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लगातार बैठकर ड्राइव करने से हार्ट और स्पाइन पर क्या असर पड़ता है?

बहुत लोगों का लगता है कि ड्राई करने से सारी थकान पैरों पर होती है और एंकल वाले हिस्से पर दर्द होता है। लेकिन डॉक्टर ने बताया कि ड्राइव करने से हार्ट और स्पाइन पर भी बुरा असर पड़ता है। आइए जानें कैसे।

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Written By: Vidya Sharma | Published : June 19, 2026 10:44 AM IST

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Medically Verified By: Dr. Gaurav Singh Bhandari, Dr Samir Kubba

आपने कार चलाने वालों के मुंह से यह तो सुना होगा कि लंबे समय तक बिना ब्रेक के ड्राइव करने से उन्हें थकान हो जाती है और पैरों में दर्द हो जाता है। लेकिन अगर हम कहें कि यह शरीर में थकान तो बढ़ाता है, साथ ही हार्ट और स्पाइन की हेल्थ पर भी असर डालता है। दिल और स्पाइन दोनों पर होने वाले प्रभाव को विस्तार से जानने के लिए हमने नारायरण हॉस्पिटल के कार्डियोलॉजिस् डॉक्टर समीर कुब्बा और ऑर्थोपेडिक्स गौरव सिंह भंडारी से बात की।

डॉक्टर कुब्बा बताते हैं कि "लंबे समय तक बिना ब्रेक के गाड़ी चलाना हार्ट हेल्थ के लिए एक गंभीर जोखिम बन सकता है। यानी कि जब कोई व्यक्ति घंटों ड्राइविंग सीट पर बैठता है, तो उसका शरीर पूरी तरह से सुस्त हो जाता है। वहीं डॉक्टर भंडारी बताते हैं कि "रीढ़ की हड्डी शरीर को गतिशीलता और लचीलापन देने के लिए बनी है, न कि घंटों एक ही जगह स्थिर बैठने के लिए। जब कोई व्यक्ति लगातार ड्राइविंग करता है, तो स्पाइन पर पड़ने वाला मैकेनिकल लोड नॉर्मल खड़े होने की तुलना में लगभग 50% तक बढ़ सकता है।" अब ड्राईविंग करने से हार्ट और स्पाइन कैसे प्रभावित होते हैं, आइए थोड़ा विस्तार से जानते हैं।

हार्ट हेल्थ के लिए लंबे समय तक ड्राइव करना क्यों खराब है?

डॉक्टर समीर कुब्बा बताते हैं कि "जब ड्राईविंग के दौरान बॉडी एक जगह पर बैठे-बैठे फिजीकल एक्टिविटी कम हो जाती है और शरीर सुस्त हो जाता है। ऐसे में पैर की मसल का पंपिंग एक्शन धीमा पड़ जाता है, जो सामान्य रूप से ब्लड को वापस हार्ट की ओर धकेलने में मदद करता है। इससे होता यह है कि शरीर के निचले अंगों में ब्लड फ्लो कम हो जाता हैऔर डीप वेन थ्रोम्बोसिस (DVT) यानी नसों में खून के थक्के जमने का खतरा काफी बढ़ जाता है। अगर यह थक्का टूटकर फेफड़ों या दिल तक पहुंच जाए, तो यह जानलेवा साबित हो सकता है।"

लोंग ड्राइव मेंटल स्ट्रेस भी पैदा करती है

डॉक्टर कुब्बा आगे कहते हुए बताते हैं कि "इसके अलावा, लगातार ड्राइविंग सिर्फ फिजीकली स्टेबल रहने का नाम नहीं है, बल्कि यह एक मानसिक तनाव की स्थिति भी है। गाड़ी चलाते समय हेवी ट्रैफिक, खराब सड़कें और समय पर पहुंचने का दबाव शरीर में कोर्टिसोल और एड्रेनालाईन जैसे स्ट्रेस हार्मोनों के स्तर को बढ़ा देता है। ये हार्मोन ब्लड वैसल्स को सिकोड़ते हैं, जिससे ब्लड प्रेशर और हार्ट रेट में अचानक बढ़ोतरी हो सकती है। लंबे समय तक इस स्थिति में रहने से धमनियों की दीवारें सख्त होने लगती हैं, जो कोरोनरी आर्टरी डिजीज और हार्ट अटैक के जोखिम को दोगुना कर सकती हैं।

रास्त में खाना पड़ सकता है भारी

साथ ही, लंबी यात्राओं के दौरान अक्सर अनहेल्दी रिफाइंड फूड और कैफीन का अधिक सेवन किया जाता है, जो कोलेस्ट्रॉल और मेटाबॉलिज्म को बिगाड़ता है। डॉक्टर बताते हैं कि "बैठे-बैठे रहने वाली जीवनशैली और क्रोनिक स्ट्रेस का यह मिक्सचर दिल की काम करने के प्रोसेस को कमजोर करता है। कार्डियोवैस्कुलर सिस्टम को सुरक्षित रखने के लिए यह बेहद जरूरी है कि हर दो घंटे की ड्राइविंग के बाद कम से कम 10 से 15 मिनट का वॉक-ब्रेक लिया जाए, ताकि ब्लड सर्कुलेशन सामान्य बना रहे।"

बिना ब्रेक की ड्राइव से स्पाइन पर क्या असर पड़ता है?

