ल्यूटियल फेज क्या होता है और शरीर पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है? सोशल मीडिया के भ्रम को न करें नजरअंदाज

Luteal Phase Kya Hota Hai: ल्यूटियल फेज मासिक धर्म यानी कि पीरियड साइकिल का दूसरा भाग है, जो ओव्यूलेशन के बाद शुरू होकर अगले मासिक धर्म की शुरुआत तक रहता है। आइए जानते हैं यह बॉडी को कैसे प्रभावित करता है।

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Written By: Dr. Aashish Chaudhry | Published : April 18, 2026 10:53 AM IST

Luteal Phase Ko Ignore Kyu Nhi Karna Chahiye: आज के समय में सोशल मीडिया ने हेल्थ अवेयरनेस को नई दिशा दी है, लेकिन इसके साथ कई आधी-अधूरी जानकारियां भी तेजी से फैल रही हैं। महिलाओं के मेंस्ट्रुअल साइकिल, खासकर ल्यूटियल फेज, को लेकर भी कुछ ऐसी ही धारणाएं बनती जा रही हैं। इस फेज को अक्सर एक नेगेटिव या मुश्किल समय के रूप में पेश किया जाता है, जहां महिलाएं शारीरिक और मानसिक रूप से अस्थिर महसूस करती हैं। 

एक ऑर्थोपेडिक सर्जन के तौर पर, मैं यह मानता हूं कि यह नजरिया अधूरा है और कई बार महिलाओं को अपने असली स्वास्थ्य संकेतों को नजरअंदाज करने की ओर भी ले जा सकता है। ल्यूटियल फेज, जो ओव्यूलेशन के बाद शुरू होकर पीरियड्स आने तक चलता है, शरीर में हार्मोनल बदलाव का एक सामान्य हिस्सा है।

ल्यूटियल फेज में क्या होता है?

इस दौरान प्रोजेस्टेरोन हार्मोन का स्तर बढ़ता है, जो शरीर को संभावित गर्भावस्था के लिए तैयार करता है। लेकिन इसके साथ-साथ शरीर में कुछ फिजिकल बदलाव भी हो सकते हैं, जैसे हल्की सूजन, पानी रुकना, मांसपेशियों में जकड़न या जोड़ों में असहजता।

यहां यह समझना जरूरी है कि ये लक्षण हर महिला में नहीं होते और न ही यह हमेशा हार्मोनल बदलाव का ही परिणाम होते हैं। कई बार महिलाएं ल्यूटियल फेज के नाम पर उन समस्याओं को नजरअंदाज कर देती हैं, जिनका संबंध सीधे मस्क्यूलोस्केलेटल हेल्थ से होता है।

महिलाएं लेकर आती हैं ये केस

मेरे क्लिनिकल अनुभव में, बड़ी संख्या में महिलाएं पीठ दर्द, घुटनों में दर्द, गर्दन और कंधों में जकड़न की शिकायत लेकर आती हैं। जब उनसे बातचीत की जाती है, तो अक्सर वे इन लक्षणों को पीरियड्स के पहले का सामान्य दर्द मानकर लंबे समय तक नजरअंदाज करती रहती हैं। जबकि कई मामलों में इसके पीछे विटामिन-डी की कमी, कैल्शियम की कमी, मांसपेशियों की कमजोरी या जॉइंट्स पर बढ़ता दबाव होता है।

लाइफस्टाइल है बड़ी समस्या

आज की लाइफस्टाइल भी इस समस्या को बढ़ा रही है। लंबे समय तक बैठकर काम करना, गलत पोश्चर, फिजिकल एक्टिविटी की कमी और असंतुलित आहार- ये सभी कारक हड्डियों और जोड़ों पर असर डालते हैं। खासकर महिलाओं में, जहां पहले से ही बोन डेंसिटी से जुड़ी चुनौतियां होती हैं, वहां इन आदतों का असर और ज्यादा देखने को मिलता है।

ल्यूटियल फेज के दौरान शरीर में क्या बदलाव आते हैं?

ल्यूटियल फेज के दौरान शरीर में फ्लूड रिटेंशन और लिगामेंट्स की लचीलापन में बदलाव हो सकता है, जिससे जोड़ों पर हल्का अतिरिक्त दबाव महसूस होता है। ऐसे में अगर पहले से ही मांसपेशियां कमजोर हैं या जॉइंट्स में कोई समस्या है, तो दर्द ज्यादा महसूस हो सकता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि समस्या केवल हार्मोनल है- बल्कि यह एक संकेत हो सकता है कि शरीर को और बेहतर देखभाल की जरूरत है।

सोशल मीडिया पर ल्यूटियल फेज को कैसे दिखाया जाता है?

सोशल मीडिया पर एक और ट्रेंड देखने को मिलता है, जहां हर तरह की थकान, दर्द या असहजता को ल्यूटियल फेज से जोड़ दिया जाता है। यह सोच खतरनाक हो सकती है, क्योंकि इससे लोग असली कारण तक पहुंचने की कोशिश ही नहीं करते। उदाहरण के तौर पर, अगर घुटनों में लगातार दर्द है या सीढ़ियां चढ़ने में दिक्कत हो रही है, तो यह शुरुआती ऑस्टियोआर्थराइटिस या जॉइंट डैमेज का संकेत भी हो सकता है।

आखिर में मेरी सलाह

एक ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञ के रूप में मैं यह जोर देना चाहूंगा कि शरीर के संकेतों को सामान्य मानकर नजरअंदाज करना भविष्य में गंभीर समस्याओं को जन्म दे सकता है। चाहे वह घुटनों का दर्द हो, हिप जॉइंट में असहजता हो या बार-बार होने वाला बैक पेन, इन सभी का समय रहते मूल्यांकन जरूरी है। आज जॉइंट रिप्लेसमेंट और आर्थ्रोप्लास्टी जैसी आधुनिक सर्जिकल तकनीकों ने गंभीर मामलों का समाधान आसान बना दिया है, लेकिन हमारा लक्ष्य हमेशा यही होना चाहिए कि स्थिति उस स्तर तक पहुंचे ही नहीं।

महिलाओं के लिए यह बेहद जरूरी है कि वे अपने शरीर को समझें और हार्मोनल बदलावों के साथ-साथ मस्क्यूलोस्केलेटल हेल्थ पर भी ध्यान दें। नियमित व्यायाम—खासकर स्ट्रेंथ ट्रेनिंग, योग और स्ट्रेचिंग- मांसपेशियों को मजबूत बनाते हैं और जोड़ों पर दबाव कम करते हैं। इसके अलावा, कैल्शियम और विटामिन-डी से भरपूर आहार, धूप में समय बिताना और सही पोश्चर बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।

अंत में, मैं यही कहना चाहूंगा कि ल्यूटियल फेज को लेकर डर या भ्रम में रहने की बजाय, इसे एक सामान्य प्रक्रिया के रूप में समझें। लेकिन इसके नाम पर अपने शरीर के अन्य संकेतों को नजरअंदाज न करें। सही जानकारी, समय पर जांच और संतुलित जीवनशैली- ये तीन चीजें न केवल आपके हार्मोनल स्वास्थ्य, बल्कि हड्डियों और जोड़ों की सेहत को भी लंबे समय तक बेहतर बनाए रख सकती हैं।

Disclaimer: प्रिय पाठकों यह आर्टिकल केवल सामान्य जानकारी और सलाह देता है। यह किसी भी तरह से चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है। इसलिए अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करें। thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।

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