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इको-एंग्जायटी क्या है और इससे कैसे बचें?

आपने नॉर्मल एंग्जायटी के बारे में सुना होगा, जिसमें व्यक्ति बहुत ही ज्यादा परेशान रहता है। लेकिन इको एंग्जायटी इससे अलग है। यह पर्यावरण के लिए की जाने वाली वह चिंता है, जो व्यक्ति के मन और सोच पर हावी होने लगती है। आइए डॉक्टर से विस्तार से जानते हैं।

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Written By: Vidya Sharma | Published : July 2, 2026 3:28 PM IST

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Medically Verified By: Dr. Malini Saba

विषय को लेकर पहले ही थोड़ा क्लियर कर देते हैं कि इको-एंग्जायटी कोई मानसिक बीमारी नहीं है। जब कोई भी व्यक्ति पर्यावरण में हो रहे नकारात्मक बदलावों को लेकर बहुत ही ज्यादा चिंता महसूस करता है तो उसे इको-एंग्जायटी होती है। इसमें व्यक्ति को फ्यूचर की टेंशन होने लगती है कि पृथ्वी का क्या होगा, प्राकृतिक संसाधन कितने समय तक सुरक्षित रहेंगे या आने वाली पीढ़ियों को किस तरह की दुनिया मिलेगी आदि-आदि।

साइकोलॉजिस्ट और महिला एवं मानवाधिकारों की समर्थक डॉक्टर मालिनी सबा के अनुसार “इको-एंग्जायटी कोई मानसिक बीमारी नहीं है। अपने पर्यावरण के लिए संवेदनशील होना एक सकारात्मक बात है, लेकिन जब यह चिंता व्यक्ति के विचारों, भावनाओं और डेली लाइफ पर हावी होने लगे, तो यह मानसिक तनाव का कारण बन सकती है। ऐसे में सिर्फ पर्यावरण की नहीं, बल्कि अपनी मानसिक सेहत की भी देखभाल करना जरूरी है।" आइए थोड़ा विस्तार से जानते हैं कि अगर किसी व्यक्ति को इको-एंग्जायटी हो तो उसमें क्या लक्षण दिखते हैं।

इको-एंग्जायटी के लक्षण क्या हैं?

भविष्य को लेकर लगातार चिंता

डॉक्टर सबा बताती हैं कि कभी-कभी संकट में पड़ रहे पर्यावरण के लिए सोचना आम बात है, लेकिन जब कोई व्यक्ति बार-बार जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आपदाओं और पर्यावरणीय संकट के बारे में सोचता रहता है, तो उसे इको-एंग्जायटी होने लगती है। उसे फ्यूचर अनसेफ लगता है और हर समय किसी बड़ी घटना के होने का डर बना रहता है।

पर्यावरण संबंधी खबरों से बेचैनी

साथ ही अगर किसी को बाढ़ आने, जंगलों में आग लगने, हीटवेव या प्रदूषण से जुड़ी खबरें देखने के बाद लंबे समय तक स्ट्रेस, उदासी या चिंता महसूस होती है, तो यह भी इको-एंग्जायटी का एक लक्षण हो सकता है।

खुद को हेल्पलेस फील करना

कुछ लोगों को लगता है कि वे चाहे जितनी कोशिश कर लें, पर्यावरण की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आएगा। ऐसा सोचने वालों की यह सोच धीरे-धीरे उनकी मानसिक थकान और निराशा को बढ़ा सकती है।

खुद को गुनहगार समझना

कुछ लोग अपनी डेली लाइफ और रूटीन में प्लास्टिक का उपयोग, वाहन चलाना या बिजली की खपत को लेकर ज्यादा सोचते हैं और गिल्ट महसूस करते हैं। उन्हें लगता है कि वे एनवाइरोमेंट को नुकसान पहुंचा रहे हैं।

नींद और फोकस करने में दिक्कत

डॉक्टर बताती हैं कि लगातार चिंता करने की वजह से नींद पर असर हो सकता है। इससे काम में ध्यान लगाने में परेशानी हो सकती है और व्यक्ति मानसिक रूप से थका हुआ महसूस कर सकता है।

इको-एंग्जाइटी से कैसे बचें?

देखें आप पर्यावरण में चल रही खबरों की जानकारी रखें, लेकिन सिर्फ सीमित मात्रा में। पर्यावरण संबंधी खबरों से पूरी तरह दूरी बनाना जरूरी नहीं है, लेकिन लगातार नकारात्मक समाचार देखना मानसिक तनाव बढ़ा सकता है। इसके अलावा किसी फेक वेबसाइट और सोशल मीडिया से जानकारी न लें, कुछ विश्वसनीय स्रोतों की लिस्ट बनाकर उन्हीं से जानकारी लें।

डॉक्टर सबा का कहना है "दुनिया की किसी भी समस्या का समाधान अकेले करना संभव नहीं है, लेकिन छोटे-छोटे सकारात्मक कदम व्यक्ति में नियंत्रण और उम्मीद की भावना पैदा कर सकते हैं। अपने मन में यही फीलिंग रखें ताकि तनाव को कम करने में भी मदद मिले।"

आखिर में डॉक्टर सबा ने दी सलाह

डॉक्टर मालिनी सबा का मानना है कि "जलवायु परिवर्तन एक वास्तविक वैश्विक चुनौती है और इसके लिए चिंता होना स्वाभाविक है। लेकिन अगर हम लगातार डर और कुछ न कर पाने की भावना में जीने लगें, तो यह हमारी मानसिक सेहत को प्रभावित कर सकता है।"

डिस्क्लेमर: इको-एंग्जायटी आधुनिक समय की एक उभरती हुई मनोवैज्ञानिक चुनौती है। पर्यावरण की रक्षा करना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है, लेकिन इसके साथ अपनी मानसिक सेहत का ध्यान रखना भी उतना ही आवश्यक है। इसलिए जागरूक रहें, लेकिन अपनी मेंटल पीस को बनाए रखें।