बर्न ICU क्या होता है? डॉक्टर बता रहे हैं गंभीर मरीजों का कैसे होता है इलाज

बर्न ICU का नाम सुनते ही अक्सर लोगों में मन में यह सवाल उठता है कि आखिर ये कौन सी आईसीयू है? अगर आपके मन में भी ऐसे सवाल हैं, तो आइए इस लेख में विस्तार से समझते हैं-

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Written By: Kishori Mishra | Published : June 11, 2026 3:36 PM IST

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Medically Verified By: Dr. Venkat Raman Kola

विशाखापत्तनम स्टील प्लांट में भीषण औद्योगिक हादसे में 8 मजदूरों की जान चली गई। बताया जा रहा है कि इस हादसे में लगभग 1600 डिग्री सेल्सियस तापमान वाला पिघला हुआ स्टील क्रेन से अचानक मजदूरों पर गिर गया था। इसी तरह के कई तरह के हादसों की घटना आए दिन सामने आती रहती है। इस तरह के हादसे जब होते हैं, तो लोगों में बर्न ICU शब्द की चर्चा बढ़ जाती है। जब किसी व्यक्ति का शरीर गंभीर रूप से जल जाता है, तो उसे सामान्य वार्ड के बजाय विशेष देखभाल वाले बर्न ICU में भर्ती किया जाता है। लेकिन यह बर्न ICU क्या होता है और यहां मरीजों का इलाज कैसे किया जाता है? इसकी जानकारी अगर आपको नहीं है, तो आइए यशोदा हॉस्पिटल्स, हैदराबाद के गहन चिकित्सा एवं क्रिटिकल केयर डॉ. वेंकट रमन कोला से विस्तार से समझते हैं कि इस विषय को-

बर्न ICU क्यों जरूरी होता है?

बर्न ICU (Burn Intensive Care Unit) हॉस्पिटल का एक विशेष विभाग होता है, जहां गंभीर रूप से झुलसे मरीजों की 24 घंटे निगरानी की जाती है। आमतौर पर जिन मरीजों के शरीर का बड़ा हिस्सा जल गया हो, सांस की नली प्रभावित हुई हो या संक्रमण का खतरा अधिक हो, उन्हें यहां भर्ती किया जाता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, गंभीर जलन न केवल त्वचा को नुकसान पहुंचाती है, बल्कि शरीर में पानी की कमी, संक्रमण, अंगों की कार्यक्षमता में गिरावट और कई बार जानलेवा जटिलताएं भी पैदा कर सकती है। भारत में हर साल 10 लाख से अधिक लोग मध्यम या गंभीर रूप से जलने की घटनाओं का शिकार होते हैं।

इलाज का पहला स्टेप होता है फ्लूइड रेससिटेशन

गंभीर रूप से जलने के बाद शरीर तेजी से तरल पदार्थ और इलेक्ट्रोलाइट्स खोने लगता है। ऐसे में डॉक्टर मरीज को तुरंत नसों के जरिए (IV) फ्लूइड देना शुरू करते हैं। इसे फ्लूइड रेससिटेशन कहा जाता है।

बर्न मेडिसिन में लंबे समय से उपयोग की जाने वाली पार्कलैंड फॉर्मूला जैसी गाइडलाइंस शुरुआती फ्लूइड की मात्रा तय करने में मदद करती हैं। रिसर्च बताती है कि शुरुआती घंटों में सही मात्रा में फ्लूइड देना किडनी और अन्य अंगों को बचाने के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है।

सांस लेने में दिक्कत हो तो वेंटिलेटर की जरूरत

अगर मरीज आग, धुएं या जहरीली गैसों के संपर्क में आया हो, तो श्वसन तंत्र भी प्रभावित हो सकता है। ऐसे मामलों में मरीज को ऑक्सीजन सपोर्ट या वेंटिलेटर पर रखा जा सकता है।

संक्रमण रोकना सबसे बड़ी चुनौती

जली हुई त्वचा शरीर की प्राकृतिक सुरक्षा परत का काम नहीं कर पाती। इसलिए संक्रमण और सेप्सिस का खतरा बढ़ जाता है। बर्न ICU में मरीज के घावों की नियमित सफाई, ड्रेसिंग और संक्रमण की निगरानी की जाती है। कई मामलों में एंटीमाइक्रोबियल ड्रेसिंग और विशेष क्रीम का उपयोग किया जाता है। ताकि बैक्टीरिया के संक्रमण को रोका जा सके।

स्किन ग्राफ्टिंग और लंबी रिकवरी

अगर स्किन का बड़ा हिस्सा नष्ट हो गया हो, तो सर्जन स्किन ग्राफ्टिंग करते हैं। इसमें शरीर के किसी स्वस्थ हिस्से से त्वचा लेकर जले हुए हिस्से पर लगाई जाती है। डॉक्टर कहते हैं कि गंभीर बर्न के बाद शरीर की कैलोरी और प्रोटीन की जरूरत कई गुना बढ़ सकती है। इसलिए मरीज को हाई-प्रोटीन डाइट, फिजियोथेरेपी और लंबे समय तक पुनर्वास की आवश्यकता पड़ सकती है। कई मरीजों की रिकवरी में महीनों लग जाते हैं।

Disclaimer : बर्न ICU सिर्फ एक आईसीयू नहीं, बल्कि गंभीर रूप से झुलसे मरीजों के लिए जीवनरक्षक यूनिट होती है। यहां फ्लूइड मैनेजमेंट, संक्रमण नियंत्रण, सांस की निगरानी, स्किन ग्राफ्टिंग और पोषण संबंधी देखभाल एक साथ की जाती है। समय पर विशेषज्ञ इलाज मिलने से गंभीर बर्न मरीजों के बचने और बेहतर रिकवरी की संभावना काफी बढ़ जाती है।

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