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टार्गेट पूरा करने का प्रेशर वर्कर की मेंटल हेल्थ पर क्या असर डालता है?

ऑफिस में अधिकतर काम करने वाले व्यक्ति से अगर कुछ बात करो तो या वह अग्रेशन में होता है या फिर डिप्रेशन में, जिसका मुख्य कारण है उनपर थोपा जा रहा वर्कलोड, जो और किसी न सही पर वर्कर की मेंटल और फिजीक हेल्थ पर बुरी तरह से असर डाल रहा है। कैसे? आइए जानते हैं।

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Written By: Vidya Sharma | Published : July 29, 2026 11:59 PM IST

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Medically Verified By: Dr. Malini Saba

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते उपयोग ने कंपनियों के आम वर्कर्स के लिए कई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। हर कम्पनी खुद को ऐआई के साथ अपडेट करना चाहती है, लेकिन वह यह भी चाहती है कि एम्प्लॉयी ऑर्गेनिक कंटेंट या बेहतर परिणाम दे। आज के समय में ज्यादातर कंपनियां कर्मचारियों के लिए मंथली, तिमाही या वार्षिक टार्गेट तय करती हैं। सीमित समय में लगातार बेहतर प्रदर्शन करने का दबाव कई लोगों के लिए तनाव का कारण बन जाता है।

शुरुआत में यह सामान्य लग सकता है, लेकिन अगर लंबे समय तक यह दबाव बना रहे तो इसका असर मानसिक स्वास्थ्य, नींद, रिश्तों और काम की गुणवत्ता पर भी पड़ सकता है। आइए साइकोलॉजिस्ट मालिनी सबा से जानते हैं कि ऑफिस से मिलने वाला स्ट्रेस वर्कर की मेंटल और फिजीकल हेल्थ पर क्या असर डालता है।

लगातार तनाव और चिंता बढ़ सकती है

जब किसी कर्मचारी को हर समय टार्गेट पूरा करने की चिंता रहती है, तो शरीर में स्ट्रेस हार्मोन कॉर्टिसोल का स्तर बढ़ सकता है। लंबे समय तक तनाव रहने पर व्यक्ति छोटी-छोटी बातों पर परेशान होने लगता है, निर्णय लेने में कठिनाई महसूस करता है और हर समय काम के बारे में सोचता रहता है। इसका असर उसके व्यवहार पर पड़ सकता है और वह चिड़चिड़ा हो सकता है।

बर्नआउट का खतरा बढ़ सकता है

साइकोलॉजिस्ट बताती हैं कि अगर किसी को लगातार ओवरटाइम करना पड़े, छुट्टियां न मिलें या हमेशा अच्छी पर्फोमेंस का दबाव बना रहे, तो व्यक्ति शारीरिक और मानसिक रूप से थक सकता है। इसे बर्नआउट कहा जाता है। इसमें काम के प्रति रुचि कम होना, एनर्जी लेवल कम होना और काम करने की क्षमता में गिरावट जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। इस दौरान शरीर में कुछ संकेत दिख सकते हैं जैसे- सुबह उठते ही थकान महसूस होना, काम में मन न लगना, बार-बार गलतियां होना और चिड़चिड़ापन बढ़ना।

नींद और फोकस में कमी

टार्गेट की चिंता कई लोगों की नींद खराब कर देती है। डॉ. सबा कहती हैं कि पर्याप्त नींद न मिलने पर याददाश्त, फोकस और निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। इससे काम में न चाहते हुए भी गलतियां बढ़ सकती हैं और स्ट्रेस बढ़ना शुरू हो सकता है। स्ट्रेस की वजह से परफॉर्मेंस में कमी आती है और फिर वर्कलोड बढ़ता है।

रिश्तों और सोशल लाइफ पर असर

डॉक्टर के अनुसार जब आपका पूरा ध्यान सिर्फ काम और लक्ष्य पर रहता है, तो व्यक्ति परिवार और दोस्तों के साथ समय कम बिताता है। इससे रिश्तों में दूरी, अकेलापन और भावनात्मक तनाव बढ़ सकता है। सामाजिक सहयोग मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, लेकिन काम अधिक होने की वजह से कर्मचारियों का दिमाग काम पर ही रह जाता है और उन्हें अपना माइंड फ्रेश होने का समय नहीं मिलता है।

हेल्थ पर भी पड़ता है असर

मानसिक स्ट्रेस सिर्फ दिमाग तक सीमित नहीं रहता। लंबे समय तक तनाव रहने से हाई ब्लड प्रेशर, सिरदर्द, पाचन संबंधी समस्याएं, मांसपेशियों में दर्द और कमजोर इम्यूनिटी जैसी दिक्कतें भी हो सकती हैं। इसलिए मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता और इन्हें अलग-अलग उपायों की जरूरत होती है।

डिस्क्लेमर: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से लिखा गया है। अगर तनाव कई हफ्तों तक बना रहे, नींद लगातार खराब रहे, काम करने की क्षमता कम होने लगे, घबराहट या उदासी रोज महसूस हो, या मन में खुद को नुकसान पहुंचाने जैसे विचार आने लगें, तो बिना देर किए मनोचिकित्सक या क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट से संपर्क करें। समय पर इलाज और काउंसलिंग से अधिकांश लोगों को फायदा मिल सकता है।