानी कि हर समय लोगों के लिए उपलब्ध रहने की आदत को कम करें। काम और अपनी पर्सनल लाइफ के बीच क्लियर लाइन बनाना जरूरी है।
छोटे-छोटे ब्रेक लें। घर पर काम करने वाला व्यक्ति हो या फिर ऑफिस, दिनभर में कुछ मिनटों का आराम, गहरी सांस लेना या थोड़ी देर टहलना दिमाग को तनाव से राहत देने में मदद कर सकता है।
डिजिटल ओवरलोड कम करें। यानी कि अपनी बार-बार फोन चेक करने और लगातार नोटिफिकेशन देखने की आदत को कम करें। यह तनाव को बढ़ा सकती है। दिन में कुछ समय डिजिटल डिटॉक्स के लिए निकालें।
डिस्क्लेमर: कई लोग छोटे तनावों को नजरअंदाज करते रहते हैं। यह समझना जरूरी है कि आपको क्या परेशान कर रहा है और उसके समाधान के लिए छोटे कदम उठाएं। समझें कि माइक्रो स्ट्रेस कोई बड़ी घटना नहीं होता, लेकिन इसका प्रभाव समय के साथ बड़ा हो सकता है। इससे मानसिक थकान, चिड़चिड़ापन, ध्यान की कमी और बर्नआउट जैसी समस्याओं पैदा हो सकती हैं। इसलिए अपने स्ट्रेस को मैनेज करें और अधिक परेशानी होने पर किसी अच्छे साइकोलॉजिस्ट को कंसल्ट करें।