जब हमने डॉक्टर गौरव से पूछा कि लंबे समय तक ड्राइव करने से स्पाइन पर क्या असर पड़ता है? तो उन्होंने जवाब देते हुए बताया कि "रीढ़ की हड्डी को स्पीड और फ्लैक्सीबीलिटी के लिए डिजाइन किया गया है, न कि घंटों एक ही जगह स्थिर बैठने के लिए। जब कोई भी व्यक्ति लगातार ड्राइव करता है, तो स्पाइन पर पड़ने वाला मैकेनिकल लोड नॉर्मल खड़े होने की तुलना में लगभग 50% तक बढ़ जाता है। उसके बैठने के पोस्चर में, खास तौर से जब कार की सीट सही सपोर्ट न दे रही हो, तो रीढ़ का स्वाभाविक 'S' आकार का कर्व 'C' आकार में बदल जाता है। यह खराब पोश्चर सीधे तौर पर इंटरवर्टेब्रल डिस्क (लंबर डिस्क) पर अत्यधिक दबाव डालता है।"

कार सीट का वाइब्रेशन भी डालता है असर

यह जानकारी शायद ही किसी को हो। डॉक्टर ने बताया कि लगातार सीट से मिलने वाला वाइब्रेशन इस स्थिति को और गंभीर बना देते हैं। सड़क के झटके और गाड़ी का लगातार हिलना रीढ़ की हड्डियों के बीच के शॉक एब्जॉर्बर (डिस्क) को तेजी से थकाते हैं, जिससे डिस्क के खिसकने या उनके समय से पहले घिसने की संभावना बढ़ जाती है। इसके साथ ही, लंबे समय तक पैर को एक्सीलेटर, क्लच और ब्रेक पर बनाए रखने से पेल्विस असंतुलित हो जाता है, जिससे साइटिका जैसी नसों के दबने की समस्याएं शुरू हो जाती हैं।

इन शुरूआती संकेतों को न करें अनदेखा

लंबे समय तक ड्राइविंग के बाद आपको अपने शरीर में ये 5 संकेत दिख सकते हैं। जैसे- पैरों में सूजन होना, पैरों में दर्द या भारीपन, कमर दर्द, गर्दन में अकड़न, सुन्नपन, सिर दर्द और बहुत ज्यादा थकान।

डॉक्टर ने दी सलाह

कार्डियोलॉजिस्ट और ऑर्थोपेडिक्स, दोनों ही एक्सपर्ट ने सलाह दी कि गर्दन और पीठ के ऊपरी हिस्से की मांसपेशियां लगातार स्टेयरिंग व्हील को संभालने के कारण क्रोनिक स्ट्रेस में रहती हैं, जिससे मांसपेशियों में ऐंठन और कड़ापन आ जाता है। इस रीढ़ की क्षति को रोकने के लिए एर्गोनोमिक सीटिंग गाइडलाइंस का पालन करना अनिवार्य है।

इसलिए सीट को इस तरह एडजस्ट किया जाना चाहिए कि घुटने कूल्हों से थोड़े ऊपर या बराबर हों, और पीठ के निचले हिस्से को सहारा देने के लिए लंबर सपोर्ट का उपयोग हो। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि रीढ़ की मांसपेशियों को री-हाइड्रेट और रिलैक्स होने का मौका देने के लिए नियमित अंतराल पर गाड़ी रोककर स्ट्रेचिंग करना बेहद आवश्यक है।

डिस्क्लेमर: अगर आप लॉन्ग ड्राइव पर जा रहे हैं तो कोशिश करें कि लगातार गाड़ी न चलाएं। बल्कि हर 1-2 घंटे में ब्रेक लें और बॉडी को स्ट्रेच करें। यह आपकी पूरी बॉडी में ब्लड सर्कुलेशन को बनाए रखता है और रीढ़ की हड्डी को भी अकड़ने से बचाता है। बेहतर होगा कि आप अपने साथ हाथ बटाने के लिए किसी दूसरे साथ को भी ले जाएं।