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थायराइड हार्मोन के असंतुलित होने पर पैरों के तलवों में जलन होती है।
थायराइड अवेयरनेस मंथ (Thyroid Awareness Month) के मौके पर, फोकस एक ऐसी कंडीशन पर जाता है जो भारत में लगभग दस में से एक एडल्ट को प्रभावित करती है। ये मेडिकल कंडीशन है थायराइड। शुरुआती स्टेज में थायराइड के लक्षण इतने हल्के होते हैं कि लोग इसे नजरअंदार कर देते हैं। यही कारण है कि भारत में थायराइड के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं।
आईसीएमआर का डाटा बताता है भारत में 10 में से 1 युवक थायराइड जैसी बीमारी से जूझ रहा है। पुरुषों के मुकाबले थायराइड की बीमारी महिलाओं को ज्यादा हो रही है। पिछले कुछ सालों में थायराइड जैसी बीमारी का पता तेजी से चल रहा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि पहले की तुलना में थायराइड के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ी है।
आंकड़ों की बात करें तो भारत के ग्रामीण इलाकों की तुलना में शहरी इलाकों में थायराइड के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ी है। शहरी लाइफस्टाइल, स्ट्रेस, कुछ इलाकों में आयोडीन का असंतुलन और ऑटोइम्यून कंडीशन में बढ़ोतरी ने भी थायराइड जैसी बीमारी में अपना योगदान बढ़ाया है। पहले, थकान, वजन बढ़ना, बाल झड़ना या मूड में बदलाव जैसे लक्षणों को अक्सर स्ट्रेस, उम्र बढ़ने या न्यूट्रिशन की कमी कहकर नजरअंदाज कर दिया जाता था। पर समय के साथ लोगों की सोच में कई प्रकार के बदलाव आए हैं। लोग अब शरीर में होने वाले छोटे से बदलाव पर भी डॉक्टर की सलाह लेते हैं, जिससे थायराइड डिसऑर्डर का पता जल्दी चलता है। इसी वजह से भारत में थायराइड का बोझ बढ़ता ही जा रहा है।
थायराइड की बीमारियों में सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि शुरुआती लक्षण हल्के होते हैं और आसानी से नजरअंदाज हो जाते हैं। हाइपोथायरॉइडिज्म में आमतौर पर लगातार थकान, बिना किसी वजह के वजन बढ़ना, कब्ज, स्किन का रूखा होना, बाल झड़ना, बहुत ज्यादा ठंड लगना, पीरियड्स का अनियमित होना और मूड खराब होना जैसी समस्या नजर आती है। वहीं, हाइपरथायरॉइडिज्म की बात करें तो इसमें मरीज का वजन कम होना, कंपकंपी, घबराहट, घबराहट, गर्मी बर्दाश्त न होना और नींद में गड़बड़ी जैसी समस्याएं होती हैं।
ये लक्षण अक्सर मानसिक तनाव और लाइफस्टाइल में होने वाली गड़बड़ी की वजह से होते हैं। पर विभिन्न कारणों से युवा इन लक्षणों को नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन ऐसा करना पूरी तरह से गलत है। बिना किसी कारण लगातार शारीरिक थकान, अचानक से शरीर का वजन बढ़ना या घटना, बालों झड़ना किसी भी परिस्थिति में नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
आम तौर पर देखे जाने वाले थायराइड डिसऑर्डरसबसे ज्यादा डायग्नोस होने वाली थायराइड की बीमारी हाइपोथायरॉइडिज्म है, जो अक्सर हाशिमोटो थायरॉयडिटिस की वजह से होती है। हाइपोथायरायडिज्म ग्रेव्स डिजीज, टॉक्सिक एडेनोमा, टॉक्सिक मल्टीनोड्यूलर गोइटर, या सबएक्यूट थायरॉयडिटिस की वजह से हो सकता है। दूसरी बीमारियों में घेंघा, थायराइड नोड्यूल और बहुत कम मामलों में, थायराइड कैंसर शामिल हैं। समय पर सही ब्लड टेस्ट और अल्ट्रासाउंड करके किस प्रकार का थायराइड आपको इसकी जानकारी मिल सकती है।
थायराइड की बीमारियों का इलाज बीमारी और उसकी गंभीरता के आधार पर अलग-अलग होता है। हाइपोथायरायडिज्म को थायरोक्सिन जैसी दवा और लाइफस्टाइल के जरिए मैनेज किया जाता है। हाइपोथायरायडिज्म में मरीज को कितनी मात्रा में थायरोक्सिन देनी चाहिए ये ब्लड टेस्ट के रिजल्ट पर निर्भर करता है। थायरोक्सिन दवा मुख्य रूप से हार्मोन को रिप्लेस करती है और थायराइड हार्मोन को संतुलित करके इस बीमारी से बचाती है। इसके दूसरी तरफ हाइपरथायरायडिज्म जैसी स्थिति में एंटी थायराइड दवाएं, रेडियोएक्टिव आयोडीन और कुछ गंभीर मामलों में मरीज की स्थिति को सही करने के लिए सर्जरी तक की जरूरत पड़ सकती है।
थायराइड नोड्यूल को आमतौर पर स्कैन और नीडल टेस्ट से मॉनिटर किया जाता है, और सिर्फ कुछ ही मामलों में सर्जरी की जरूरत होती है। ऑटोइम्यून थायरॉयडिटिस के कुछ मामलों में, जहां हार्मोन लेवल नॉर्मल होते हैं, तुरंत इलाज की जरूरत नहीं होती है। थायराइड में मरीज का इलाज अलग-अलग स्थिति में विभिन्न प्रकार और दवाओं के जरिए किया जाता है। थायराइड के मरीज का इलाज व्यक्ति की उम्र, प्रेग्नेंसी की स्थिति, थायराइड में कौन से लक्षण समय के साथ सामने आ रहे हैं और कोई अन्य मेडिकल कंडीशन है या नहीं जैसी स्थिति को ध्यान में रखकर किया जाता है। एक बार स्टेबल होने के बाद, ज्यादातर मरीजों को सिर्फ समय-समय पर मॉनिटरिंग की जरूरत होती है और वे पूरी तरह से नॉर्मल जिंदगी जी सकते हैं।
यूं तो थायराइड के इलाज में दवा ही सबसे सटीक इलाज होती है। लेकिन दवा के साथ लाइफस्टाइल भी सही हो तो दवा ज्यादा असरदार हो जाती है। थायराइड में दवा के साथ सही मात्रा में आयोडीन, सेलेनियम, जिंक और प्रोटीन वाली बैलेंस्ड डाइट लेना बहुत जरूरी होता है। सही खानपान के जरिए मेटाबॉलिज्म सही होता है। ये मूड स्विंग्स को भी बेहतर बनाता है। योग, मेडिटेशन, गहरी सांस लेने और अच्छी नींद की आदतों से स्ट्रेस मैनेजमेंट खास तौर पर जरूरी है, क्योंकि स्ट्रेस ऑटोइम्यून कंडीशन को और खराब कर सकता है।