अल्‍जाइमर के इलाज में काम आएंगी ये दो भारतीय औषधियां

आधुनिक जीवनशैली के कारण होने वाली इन बीमारियों का हो सकता है इन औषधियों से बचाव।

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Written By: Yogita Yadav | Published : October 5, 2018 1:37 PM IST

आधुनिक जीवनशैली के साथ ही फैल रही बीमारियों में डिमेंशिया और अल्‍जाइमर को सबसे ज्‍यादा खतरनाक माना जा रहा है। सबसे ज्‍यादा परेशान करने वाली बात यह है कि अभी तक इसके पुख्‍ता कारण नहीं ढूंढे जा सके हैं। अल्‍जाइमर ऐसी मानसिक बीमारी है जो धीरे-धीरे पनपती है, इसके कारण सोचने और समझने की क्षमता कमजोर हो जाती है। हालांकि यह धीरे-धीरे पनपती है, लेकिन लोग इसे सामान्‍य मेमोरी कम होना समझकर नजरंदाज करते रहते हैं। इससे यह एक दिन गंभीर रूप अख्तियार कर लेती है। वैज्ञानिक अब भी लगातार इस बीमारी पर शोध कर रहे हैं। इन्‍हीं शोधों में एक नई खोज यह बताती है कि अल्‍जाइमर से बचाव में ये दो भारतयी औषधियां काम आ सकती हैं।

क्‍या है अल्‍जाइमर

अल्जाइमर मानसिक बीमारी है जो धीरे-धीरे होती है। इसकी शुरूआत मस्तिष्क के स्मरण-शक्ति को नियंत्रित करने वाले भाग में होती है और जब यह मस्तिष्क के दूसरे हिस्से में फैल जाती है तब भावों और व्यवहार की क्षमता को प्रभावित करने लगता है। इसके कारण अभी भी पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हैं। मानसिक रूप से आप खुद को व्यस्त रखकर इस बीमारी से बचाव कर सकते हैं। डांस, योग और ध्यान लगायें, किताबें पढ़ें, बोर्ड गेम्स आदि क्रियाकलापों से मष्तिष्क मजबूत होता है और इस बीमारी से बचाव होता है। लेकिन अगर यह बीमारी हो गई है तो प्राकृतिक उपचार आजमायें।

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काम का है पीपल

अल्जाइमर से जूझ रहे लोगों के लिए एक शोध से उम्मीद जगी है। शोध में यह बात सामने आई है कि अल्जाइमर के एन्जाइम की गतिशीलता को रोकने में पीपल काफी मददगार हो सकता है। पीपल के तने से लिये गए टिश्यू का लेबोरेटरी ट्रायल इसके समर्थन में रहा। गौरतलब है कि यह शोध चौधरी देवीलाल विश्वविद्यालय के बायो टेक विभाग ने पीपल के पेड़ की मेडिसन प्रापर्टी पर किया गया।

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दिमाग के लिए हल्दी

हल्दी में पाए जाने वाले प्राकृतिक तत्व करक्यूमिन के नैनो पार्टिकल के रूप में उपयोग से अल्जाइमर का इलाज हो सकता है। नैनो साइज के चलते हल्दी में मौजूद करक्यूमिन कंपाउंड को दिमाग तक आसानी से पहुंचाया जा सकेगा। वहीं दूसरी ओर याददाश्त बनाए रखने के लिए आवश्यक न्यूरोन्स के रिजनरेशन में भी यह खोज प्रभावी हो सकती। गौरतलब है, यह खोज आईआईटीआर के निदेशक डॉ. कैलाश चंद गुप्ता और साइंटिस्ट डॉ. रजनीश कुमार चतुर्वेदी की टीम ने की है।

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