
विद्या शर्मा
विद्या शर्मा को डिजिटल मीडिया में लगभग 3 साल का अनुभव है। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता ... Read More
Written By: Vidya Sharma | Published : June 2, 2026 6:26 AM IST
Image Credit- ChatGPT
तंबाकू का थोड़ा भी सेवन करने वाले लोग इसके एडिक्ट बन ही जाते हैं। धीरे-धीरे यह आदत बनता है, फिर बीमार बनाता है और आखिर में मौत का खतरा बनकर सामने आता है। आंकड़े बताते हैं कि देश में हर साल 1.35 मिलियन लोग तंबाकू के सेवन के कारण मर जाते हैं। औसतन रोज 20 सिगरेट पीने वालों की औसत उम्र में 13 साल की कमी हो जाती है और इसमें से 23% लोग अपनी उम्र के 65 साल तक नहीं पहुंच पाते हैं।
लेकिन जेन जी के जमाने में आम धुआं उड़ाने वाली बीड़ी-सिगरेट का इस्तेमाल नहीं क्या जाता है, बल्कि इनका भी अलग ही ट्रेंड शुरू हो गया है। जैसे सिगरेट की जगह ई-सिगरेट पीने का, जोकि बीते कुछ सालों में ट्रेंड बन चुकी है। लोगों ई-सिगरेट और वेपिंग को लेकर ऐसा सोचते हैं कि यह नॉर्मल सिगरेट की तुलना में कम नुकसानदायक होती है। लेकिन अगर हम लंग स्पेशलिस्ट की मानें तो यह सोच पूरी तरह से सही नहीं है।
नारायणा हॉस्पिटल, जयपुर के कंसल्टेंट पल्मोनोलॉजिस्ट डॉक्टर हर्षिल अलवाणी के अनुसार, ई-सिगरेट को सुरक्षित विकल्प मानना एक बड़ी गलतफहमी हो सकती है। भले ही इसमें तंबाकू को जलाया नहीं जाता, लेकिन इसके जरिए शरीर में कई ऐसे रसायन पहुंचते हैं जो स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकते हैं। आइए हम इसके बारे में थोड़ा विस्तार से जानते हैं।
डॉक्टर बताते हैं कि ई-सिगरेट एक इलेक्ट्रॉनिक टूल है, जो एक खास तरह के लिक्विड को गर्म करके एरोसोल या भाप जैसी गैस बनाता है। इसे इस्तेमाल करने वाले जब भी कश भरते हैं, तो एरोसोल को सांस के साथ फेफड़ों तक पहुंचाते हैं। इस लिक्विड में आमतौर पर निकोटीन, फ्लेवरिंग एजेंट्स और कई अन्य केमिकल्स मिले होते हैं। क्योंकि इसमें धुंआ नहीं आता है, इसलिए कई लोग इसे अलग समझकर सेफ मान लेते हैं। ऐसे में डॉक्टर का कहना है कि एरोसोल में भी ऐसे तत्व हो सकते हैं जो फेफड़ों और शरीर के अन्य अंगों को नुकसान पहुंचाते हैं।
आम पी जाने वाली सिगरेट में तंबाकू जलता है, जिससे धुआं पैदा होता है। वहीं ई-सिगरेट में लिक्विड गर्म होकर एरोसोल बनाता है। डॉक्टर कहते हैं कि धुआं न होने का मतलब यह नहीं है कि जोखिम भी खत्म हो गया है। ई-सिगरेट में मौजूद निकोटीन तेजी से लत पैदा कर सकता है और व्यक्ति को एडिक्टिव बना सकता है। इसके अलावा कुछ में फॉर्मेल्डिहाइड और अल्ट्राफाइन पार्टिकल्स जैसे तत्व भी पाए गए हैं, जो शरीर पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं।
डॉक्टर के अनुसार ई-सिगरेट हो या वेपिंग, दोनों का सीधा असर फेफड़ों पर पड़ सकता है, जिसके कारण फेफड़ों में सूजन, सांस फूलना, लगातार खांसी और सांस से जुड़ी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। कुछ मामलों में गंभीर लंग इंजरी भी देखने को मिली है। वहीं इसके अलावा निकोटीन हार्ट रेट और ब्लड प्रेशर को प्रभावित कर सकता है। ई-सिगरेट का असर सिर्फ फेफड़ों तक नहीं होता है, बल्कि यह हार्ट और दिमाग पर भी पड़ता है।
खुद को कूल दिखाने के चक्कर में युवा वर्ग में ई-सिगरेट का उपयोग बहुत ही ज्यादा बढ़ गया है, जोकी चिंता का विषय बन चुका है। एट्रेक्टिव फ्लेवर और डिजाइन के कारण कई बच्चे इसकी ओर आकर्षित हो जाते हैं, तो कुछ पियर प्रेशर की वजह से इनका इस्तेमाल करना शुरू कर देते हैं।
डॉक्टर अलवाणी के अनुसार “सबसे बड़ी चिंता निकोटीन की लत है। एक बार निकोटीन की आदत लगने के बाद व्यक्ति भविष्य में सिगरेट या अन्य तंबाकू उत्पादों का सेवन शुरू कर सकता है। यही कारण है कि कई स्वास्थ्य संगठन युवाओं में वेपिंग को एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती मानते हैं।
डिस्क्लेमर: ई-सिगरेट हो, सिगरेट हो या फिर वेपिंग, आपकी सेहत के लिए कोई भी सही नहीं है। धूम्रपान या किसी भी तरह का नशा नहीं करना चाहिए क्योंकि यह आगे चलकर कैंसर और मौत का कारण बनता है।