मूत्र पथ में संक्रमण (Urinary tract infections)

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मूत्रप्रणाली के किसी भी हिस्से में होने वाले इंफेक्शन को मूत्र पथ में संक्रमण कहा जाता है और इसे अंग्रेजी में यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन और यूटीआई के नाम से जाना जाता है। मूत्राशय में होने वाले संक्रमण यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन का सबसे आम प्रकार होता है और इसके मामले भी काफी देखे जाते हैं। वहीं किडनी में होने वाला संक्रमण जिसे पायलोनेफ्राइटिस भी कहा जाता है, वह भी मूत्र पथ में संक्रमण का एक प्रकार है और इसके मामले भी काफी कम देखे जाते हैं। यूटीआई एक आम समस्या है और विशेष रूप से महिलाओं में इसके मामले काफी देखे जाते हैं। लगभग आधी से ज्यादा महिलाओं को अपने जीवन में एक बार मूत्र पथ में संक्रमण जरूर होता है। मूत्र पथ में संक्रमण के बारे में माना जाता है, कि यह समस्या ठीक हो जाती है लेकिन कई बार इससे गंभीर जटिलताएं भी पैदा हो सकती हैं।

आंकड़ों के अनुसार यूटीआई एक प्रचलित प्रसारित संक्रमण है, जो हर साल लगभग 15 करोड़ लोगों को प्रभावित करता है। हर तीन में से एक महिला 24 साल की उम्र से पहले ही मूत्र पथ में संक्रमण से संक्रमित हो जाती है और वहीं लगभग 50 फीसद महिलाएं 35 साल से पहले जीवन में एक बार यूटीआई से ग्रसित हो जाती हैं। वहीं मूत्र पथ में संक्रमण से संक्रमित होने वाली 30 प्रतिशत महिलाएं ऐसी भी हैं, जिन्हें यह संक्रमण फिर से हो जाता है जिसे आरयूटीआई (rUTI) कहा जाता है।

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मूत्र पथ में संक्रमण के प्रकार

संक्रमण ने आपके मूत्र पथ का कौन सा हिस्सा प्रभावित किया है, उसके आधार पर मूत्र पथ में संक्रमण को चार अलग-अलग प्रकारों में रखा गया है -


  • मूत्राशय - इस स्थिति को सिस्टाइटिस के नाम से जाना जाता है।

  • किडनी - अगर मूत्र पथ में संक्रमण आपके गुर्दे प्रभावित हुए हैं, तो उसे पायलोनेफ्राइटिस के नाम से जाना जाता है।

  • मूत्रवाहिनी - अगर गुर्दे से मूत्राशय में पेशाब को पहुंचाने वाली नली में संक्रमण होना भी मूत्र पथ में संक्रमण का एक प्रकार है।

  • मूत्रमार्ग - पेशाब को मूत्राशय से बाहर निकालने वाली नली में होने वाले संक्रमण को यूरेथ्राइटिस कहा जाता है।

मूत्र पथ में संक्रमण के लक्षण

पेशाब करते समय तीव्र जलन व दर्द महसूस होना मूत्र पथ में संक्रमण का सबसे मुख्य प्रकार है। इसके साथ-साथ पेट के किसी हिस्से में दर्द होना और कभी-कभी पीठ में दर्द भी महसूस हो सकता है। पेशाब करने की तीव्र इच्छा होना और सिर्फ कुछ ही बूंदें निकल पाना भी मूत्र पथ में संक्रमण एक महत्वपूर्ण लक्षण हो सकता है। इसके अलावा आपको शरीर में हल्का दर्द, बुखार और थकान जैसे लक्षण भी देखने को मिल सकते हैं। मूत्र पथ में संक्रमण होने पर विकसित होने वाले अन्य लक्षणों में आमतौर पर निम्न शामिल हैं -


  • पेशाब का रंग धुंधला होना

  • पेशाब में खून आना (जो आमतौर पर छोटी उम्र की महिलाओं में ज्यादा देखा जाता है)

  • पेशाब से अजीब बदबू आना

  • जी मिचलाना

  • उल्टी आना

  • पीठ में दर्द होना

  • ठंड लगना

  • रात के समय पसीने आना

  • त्वचा में लालिमा बढ़ जाना

  • उलझन महसूस होना (खासतौर पर बुजुर्ग व्यक्तियों में)


डॉक्टर को कब दिखाएं?


