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ट्यूबरक्लोसिस (टीबी) बैक्टीरिया से फैलने वाली बीमारी है। यह बीमारी से पूरी दुनिया में होने वाली मौतों के 10 सबसे प्रमुख कारणों में से एक है। 2019 में लगभग 1.4 मिलियन लोगों की इस बीमारी से मरने का अनुमान है। बैक्टीरिया प्रजाति माइकोबैक्टीरियम से होने वाली टीबी मुख्य रूप से फेफड़ों को प्रभावित करता है, लेकिन यह बीमारी रीढ़, आंत और मस्तिष्क को भी नुकसान पहुंचा सकती है। 2019 में 26.9 लाख केसेस के साथ भारत में टीबी के सबसे ज्यादा मरीज थे। मल्टी-ड्रग रजिस्टेंस टीबी एक प्रमुख चिंता के रूप में उभर करके सामने आयी है, जो टीबी उन्मूलन के लक्ष्य में बाधा बन रही है। 6 से 9 महीनों के लिए एंटीबायोटिक दवा टीबी के इलाज के लिए सबसे पहले निर्धारित की जाती है। अधिकांश केसेस में मरीज इतने समय में ठीक हो जाते हैं। हाल के सालों में हेल्थकेयर प्रोवाइर, रिसर्चर और आम लोगों ने टीबी का बेहतर मैनेजमेंट करने के लिए नेचुरोपैथी और चिकित्सा की अन्य वैकल्पिक प्रणालियों की क्षमता जांचने में ज्यादा रुचि दिखाई है।
नेचुरोपैथी एक प्रकृति-आधारित दवा पद्धति है जो मानव शरीर को स्वस्थ रहने की क्षमता को बढ़ावा देने के लिए जड़ी-बूटियों, खानपान प्रबंधन, योग और जीवन शैली में बदलाव सहित कई चीजों का उपयोग करती है। बिना दवा के नेचुरोपैथी ज्यादा सुरक्षित है और यहां तक कि कुछ आधुनिक दवाओं के साइड इफेक्ट से निपटने में नेचुरोपैथी शरीर की मदद करती है।
कई हर्बल इलाजों में टीबी से राहत पायी गयी है। जब टीबी विरोधी दवाओं के साथ हर्बल इलाज अमल में लाया जाता है, तो यह शरीर को तेजी से ठीक कने में मदद कर सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हर्बल फॉर्मूलेशन लीवर की विषाक्तता को कम करने में मदद करते हैं। लीवर में यह विषाक्तता एंटीबायोटिक दवाओं के लंबे समय तक सेवन का प्रमुख साइड इफेक्ट होता है।
भारतीय परिवेश में ट्यूबरक्लोसिस बैक्टीरिया व्याप्त हैं। बड़ी संख्या में लोग वर्तमान समय में बैक्टीरिया के वाहक है। बैक्टीरिया आसानी से उस शरीर पर हमला कर सकते हैं जिसकी इम्युनिटी कमजोर होती है, जिस व्यक्ति में पोषक तत्वों की कमी या अन्य बीमारियां होती हैं उन पर भी बैक्टीरिया जल्दी हमला करते हैं। नेचुरोपैथी इम्युनिटी बढ़ाने और वायरस तथा बैक्टीरिया के खिलाफ शरीर की सुरक्षा को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस दिशा में नेचुरोपैथी पद्धति का व्यापक उपयोग और हर्बल इलाज भी ट्यूबरकुलोसिस बीमारी के खिलाफ एक कवच के रूप में कार्य कर सकता हैं।
टीबी दवाओं के विषाक्त प्रभाव को कम करने के लिए कुछ चुनी हुई जड़ी-बूटियों के पौधों के अर्क को अत्यधिक उपयोगी पाया गया है। पौधों के अर्क में फाइटोकेमिकल्स, फ्लेवोनोइड्स और ग्लाइकोसाइड यौगिक एंटी-ऑक्सीडेंट के रूप में कार्य करते हैं और फ्री रेडिकल क्षति को रोकने में मदद करते हैं और सामान्य लीवर एंजाइमों को रिस्टोर करते हैं, जिससे मरीजों के लिए बेहतर रिकवरी सक्षम हो पाती है। वे सीरम एंजाइम, टोटल बिलीरुबिन और प्रोटीन के लेवल को कम करने में भी मदद करते हैं।
2012 में जर्नल ऑफ आयुर्वेद एंड इंटीग्रेटिव मेडिसिन में प्रकाशित एक स्टडी में अश्वगंधा और मल्टी-हर्बल फॉर्मूलेशन च्यवनप्राश का उपयोग टीबी विरोधी दवाओं का सेवन करने वाले मरीजों के लिए एक सहायक थेरेपी के रूप में किया गया था। समय-समय पर इन मरीजों का विश्लेषण करने पर लक्षणों में सुधार के साथ-साथ शरीर के वजन, सामान्य ईएसआर वैल्यू, आईजीए और आईजीएम पैटर्न में सुधार के साथ-साथ आइसोनियाज़िड और पाइरेज़िनमाइड की बायोअवेलबिलिटी (जैव उपलब्धता) में वृद्धि का पता चला।
2004 में इंडियन जर्नल ऑफ ट्रेडिट नोल में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि टीबी विरोधी दवाओं पर मरीजों को जब हर्बल सप्लीमेंट्स एलोवेरा के अर्क, बर्बेरिस एरिस्टाटा रूट, सोलनम नाइग्रम और साथ ही फाइलेन्थस फ्रेटरनस के साथ सप्लीमेंट दिया गया तो 12 हफ्ते के ट्रायल के अंत में सामान्य लीवर एंजाइम गतिविधि दिखाई दी। दूसरी ओर प्लेसीबो ग्रुप के मरीजों ने एएलटी और एएसटी लेवल में वृद्धि देखी जो हेपेटोटॉक्सिसिटी का मार्कर हैं।
आयुर्वेदिक प्रैक्टिस में उपयोग किए जाने वाले कई औषधीय पौधें जैसे कि ए इंडिका (नीम), एपियम ग्रेवोलेंस (अजमोडा), और फ्यूमरिया इंडिका (पिटपापरा), आदि भी टीबी बैक्टीरिया के खिलाफ एंटीमाइक्रोबियल गतिविधि पाई गई है।
साथ ही लहसुन, पुदीना, आंवला, शहद आदि जैसे कई अन्य भारतीय जड़ी-बूटियों, पौधों और इलाज भी मरीजों को टीबी के साइड इफेक्ट से लड़ने और उनके जीवन की गुणवत्ता में सुधार करने में मदद करते हैं।
एंटीबायोटिक रेजिमेन की उपलब्धता के बावजूद टीबी दुनिया भर में हेल्थकेयर पर भारी बोझ बना हुआ है। मल्टी-ड्रग रजिस्टेंस टीबी के आने से सहायक थेरेपी और हर्बल इलाज खोजने की बढ़ती आवश्यकता महसूस की गई है ताकि मरीज को रिकवर होने में मदद की जा सके और केमिकल आधारित दवाओं के जहरीले प्रभाव को नियंत्रित किया जा सके। ऐसे सेनारियो में आधुनिक चिकित्सा और प्राकृतिक चिकित्सा (नेचुरोपैथी) दोनों को शामिल करते हुए टीबी के लिए एक एकीकृत दृष्टिकोण विकसित करने से मरीजों के लिए महत्वपूर्ण इलाज प्रदान में करने में मदद मिल सकती है।
(इनपुट्स: डॉ श्रीकांत एच एस, सीनियर नेचुरोपैथ, जिंदल नेचरक्योर इंस्टीट्यूट)