
आशु कुमार दास
आशु कुमार दास एक अनुभवी हेल्थ कंटेंट स्पेशलिस्ट हैं। इन्हें हेल्थ कंटेंट राइटर के तौर पर काम करते हुए 6 ... Read More
Written By: Ashu Kumar Das | Published : April 14, 2026 8:16 PM IST
Medically Verified By: Dr. S K Agarwal
यूपी के लखनऊ में पहली बार किसी व्यक्ति का हार्ट ट्रांसप्लांट किया गया है।
सोमवार की रात थी। अस्पताल की गलियारों में हल्की-हल्की खामोशी थी, लेकिन कुछ दिल तेज़ी से धड़क रहे थे उम्मीद और बेचैनी के साथ। तभी एक फोन कॉल आया… दिल्ली से। खबर थी कि एक 45 वर्षीय महिला को ब्रेन डेड घोषित किया गया है, और उनके परिवार ने अपने सबसे कठिन पल में एक ऐसा फैसला लिया, जो किसी और की जिंदगी बन सकता था। उन्होंने अंगदान के लिए हां कह दी। एक दिल, जो अब किसी शरीर में नहीं धड़क रहा था… वो किसी और के सीने में नई जिंदगी बन सकता था।
लखनऊ के संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (SGPGI) में प्रो. एसके अग्रवाल, प्रो. शांतनु पांडे, प्रो. मिलिंद होते, डॉ. विजय अग्रवाल की टीम के लिए यह सिर्फ एक केस नहीं था, यह जिम्मेदारी थी- एक धड़कन को बचाने की। लेकिन रास्ता आसान नहीं था। डॉक्टरों ने कहा, हमारे पास सिर्फ 6 घंटे थे, एक शहर से दूसरे शहर तक दिल लाने के लिए, ऑपरेशन की तैयारी के लिए, और उसे फिर से धड़काने के लिए। डॉक्टरों की टीम ने कुछ ही घंटों में हार्ट ट्रांसप्लांट की सर्जरी को पूरी तरह से अंजाम दे दिया। ट्रांसप्लांट सर्जरी के बाद हमारे साथ खास बातचीत के दौरान प्रो. एसके अग्रवाल ने बताया कि SGPGI अस्पताल में यह मरीज लगभग 3 महीने पहले आया था। यह एक 40 वर्षीय महिला थी। इस महिला को हृदय को त्वरित एयर एंबुलेंस के माध्यम से लखनऊ लाया गया, जिसके बाद ग्रीन कॉरिडोर का उपयोग किया गया। यह दिल डायलेटेड कार्डियोमायोपैथी नामक हृदय की मांसपेशियों की बीमारी से पीड़ित थी।
दिल को शरीर से निकालने के बाद उसे सिर्फ 6 घंटे के भीतर ट्रांसप्लांट करना होता है।
हमारे साथ खास बातचीत में प्रो. एसके अग्रवाल ने कहा- "यह एक लगभग 40 साल की महिला थी, जो डायलेटेड कार्डियोमायोपैथी नाम की बीमारी से ग्रसित थी। उसकी शारीरिक स्थिति काफी खराब थी, सांस फूलती थी, चल नहीं पाती थी, खाना खाने से पेट में दर्द होता था और दिल की धड़कन भी बढ़ी रहती थी। मरीज काफी एंटी-फेलियर मेडिकेशंस पर थी। वह एक गरीब घर से थी और इसलिए जब उसको यह बताया गया कि उसको इस तरह की समस्या है तो वह लोग बहुत दुखी हुए। लेकिन फिर जब हमने उनको बताया कि हृदय प्रत्यारोपण (Heart Transplant) की एक पॉसिबिलिटी है जिससे कि उनको फायदा हो सकता है, तो वह लोग इसके लिए तैयार हो गए।"
डॉक्टर ने कहा- "यह मरीज हमारे पास करीब तीन महीने पहले आया था कार्डियोलॉजी डिपार्टमेंट में प्रोफेसर रूपाली खन्ना और डॉ. आदित्य कपूर इस केस पर लगे थे। इसके बाद सारे मेडिकल टेस्ट किए गए और फिर कार्डियक सर्जरी डिपार्टमेंट के साथ मिल के यह फैसला लिया कि इस मरीज को हृदय प्रत्यारोपण के लिए लिस्ट किया जा सकता है और हम लोगों ने उसको जो हमारे देश का NOTTO (नोटो)की साइट है, उस पर रेसिपिएंट की लिस्ट में ऐड कर दिया। ट्रांसप्लांट करते समय हमारे सामने जो सबसे बड़ा चैलेंज था कि कब मिलेगा हृदय और कहां से मिलेगा?"