मूत्र पथ में संक्रमण का इलाज जल्द से जल्द किया जाना जरूरी होता है और ऐसा न होने पर कई बार स्थिति गंभीर हो जाती है। मूत्र पथ में संक्रमण मरीज को न सिर्फ शारीरिक रूप से बल्कि मानसिक रूप से भी प्रभावित कर सकता है। इसलिए अगर आपको उपरोक्त में से कोई भी लक्षण महसूस होता है, तो ऐसे में जल्द से जल्द डॉक्टर से बात कर लेनी चाहिए।

मूत्र पथ में संक्रमण के कारण

सरल शब्दों में कहें तो मूत्र पथ में संक्रमण को ब्लैडर इंफेक्शन के रूप जाना जाता है। यह आमतौर पर संक्रमण फैलाने वाले सूक्ष्म जीव मूत्र पथ में घुस जाने के कारण होता है। मूत्र पथ में घुस कर ये रोगाणु अपनी संख्या बढ़ाने लग जाते हैं और फिर उसके बाद संक्रमण फैलना शुरू हो जाता है। मूत्र पथ में संक्रमण काफी दर्दनाक और परेशान कर देने वाली समस्या है और अगर इसका समय रहते इलाज न किया जाए तो यह गुर्दों को प्रभावित कर सकती है।

मूत्र प्रणाली उन अंगों से मिलकर बनी है, जो पेशाब को शरीर से बाहर निकालने में मदद करते हैं इसमें मुख्य रूप से गुर्दे, मूत्रवाहिनी, मूत्राशय और मूत्रमार्ग शामिल हैं। मूत्र पथ में संक्रमण का कारण बनने वाले रोगाणु आमतौर पर मूत्रमार्ग के माध्यम से मूत्र प्रणाली तक पहुंचते है और फिर संक्रमण फैला देते हैं।

मूत्र पथ में संक्रमण का कारण बनने वाले ज्यादातर प्रकार के रोगाणु आमतौर पर मानव मल में ही पाए जाते हैं। इसलिए ये रोगाणु किसी व्यक्ति की आंतों में या गुदा के आसपास होना भी एक सामान्य बात है। जब ये रोगाणु किसी तरह से मूत्र प्रणाली तक पहुंच जाते हैं, तो फिर संक्रमण फैलने लग जाता है।

जोखिम कारक

पुरुषों से ज्यादा महिलाओं में यूटीआई के मामले देखे जाते हैं और ऐसा इसलिए क्योंकि महिलाओं के मूत्रमार्ग का आकार पुरुषों से काफी छोटा होता है। पुरुषों के मूत्रमार्ग की लंबाई लगभग 20 सेंटीमीटर होती है जबकि महिलाओं में सिर्फ 4 सेंटीमीटर का मूत्रमार्ग होता है और इसलिए महिलाओं के मूत्र पथ में रोगाणुओं का पहुंचना काफी आसान रहता है। वहीं बुजुर्ग व्यक्ति और बच्चों को भी यूटीआई होना का खतरा थोड़ा ज्यादा रहता है। अल्जाइमर रोग से ग्रसित व्यक्तियों में यूटीआई होने का खतरा काफी अधिक देखा गया है। मूत्र पथ में संक्रमण होने के निम्न जोखिम कारक हैं -


