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भ्रूण में कैसे पता चलेगी Cerebral Abnormalities, जानें कौन से महीने के अल्ट्रासाउंड में लगा सकते हैं पता

अगर आप सोच रहे हैं कि आखिर किस स्टेज में आकर भ्रूण में पल रहे बच्चे में इस तरह की दिक्कत का पता चलता है या फिर ये बीमारी है क्या तो आपको बताते हैं कैसे आप इसका पता लगा सकते हैं।

भ्रूण में कैसे पता चलेगी Cerebral Abnormalities, जानें कौन से महीने के अल्ट्रासाउंड में लगा सकते हैं पता
भ्रूण में कैसे पता चलेगी Cerebral Abnormalities, जानें कौन से महीने के अल्ट्रासाउंड में लगा सकते हैं पता

Written by Jitendra Gupta |Published : December 7, 2022 3:22 PM IST

बच्चा गिराना या फिर गर्भपात के लिए सही उम्र या फिर सही समय क्या होगा इस बात को लेकर बहस लंबे अरसे से चली आ रही है। हालांकि दिल्ली हाई कोर्ट ने मंगलवार को दिए एक फैसले में ये साबित कर दिया कि गर्भपात पर आखिरी फैसला सिर्फ और सिर्फ मां का होगा। दरअसल एक 26 साल की शादीशुदा महिला ने अपने 33 सप्ताह के भ्रूण को गिराने की मांग की थी, जो कि कुछ दिमागी असामान्यताओं से जूझ रहा था। इस मामले पर फैसला देते हुए अदालत ने भी ये साफ कर दिया कि कुलमिलाकर ये आप पर है कि आपको बच्चे को रखना है या नहीं और मेडिकल बोर्ड को सही रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है। अगर आप सोच रहे हैं कि आखिर किस स्टेज में आकर भ्रूण में पल रहे बच्चे में इस तरह की दिक्कत का पता चलता है या फिर ये बीमारी है क्या तो आपको बताते हैं कैसे आप इसका पता लगा सकते हैं।

क्या है CEREBRAL ABNORMALITIES (दिमागी परेशानी)?

कई रिसर्च में ये साफ हो चुका है कि दिमागी असामान्यता कई तरीके की हो सकती है, जिसमें ऑटिज्म, सिजोफ्रेनिया, कई प्रकार के ब्रेन ट्यूमर और डिमेंशिया शामिल है। इन्हीं में से एक है सेरेब्रल पाल्सी, जो सबसे आम बताया जाता है और ये आमतौर पर बच्चों में देखने को मिलती है। इस बीमारी में बच्चों को चलने-फिरने और उनके पोश्चर के विकास से जुड़ी परेशानियां होती है, जो स्थायी होती हैं। दरअसल जब दिमाग का विकास हो रहा होता है तो उसके भीतर कुछ असामान्यताएं हो जाती हैं, जो उसके चीजों को कंट्रोल व पोश्चर और बैलेंस की क्षमता को प्रभावित करती है।

भारत में करीब 15 से 20 फीसदी बच्चे सेरेब्रल पाल्सी से प्रभावित होते हैं और हर हजार बच्चों में 2.1 से 3 फीसदी बच्चे इस अवस्था का शिकार होते हैं।

क्या हैं जोखिम कारक

एक्सपर्ट बताते हैं कि न्यूरोडेवलपमेंटरल डिसऑर्डर की गंभीरता और इसका विकास गर्भावस्था की अवधि से जुड़ा हुआ है। जैसे कि जितना प्रेगनेंसी के दिन कम हो जाएंगे उतना ही खतरा बढ़ता जाएगा। दूसरा जोखिम कारक है, भ्रूण का वजन। ये विकार समय पूर्व बच्चों और जन्म के बाद देर से रोने के लक्षण से पता लगाया जा सकता है।

कैसे प्रभावित होता है दिमाग

एक्सपर्ट बताते हैं कि इस तरह के मामले बहुत आम होते हैं और पर्यावरणीय कारक, वायरल और जेनेटिक कारणों की वजह से दिमाग के विकास की प्रक्रिया बाधित होने लगती है, जिसकी वजह से ये परेशानी होती है। दिमागी असामान्यता हल्की से लेकर गंभीर हो सकती है और जन्म के बाद बच्चे के दिमाग पर भी असर डालती है।

कौन से अल्ट्रासाउंड में चलेगा पता

अगर दिकक्त ज्यादा है या फिर मामला गंभीर है तो इसका निदान 12 से 13 सप्ताह की शुरुआती अल्ट्रासाउंड में पता चल सकता है। इसका मतलब ये है कि लेवल 1 अल्ट्रासाउंड में इसका पता लगाया जा सकता है। इसके अलावा 18 से 20वें सप्ताह में भी पता लगाया जा सकता है कि ये कितना गंभीर है।

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एमआरआई से लगाएं पता

इस तरह की प्रेगनेंसी की पता लगाने के लिए आप न्यूरोसोनोग्राम नाम की तकनीक का पता लगा सकते हैं या फिर फेटल एमआरआई की जरूरत पड़ सकती है। सही तरीके से की गई दीमागी जांच भ्रूण में इस तरह की परेशानियों का पता लगा सकती है।

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