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Artificial Sweeteners vs Sugar: डायबिटीज के मरीज और वे लोग जो अपना ब्लड शुगर कंट्रोल करना चाहते हैं, वे कई बार चाय व अन्य खाने की चीजों में मिठास लाने के लिए चीनी की बजाय खास तरह के आर्टिफिशियल स्वीटनर्स का इस्तेमाल करते हैं। आपने भी अपने परिवार में या किसी न किसी व्यक्ति को इन आर्टिफिशियल स्वीटनर्स का उपयोग करते हुए जरूर देखा होगा, जो छोटी-छोटी गोलियों या पाउडर के रूप में आती हैं। चीनी की जगह इनका इस्तेमाल करके आप अपने खाने-पीने की चीजों को सामान्य रूप से मीठा बना सकते हैं और शुगर व कैलोरी से भी बच सकते हैं। लेकिन शायद आपके मन में भी यह सवाल जरूर आता होगा कि क्या इन आर्टीफिशियल स्वीटनर्स वाली टेबलेट या पाउडर का इस्तेमाल करना सही है और सेफ है? अगर आप भी ऐसा ही सोच रहे हैं, तो इस लेख में डॉ. विजय कुमार शर्मा आपको कुछ ऐसी ही चीजों के बारे में खास जानाकरी देने वाले हैं।
आर्टिफिशियल स्वीटनर यानी कृत्रिम मिठास देने वाले पदार्थ, ऐसे केमिकल या प्राकृतिक विकल्प होते हैं, जिन्हें चीनी (रिफाइन्ड शुगर) की जगह इस्तेमाल किया जाता है। इन्हें आमतौर पर एस्पार्टेम, सैकरिन और सुक्रालोज आदि की मदद से बनाया जाता है, जो बहुत कम मात्रा में ही ज्यादा मिठास देने वाले पदार्थ हते हैं हैं और इनमें कैलोरी भी बेहद कम या लगभग न के बराबर होती है। इनका उपयोग आमतौर पर डायबिटीज के मरीज या वे लोग करते हैं, जो अपना वजन कम करने की कोशिश कर रहे हों।
डॉ. विजय कुमार शर्मा, कंसलटेंट - इंटरनल मेडिसिन, रीजेंसी हॉस्पिटल, गोरखपुर
आर्टीफिशियल स्वीटनर्स के बारे में पूरी जानकारी होना बेहद जरूरी है, क्योंकि आज की जीवनशैली में लाइफस्टाइल और फिटनेस पर काफी ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है, हर कोई कैलोरी कंट्रोल करने की कोशिश कर रहा है और उसके लिए आर्टीफिशियल स्वीटनर्स जैसी चीजों का इस्तेमाल किया जा रहा है। ऐसे में लोग चीनी से बचने के लिए डाइट सोडा, शुगर-फ्री मिठाइयों और लो-कैलोरी प्रोडक्ट्स की ओर बढ़ रहे हैं। कंपनियां भी इन्हें “हेल्दी विकल्प” के रूप में प्रचारित करती हैं, जिससे इनका उपयोग तेजी से बढ़ा है।
(और पढ़ें - आर्टीफिशियल स्वीटनर्स का हार्ट पर असर)
अब बात आती है कि ये सच में स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित होते हैं या नहीं। दरअसल, सीमित मात्रा में आर्टिफिशियल स्वीटनर आमतौर पर सुरक्षित माने जाते हैं। कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने इन्हें तय सीमा के अंदर उपयोग करने की अनुमति दी है। यानी अगर आप इन्हें जरूरत के अनुसार और सीमित मात्रा में लेते हैं, तो तुरंत कोई बड़ा नुकसान नहीं होता।
आर्टीफिशियल स्वीटनर्स एक या दो नहीं बल्कि सैंकड़ों रिसर्च किए जा चुके हैं और उन्हीं रिसर्चों के अनुसार आर्टिफिशियल स्वीटनर का लंबे समय तक जरूरत से ज्यादा सेवन मेटाबॉलिज्म पर असर डाल सकता है और आंत के अच्छे बैक्टीरिया के संतुलन को बिगाड़ सकता है। यह मीठा खाने की आदत और क्रेविंग बढ़ाकर वजन बढ़ने की प्रवृत्ति भी पैदा कर सकता है। साथ ही इसका यूज करने से व्यक्ति यह भी सोचने लग जाता है कि मिठास तो मिल रही है, लेकिन कैलोरी नहीं मिल रही और ऐसा सोचकर कई बार ओवरईटिंग होने लगती है। ओवरईटिंग के कारण मोटापा, डायबिटीज, हार्ट डिजीज और अन्य खई बीमारियां होने का खतरा बढ़ जाता है। एक रिसर्च में यह भी पाया गया था कि आर्टीफीशियल स्वीटनर्स का इस्तेमाल करने से ब्रेस्ट कैंसर का खतरा भी बढ़ता है।
ऐसे में निष्कर्ष निकलता है कि अत्यधिक चीनी की बजाय अगर अत्यधिक आर्टिफिशियल स्वीटनर का इस्तेमाल किया जाए, तो उससे और ज्यादा नुकसान हो सकते हैं। इसलिए आर्टीफिशियल स्वीटनर्स को पूरी तरह से सुरक्षित नहीं कहा जा सकता है।
रिफाइन्ड शुगर हो या आर्टीफिशियल स्वीटनर्स जरूरत से ज्यादा दोनों का ही सेवन नुकसानदायक माना जाता है। इसलिए आपको सलाह दी जाती है कि आप न तो ज्यादा चीनी का सेवन करें और न ही पूरी तरह आर्टिफिशियल स्वीटनर पर निर्भर हो जाएं। इसके बजाय शहद, गुड़ या फलों की प्राकृतिक मिठास को प्राथमिकता दें, क्योंकि ये अपेक्षाकृत बेहतर विकल्प माने जाते हैं लेकिन इनका उपयोग भी लिमिट के अनुसार ही करना होगा। साथ ही प्रोसेस्ड और पैकेज्ड फूड का सेवन कम करें और अपनी डाइट को जितना हो सके प्राकृतिक, संतुलित और पोषण से भरपूर रखें, ताकि शरीर को जरूरी पोषक तत्व मिलते रहें और स्वास्थ्य भी बेहतर बना रहे।
अस्वीकरण: प्रिय पाठकों यह आर्टिकल केवल सामान्य जानकारी और सलाह देता है। यह किसी भी तरह से चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है। इसलिए अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करें। thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।