जब तक वात, कफ और पित्त दोष सही नहीं होंगे, आप पूरी तरह से स्वस्थ नहीं हो पाएंगे? कैसे करें इन्हें बैलेंस
आयुर्वेद मानता है कि स्वस्थ रहने के लिए शरीर का बारीकी से ध्यान रखना बेहद जरूरी है। शरीर के त्रिदोष भी उन्हीं में से एक हैं, जिनका संतुलन अगर खराब हो जाए तो कई बीमारियां होने का खतरा बढ़ जाता है।
आयुर्वेद में वात, कफ और पित्त दोष का बहुत महत्व है और ऐसा माना जाता है कि अगर आपके दोषों का संतुलन सही नहीं है तो समझ लीजिए कि आप कितनी भी कोशिश कर लें लेकिन आप खुद को हेल्दी नहीं रख पाएंगे। आयुर्वेद के अनुसार अगर आपको लगता है कि सब कुछ सही है, लेकिन भी भी आप हेल्दी नहीं रह पाते हैं तो कहीं न कहीं इसके पीछे दोषों का खराब संतुलन भी हो सकता है। आयुर्वेद व पंचकर्म विशेषज्ञ डॉक्टर हिमांशु सिंह ने शरीर में दोषों का संतुलन रखने के लिए कुछ खास टिप्स दी हैं, जिनके बारे में हर किसी जो जरूर जानना चाहिए। क्योंकि अगर आप हेल्दी रहना चाहते हैं, तो इन तीनों चीजों को बैलेंस रखना बेहद जरूरी है।
दोषों को संतुलित रखने के लिए आहार
आयुर्वेद के अनुसार हमारे स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए हमारी डाइट का एक बेहद महत्वपूर्ण होता है। आप क्या आहार ले रहे हैं, उसका असर कहीं न कहीं आपके त्रिदोष संतुलन पर भी जरूर पड़ता है। इसलिए अलग-अलग दोषों के अनुसार डाइट का ध्यान भी अलग-अलग तरीके से रखना पड़ता है जैसे -
- वात - अगर वात दोष असंतुलित हो जाता है तो शरीर को गर्मी प्रदान करने वाला खाना खाने की सलाह दी जाती है, जिसमें घी, दूध, मेवे, मीठे फल और पकी हुई सब्जियां शामिल करना चाहिए। वहीं शरीर को ठंडक देने वाला खाना, गैस बनाने वाला खाना और रूखा खाना आदि नहीं खाना चाहिए।
- पित्त - अगर किसी व्यक्ति का पित्त दोष असंतुलित हो गया है, तो शरीर को ठंडा रखने वाला खाना अपने आहार में शामिल करना चाहिए जैसे खीरा, तरबूज, नारियल पानी और हरी सब्जियां आदि। ऐसा खाना खाएं जो स्वाद में हल्का मीठा या हल्का कड़वा हो। वहीं ज्यादा मसालेदार या स्वाद में तीखे और गर्म तासीर वाली चीजों का सेवन न करें।
- कफ - जिनका कफ दोष असंतुलित हो जाता है, तो उन्हें हल्का गर्म, स्वाद में हल्का तीखा और जल्दी पचने वाला खाना अपने आहार में शामिल करना चाहिए जैसे अदरक, लहसुन, काली मिर्च, बाजरा और शहद का सेवन करें। जिन चीजों से परहेज करना है वे हैं, बहुत ज्यादा मीठे, ठंडे व भारी फूड्स और दूध व दूध से बनी चीजें आदि।
(और पढ़ें - वात, पित्त और कफ दोष क्या है)
दोषों को संतुलित करने के लिए योग
आयुर्वेद के अनुसार योग का आपके जीवन में बहुत महत्व है, जो न सिर्फ शरीर को लचीला बनाता है बल्कि नाड़ियों को शुद्ध करने और त्रिदोष को संतुलित रखे का काम काम भी करता है।
- असंतुलित वात दोष - वात की प्रकृति चंचल होती है, इसलिए ऐसे धीमी गति वाले योगासन अभ्यास करने की सलाह दी जाती है, जो शरीर को स्थिर रखने में मदद करें जैसे पवनमुक्तासन, ताड़ासन और पश्चिमोत्तानासन। इसके अलावा अनुलोम-विलोम प्राणायाम भी काफी मददगार होंगे।
- असंतुलित पित्त दोष - पित्त दोष की प्रकृति गर्म होती है और इसलिए शरीर को ठंडक देने वाले योगाभ्यास करने चाहिए, जैसे मार्जरी आसन, शवासन और भुजंगासन आदि। इसमें सीत्कारी और शीतली प्राणायाम भी काफी मदद करेंगे।
- असंतुलित कफ दोष - कफ दोष भारी प्रकृति और स्थिर प्रकृति का होता है और इसलिए शरीर को ऊर्जा प्रदान करने वाले और गर्मी देने वाले योगासन अभ्यास करने चाहिए जैसे तेज गति वाले सूर्य नमस्कार, वीरभद्रासन और त्रिकोणासन। भस्त्रिका और कपालभाति प्राणायाम भी काफी मदद कर सकते हैं।
डिसक्लेमर: इस लेख का उद्देश्य केवल त्रिदोष असंतुलन और उन्हें ठीक करने के बारे में जानकारी है। इस लेख में दी गई किसी भी जानकारी का इस्तेमाल किसी भी बीमारी के इलाज के लिए नहीं किया जाना चाहिए। बल्कि इसके लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करें। thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।