दिल्ली से लखनऊ भेजा गया था हार्ट
उन्होंने बताया कि यदि हृदय लखनऊ या उत्तर प्रदेश के किसी नजदीकी शहर से मिलता, तो प्रक्रिया अपेक्षाकृत आसान हो जाती। ऐसा इसलिए क्योंकि किसी व्यक्ति का हृदय निकालने के बाद उसे ट्रांसप्लांट करने के लिए केवल 6 घंटे का समय होता है। इस अवधि को मेडिकल भाषा में इस्कीमिया टाइम कहा जाता है, यानी वह समय जब हृदय शरीर के बाहर बिना काम किए सुरक्षित रखा जा सकता है। ऐसे में यह जरूरी होता है कि हृदय को 2-3 घंटे के भीतर अस्पताल तक पहुंचा लिया जाए, ताकि ऑपरेशन के लिए आवश्यक 2-3 घंटे का समय भी उसी 6 घंटे की सीमा के भीतर पूरा किया जा सके। यही इस पूरी प्रक्रिया की सबसे बड़ी चुनौती थी।
प्रो. एसके अग्रवाल का कहना है- "इस केस में सौभाग्य से शनिवार रात को दिल्ली के आरएमएल अस्पताल से NOTTO (नेशनल ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट आर्गेनाइजेशन) के माध्यम से सूचना मिली कि एक 45 वर्षीय महिला, जिन्हें ब्रेन डेड घोषित किया गया था, उनके परिजनों ने अंगदान की सहमति दे दी है। यह एक उम्मीद की किरण थी, लेकिन इसके साथ ही लॉजिस्टिक्स की बड़ी चुनौती सामने आ गई। लेकिन इस समस्याओं का समाधान भी हुआ और हम लोग इसको कर पाए। इसके बाद अब मरीज का ह्रदय प्रत्यारोपण किया गया।"
हार्ट ट्रांसप्लांट के बाद महिला की हालात पर अपडेट देते हुए प्रो. एसके अग्रवाल ने बताया- मरीज इस समय ठीक है और वेंटिलेटर से अलग हो चुकी है और अब थोड़ा बहुत उसने खाना-पीना भी शुरू कर दिया है। लेकिन अभी कम से कम 10 दिन उसे अस्पताल में डॉक्टरों की निगरानी में रहना पड़ेगा और उसके बाद वह एक सामान्य जीवन जी सकती है।
यह कहानी सिर्फ एक सर्जरी की नहीं है। यह कहानी है एक परिवार के साहस को, जिसने दुख की घड़ी में अंगदान का फैसला लिया, डॉक्टरों की मेहनत और तैयारी की, और उस उम्मीद की, जो हर धड़कन के साथ फिर से जन्म लेती है। यूपी का यह पहला हार्ट ट्रांसप्लांट न सिर्फ एक मेडिकल उपलब्धि है, बल्कि यह संदेश भी है कि जब विज्ञान, समय और इंसानियत एक साथ आते हैं, तो नामुमकिन भी मुमकिन हो जाता है।
अस्वीकरण: प्रिय पाठकों यह आर्टिकल केवल सामान्य जानकारी और सलाह देता है। यह किसी भी तरह से चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है। इसलिए अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करें। thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।
हार्ट ट्रांसप्लांट एक जटिल और महंगी सर्जरी होती है। भारत में इसका कुल खर्च आमतौर पर 15 लाख से 30 लाख रुपये तक हो सकता है। इसमें डोनर हार्ट की व्यवस्था, सर्जरी, ICU में देखभाल, दवाइयां और डॉक्टरों की फीस शामिल होती है। सरकारी अस्पतालों में यह खर्च अपेक्षाकृत कम हो सकता है, जबकि निजी अस्पतालों में ज्यादा होता है। सर्जरी के बाद मरीज को जीवनभर इम्यूनो-सप्रेसेंट दवाइयां लेनी पड़ती हैं, जिनका खर्च हर महीने 10,000 से 30,000 रुपये तक हो सकता है। कुछ मामलों में आयुष्मान भारत जैसी सरकारी योजनाओं से आर्थिक मदद भी मिल जाती है।
हार्ट ट्रांसप्लांट के बाद छाती में चलगे चीरे के कारण दर्द और सूजन की परेशानी होती है। डॉक्टर बताते हैं कि हार्ट ट्रांसप्लांट के बाद इस प्रकार की समस्या 4 से 6 सप्ताह तक रहती थी। इसके बाद जीवन लगभग सामान्य ही हो जाता है।