मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं जैसे तनाव, बेचैनी और निराशा या डिप्रेशन के मरीज़ों की संख्या देश में लगातार बढ़ती जा रही है। 10 अक्टूबर का दिन विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस के तौर पर मनाया जाता है। साल-दर-साल सामने आ रहे आंकड़ें भारत में मानसिक समस्याओं से पीड़ित लोगों की संख्या के बारे में चौंकाने वाले खुलासे कर रहे हैं। हमारे देश कि विडंबना है कि समाज में मानसिक समस्याओं से परेशान लोगों को पागल घोषित कर देता है लेकिन सच यह नहीं है। पर निश्चित रुप से समाज का यह व्यवहार लोगों को अपनी समस्याओं के बारे में खुलकर बात करने से रोकता है। ऐसे में अगर आपके आसपास या आप खुद किसी मानसिक समस्या से परेशान हैं तो इन थेरेपीज़ की मदद ले सकते हैं।
क्लिनिकल थेरेपी : किसी भी मानसिक रोगी को सबसे पहले क्लिनिकल थेरेपी के दौर से गुजरना होता है। इसमें शुरुवाती लक्षणों को देखा जाता है और उस हिसाब से धीरे धीरे उसकी दवाइयों को कम किया जाता है। इस थेरेपी में खासतौर पर मरीज की दवाइयों को मॉनिटर किया जाता है।
इंडिविजुअल थेरेपी : इस थेरेपी में मरीज सीधे एक्सपर्ट से मिलता है और उससे घंटों बातचीत होती है। इसमें एक्सपर्ट उसकी बीमारी से लेकर उसके व्यवहार, नौकरी, पारिवारिक स्थिति और बाकी चीजों की जानकरी इकठ्ठा करता है और उस हिसाब से उसका आगे इलाज किया जाता है।
फैमिली थेरेपी : जैसा कि नाम से ही पता चल रहा है इस थेरेपी में मरीज को अपने परिवार वालों के साथ रहना पड़ता है। ऐसे मरीजों को खासतौर पर परिवार के किसी एक सदस्य का साथ बहुत ज़रूरी होता है इसलिए सेंटर पर भी उनके परिवार के लोग मौजूद रहते हैं।
ग्रुप थेरेपी : इस थेरेपी में मरीज का ध्यान रखने के लिए कुछ एक्सपर्ट लोगों का ग्रुप होता है और उस ग्रुप के सामने ही मरीज को अपनी बातें शेयर करनी होती है। ये एक्सपर्ट लोग खासतौर पर मरीज के व्यवहार का ध्यान रखते हैं और उन्हें बीमारी से उबरने में मदद करते हैं।
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