
आशु कुमार दास
आशु कुमार दास एक अनुभवी हेल्थ कंटेंट स्पेशलिस्ट हैं। इन्हें हेल्थ कंटेंट राइटर के तौर पर काम करते हुए 6 ... Read More
Written By: Ashu Kumar Das | Updated : January 12, 2026 6:28 PM IST
Medically Verified By: Dr. Purendra Bhasin
What is glaucoma? Who is at a higher risk of developing glaucoma? : साल 2026 में जनवरी का महीना ग्लूकोमा अवेयरनेस मंथ के तौर पर मनाया जा रहा है। ग्लूकोमा जिसे काला मोतिया भी कहा जाता है। काला मोतिया आंखों से जुड़ी गंभीर बीमारी है। यह बीमारी धीरे-धीरे आंखों की रोशनी छीन लेती है और कई मामलों में व्यक्ति को स्थायी अंधेपन (Permanent Blindness) तक पहुंचा सकती है।
ग्लूकोमा अवेयरनेस मंथ के खास मौके पर हम आपको बताने जा रहे हैं काला मोतिया क्या है (kala motiya), काला मोतिया के लक्षण क्या हैं और आंखों से जुड़ी इस बीमारी से बचाव (kala motiyabind se Bachao ke liye kya karein) के लिए क्या करना चाहिए। इस विषय पर अधिक जानकारी दे रहे हैं ग्वालियर स्थित रतन ज्योति नेत्रालय के संस्थापक और सीनियर डॉ. पुरेंद्र भसीन।
डॉ. पुरेंद्र भसीन का कहना है कि काला मोतिया या ग्लूकोमा एक गंभीर आंखों की बीमारी है, जिसमें आंख के अंदर का दबाव (Intraocular Pressure) बढ़ जाता है। यह बढ़ा हुआ दबाव आंखों की नस (Optic Nerve) को नुकसान पहुंचाता है। ऑप्टिक नर्व वह नस होती है, जो आंखों से दिमाग तक देखने की जानकारी पहुंचाती है। जब यह नस धीरे-धीरे डैमेज होने लगती है, तो व्यक्ति की देखने की क्षमता कम होने लगती है, खासकर साइड से देखने की शक्ति (Peripheral Vision) प्रभावित होती है।
हमारे साथ खास बातचीत में डॉ. पुरेंद्र भसीन बताते हैं कि ग्लूकोमा नाम होने के कारण अक्सर लोग काला मोतिया और सफेद मोतियाबिंद को एक ही समझ लेते हैं। लेकिन ये दोनों अलग-अलग बीमारी हैं।
काला मोतिया मुख्य रूप से चार प्रकार का होता है:
डॉ. पुरेंद्र भसीन का कहना है कि काला मोतिया को साइलेंट विजन किलर के नाम से भी पुकारा जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि इस बीमारी के शुरुआती लक्षण शून्य के बराबर होते हैं। जिसे आमतौर पर लोग इग्नोर कर देते हैं। काला मोतिया के शुरुआती लक्षणों में शामिल हैः
काला मोतिया के लक्षण जब साफ दिखते हैं, तब तक आंखों की नस को स्थायी तौर पर नुकसान पहुंच चुका होता है। इसलिए काला मोतिया का पता लगाने के लिए समय-समय पर आंखों की जांच जरूर करवानी चाहिए।
यूं तो काला मोतिया का जन्मजात और दवाओं के कारण भी होता है। लेकिन कुछ खास लोगों को काला मोतिया होने का ज्यादा खतरा रहता है। इनमें शामिल हैः
डॉक्टर के अनुसार, किसी भी व्यक्ति को काला मोतिया होने के कई कारण हो सकते हैं। इसमें शामिल हैंः
आंख के तरल पदार्थ का सही से बाहर न निकल पाना
आंखों के अंदर दबाव बढ़ना (स्क्रीन देखने, धूल-मिट्टी के कारण)
ऑप्टिक नर्व को ऑक्सीजन सही तरह से न मिलना
अनुवांशिक कारण
लाइफस्टाइल से जुड़ी आदतें
ऑप्टिक नर्व को खाने के जरिए पोषण न मिलना

किसी व्यक्ति को काला मोतिया है या नहीं, इसका पता लगाने के लिए विभिन्न प्रकार के मेडिकल टेस्ट किए जाते हैं।
डॉ. पुरेंद्र भसीन का कहना है कि 40 साल की उम्र के बाद काला मोतिया का खतरा ज्यादा होता है। इसलिए इस उम्र के लोगों को साल में 2 बार आंखों की जांच जरूर करवानी चाहिए। बीमारी का सही तरीके से पता लगाने के लिए आंखों की जांच के लिए सही अस्पताल जरूर चुनें। किसी भी निजी या छोटे अस्पताल जहां पर एमबीबीएस डॉक्टर या आई स्पेशलिस्ट न हो, वहां पर आंखों की जांच बिल्कुल न करवाएं।
काला मोतिया जैसी घातक बीमारी आपको न हो, इसके लिए आप नीचे बताए गए उपायों को अपना सकते हैं।
नहीं, काला मोतिया पूरी तरह ठीक नहीं किया जा सकता, लेकिन समय पर इलाज से इसके बढ़ने को रोका जा सकता है। काला मोतिया के इलाज में डॉक्टर आई ड्रॉप, लेजर ट्रीटमेंट और सर्जरी जैसे विकल्प अपनाने की सलाह देते हैं। डॉक्टर के अनुसार, काला मोतिया का इलाज मरीज की स्थिति, बीमारी और लाइफस्टाइल को देखते हुए किया जाता है।
डॉ. पुरेंद्र भसीन सुझाव देते हैं कि काला मोतिया और आंखों से जुड़ी विभिन्न प्रकार की बीमारी से बचने के लिए समय-समय पर आंखों की जांच करवाना बहुत जरूरी है।
काले मोतियाबिंद का मुख्य लक्ष्य आंखों के दबाव (Intraocular Pressure) को नियंत्रित करना होता है ताकि ऑप्टिक नर्व को और नुकसान न पहुंचे। शुरुआती चरणों में इसका इलाज बिना सर्जरी के पूरी तरह संभव है। डॉक्टर अक्सर दवाओं और आई-ड्रॉप्स (Eye Drops) के जरिए काला मोतिया का इलाज करते हैं। लेकिन जब दवाओं और आई ड्रॉप के इस्तेमाल से भी आंखों की रोशनी ठीक नहीं होती है, तब डॉक्टर लेजर थेरेपी का इस्तेमाल करते हैं। काला मोतिया के लिए लेजर थेरेपी पारंपरिक सर्जरी से काफी अलग है।
लेयर थेरेपी के जरिए काला मोतिया का इलाज आसानी से बिना किसी ज्यादा परेशानी से हो जाता है। डॉक्टर बताते हैं कि लेजर थेरेपी करवाने से काला मोतिया की रिकवरी भी आसान और तेज हो जाती है। पारंपरिक थेरेपी से काला मोतिया का इलाज करवाने के बाद मरीज को रिकवर होने में 3 महीने तक का समय लग सकता है। वहीं, लेजर सर्जरी से काला मोतिया का इलाज करवाने से मरीज की रिकवरी सिर्फ 20 से 25 दिन में बिना किसी तकलीफ से हो सकती है।
Disclaimer : प्रिय पाठकों यह आर्टिकल केवल सामान्य जानकारी और सलाह देता है। यह किसी भी तरह से चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है। इसलिए अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करें। thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।