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Written By: Yogita Yadav | Published : August 17, 2019 6:50 PM IST
निमोनिया का कारण आमतौर पर न्युमोकोकल जीवाणु होता है, स्ट्रैप्टोकोकस निमोनिया जीवाणु जनित निमोनिया के 2/3 भाग के लिए उत्तरदायी होता है। यह फेफड़ों का एक घातक संक्रमण है जिससे संक्रमित लगभग 25 प्रतिशत लोगों की मृत्यु हो जाती है। © Shutterstock
निमोनिया और ब्रोंकाइटिस (Bronchitis and pneumonia) दोनों ही ऐसी बीमारियां हैं जिसमें व्यक्ति का सांस लेना दूभर हो जाता है। इसमें सांस लेने में दिक्कत आती है। शरीर में कमजोरी होने लगती है और अत्यधिक बलगम बनने के कारण मरीज की हालत गंभीर हो जाती है। पर एक खास तरह के जीवाणु के कारण जब ये दोनों बीमारियां मरीज को घेर लेती हैं, तो यह घातक स्थिति भी हो सकती है। इसमें जान जाने का भी जोखिम रहता है। दूरदर्शन की मशहूर एंकर नीलम शर्मा की मौत ब्रोंकाइटिस निमोनिया (Bronchitis and pneumonia) के ही कारण हुई।
असल में ब्रोंकाइटिस घातक और दीर्घकालिक दो तरह का हो सकता है। घातक ब्रोंकाइटिस को स्वस्थ रोगियों, जिनमें बीमारी का पिछला इतिहास न हो, में वृहद् वायु मार्ग के घातक जीवाणुजनित या विषाणुजनित संक्रमण के रूप में सामने आता है। यह प्रतिवर्ष 1000 में से 40 वयस्कों को प्रभावित करता है और इसमें प्रमुख श्वासनली एवं बहुशाखित श्वसनी में अस्थायी जलन होती है।
प्रायः यह विषाणु संक्रमण के कारण होता है। इसीलिए प्रतिरोध सक्षम लोगों में इसके लिए एंटीबॉयटिक उपचार नहीं किया जाता। विषाणु जनित ब्रोंकाइटिस के लिए कोई प्रभावशाली उपचार नहीं है। घातक ब्रोंकाइटिस का एंटीबॉयटिक दवाओं के द्वारा उपचार प्रचलित है, लेकिन यह विवादस्पद भी है क्यूंकि इसके कारण पड़ने वाले संभावित गौण प्रभावों (मिचली और उल्टी) की तुलना में इससे होने वाले लाभ अत्यंत सामान्य है। कभी कभी तीव्र ब्रोंकाइटिस के कारण होने वाली खांसी से राहत के लिए बीटा2 पदार्थों का प्रयोग किया जाता है। हाल में हुई सुनियोजित समीक्षाओं में यह पाया गया कि इसके प्रयोग के समर्थन में कोई भी प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
दीर्घकालिक ब्रोन्काइटिस की घातक तीव्रता प्रायः विषाणुजनित और असंक्रामक कारणों से होती है। 50 प्रतिशत रोगी हेमोफीलस इन्फ्ल्युएंज़ा (Haemophilus influenzae), स्ट्रैप्टोकोकस निमोनिया (Streptococcus pneumoniae) या मोरैक्सेला कटेर्हेलिस (Moraxella catarrhalis) से ग्रसित होते हैं। एंटीबॉयटिक तभी प्रभावी देखी गयी हैं जब यह तीन लक्षण दिखाई पड़ते हैं- श्वास लेने में अधिक कठिनाई का होना, अधिक बलगम आना और पीप का बनना। ऐसी अवस्थाओं में मौखिक माध्यम से 500 मिलीग्राम एमोक्सिसिलिन हर 8 घंटे पर 5 दिन तक या 100 मिलीग्राम डोक्सीसाइक्लिन मौखिक माध्यम द्वारा ही 5 दिन तक दी जानी चाहिए।
निमोनिया यह कई प्रकार की परिस्थितियों में हो जाता है। साथ ही उपचार भी परिस्थिति के अनुसार बदलता रहता है। यह अधिक उम्र के लोगों या उन लोगों के लिए जो प्रतिरोध अक्षमता से ग्रस्त हैं, जानलेवा है। इसका सबसे प्रचलित उपचार एंटीबॉयटिक दवाएं है और यह अपने विपरीत प्रभाव और कार्यसाधकता के अनुसार बदलकर प्रयोग की जाती हैं।
5 साल से कम उम्र के बच्चों में भी निमोनिया मृत्यु का एक प्रमुख कारण है। निमोनिया का कारण आमतौर पर न्युमोकोकल जीवाणु होता है, स्ट्रैप्टोकोकस निमोनिया जीवाणु जनित निमोनिया के 2/3 भाग के लिए उत्तरदायी होता है। यह फेफड़ों का एक घातक संक्रमण है जिससे संक्रमित लगभग 25 प्रतिशत लोगों की मृत्यु हो जाती है।
निमोनिया से पीड़ित रोगी के अत्यंत उत्तम इलाज के लिए निम्न का मूल्यांकन कर लेना बहुत ज़रूरी है;- निमोनिया की गंभीरता (जिसमे इलाज का स्थान भी शामिल है जैसे कि घर, अस्पताल या गहन संरक्षण केंद्र), संक्रमण के कारक जीव की पहचान, सीने के दर्द का अनुभव न कर पाना, अतिरिक्त आक्सीज़न की आवश्यकता, शारीरिक चिकित्सा की आवश्यकता, जलयोजन की आवश्यकता, ब्रोंकोडडाईलेटर्स (फेफड़ों तक वायु पहुंचाने वाले मार्ग को फैलाने वाली दवा) की आवश्यकता और फेफड़े में फोड़ा होने की अवस्था या फेफड़ों की असामान्य सूजन की अवस्था के कारण हो सकने वाली कठिनताओं का मूल्यांकन।
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