  • अस्वच्छ टॉयलेट का इस्तेमाल करना

  • पोटी ट्रेनिंग के दौरान बच्चों की उचित सफाई न रख पाना

  • टॉयलेट का इस्तेमाल करने के बाद अंगों को अच्छे से न धोना

  • यौन संबंध बनाने के दौरान (विशेष रूप से नए यौन साथी के साथ)

  • गर्भवती महिलाएं

  • प्रोस्टेट का आकार बढ़ना

  • डायबिटीज या किडनी स्टोन होना

  • पर्याप्त पानी न पीना

  • पहले कभी यूटीआई हुआ होना

मूत्र पथ में संक्रमण का निदान

यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन का निदान आमतौर पर मरीज को महसूस हो रहे लक्षणों के आधार पर ही किया जाता है। यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन के निदान के दौरान डॉक्टर आपको सबसे पहले यूरिन टेस्ट कराने की सलाह देते हैं। इस टेस्ट की मदद से यूरिन में खून या पस की मौजूदगी का पता लगाया जा सकता है। आवश्यकता के अनुसार डॉक्टर आपको यूरिन कल्चर कराने की सलाह भी दे सकते हैं, जिसमें संक्रमण का कारण बनने वाले रोगाणु की पहचान की जाती है, जिसकी मदद से उसे नष्ट करने की दवाओं का चुना जाता है। संक्रमण के कारण मूत्र प्रणाली में हुई क्षति व अन्य समस्याओं का पता लगाने के लिए डॉक्टर आपको निम्न टेस्ट कराने की सलाह दे सकते हैं -


  • सीटी स्कैन

  • किडनी का अल्ट्रासाउंड

  • किडनी स्कैन

  • इंट्रावेनस पायलोग्राम

  • वोइडिंग सिस्टोयूरेथ्रोग्राम

मूत्र पथ में संक्रमण का इलाज

यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन का इलाज में आमतौर पर एंटीबायोटिक, एंटीपायरेटिक और पेन किलर दवाओं को इस्तेमाल में लाया जाता है। गंभीर मामलों में कुछ गंभीर मामलों में एंटीबायोटिक दवाओं को इंट्रावेनस (नसों में सुई लगाकर) से दिया जा सकता है। हालांकि, मूत्र पथ में संक्रमण का इलाज उसके प्रकार पर भी निर्भर करता है, जिसके बारे में जानकारी निम्न दी गई है -


  • सिस्टाइटिस - इसमें नाइट्रोफुरंटोइन, को-ट्रिमोक्सॉल और सिप्रोफ्लोक्सासिन का इस्तेमाल किया जाता है, जिनका कोर्स आमतौर पर 5 दिनों तक चलता है।

  • पायलोनेफ्राइटिस - इसमें पाइपरएसिलिन, टेजोबैक्टम और अर्टेपेनम दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है और इन्हें आमतौर पर इंट्रावेनस से दिया जाता है। इन दवाओं का कोर्स आमतौर पर 10 दिनों तक चलता है।

  • प्रोस्टेटाइटिस - मूत्र पथ में संक्रमण के इस प्रकार का इलाज करने के लिए आमतौर पर डॉक्सीसाइक्लिन, को-ट्राइमोक्साजोल और सिप्रोफ्लोक्सासिन दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है। इन दवाओं का कोर्स आमतौर पर 5 हफ्ते तक चलता है।


मरीज को अन्य लक्षण हो रहे हैं, तो उसके अनुसार अन्य दवाएं भी दी जा सकती है जैसे बुखार के लिए एंटीपायरेटिक्स और दर्द को कम करने के लिए पेन-किलर आदि। एंटीबायोटिक दवाओं से साइड-इफेक्ट्स भी हो सकते हैं जिनमें आमतौर पर गंभीर दस्त, कोलन क्षतिग्रस्त होना और यहां तक कि कुछ दुर्लभ मामलों में मरीज की मृत्यु होना आदि भी शामिल हैं।

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