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ये 9 बीमारियां धीरे-धीरे नसों को पहुंचा सकती हैं नुकसान, समय पर जांच और इलाज है जरूरी

अगर नसों में कमजोरी की वजह से हाथ-पैरों में झनझनाहट या जलन जैसी समस्याएं होती हैं, तो इन संकेतों की अनदेखी बिल्कुल न करें। ये पेरिफेरल न्यूरोपैथी के लक्षण हो सकते हैं, जो कई बीमारियों से जुड़े हो सकते हैं।

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Written By: Anju Rawat | Published : July 9, 2026 8:51 PM IST

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Medically Verified By: Dr. (Prof) Vinit Banga

Peripheral Neuropathy: क्या आपको हाथ-पैरों पर चुभने वाली जलन, सुन्नपन और झनझनाहट जैसा महसूस होता है। इन समस्याओं की वजह से आपकी पूरी दिनचर्या प्रभावित हो रही है या रात में नींद नहीं आती है? अगर ऐसे लक्षण दिख रहे हैं, तो ये पेरिफेरल न्यूरोपैथी के संकेत हो सकते हैं। आमतौर पर ज्यादातर लोग इन लक्षणों को समझ नहीं पाते हैं और सालों तक इनकी अनदेखी करते हैं। इससे समस्या बढ़ती जाती है और बाद में कई मुश्किलों से गुजरना पड़ता है। पेरिफेरल न्यूरोपैथी की वजह से शरीर का संतुलन बिगड़ने लगता है और कुछ मामलों में लोगों के लिए चलना-फिरना तक मुश्किल हो सकता है। अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर ये पेरिफेरल न्यूरोपैथी क्या है?

आपको बता दें कि पेरिफेरल न्यूरोपैथी उन स्थितियों का एक समूह है, जिनमें पेरिफेरल नर्वस सिस्टम को नुकसान पहुंचता है। इस स्थिति में दिमाग और शरीर के बीच में संदेशों का संचार प्रभावित हो सकता है और कई तरह की समस्याएं होने लगती हैं। लेकिन, पेरिफेरल न्यूरोपैथी क्यों और कैसे होता है? आइए, विस्तार से जानते हैं कि कौन-सी बीमारियां पेरिफेरल न्यूरोपैथी का कारण बनती हैं।

ये बीमारियां नसों को पहुंचा सकती हैं नुकसान

नसों को सिर्फ शरीर में पोषक तत्वों की कमी की वजह से नुकसान नहीं पहुचंता है, इसके पीछे कई बीमारियां भी जिम्मेदार हो सकती हैं। इनमें शामिल हैं-

1. डायबिटीज

फरीदाबाद के फोर्टिस एस्कॉर्ट्स अस्पताल में न्यूरोलॉजी विभाग के डायरेक्टर और एचओडी व जाने-माने न्यूरोलॉजिस्ट डॉक्टर विनीत बांगा बताते हैं कि खराब खान-पान और लाइफस्टाइल की वजह से डायबिटीज रोगियों की संख्या में लगातार वृद्धि देखने को मिल रही है। यह एक ऐसा रोग है, जिसे नसों को नुकसान पहुंचाने का सबसे आम कारण माना जाता है। जब डायबिटीज रोगियों में लंबे समय तक ब्लड शुगर लेवल बढ़ा हुआ रहता है, तो इससे हाथों और पैरों में नसों से जुड़ी समस्याएं होनी शुरू हो सकती हैं। डायबिटीज रोगियों को हाथ-पैरों में जलन और सुन्नपन हो सकता है।

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2. मल्टीपल स्क्लेरोसिस

मल्टीपल स्क्लेरोसिस (MS) भी नसों को नुकसान पहुंचा सकता है। यह एक ऑटोइम्यून बीमारी है, जिसमें प्रतिरक्षा प्रणाली नसों की सुरक्षात्मक परत (मायलिन) को नुकसान पहुंचाती है। इसकी वजह से नसें धीरे-धीरे कमजोर होने लगती हैं और दिमाग-शरीर के बीच में संदेशों का संचार प्रभावित हो सकता है।

3. मल्टीफोकल मोटर न्यूरोपैथी (MMN)

National Institute of Neurological Disorders and Stroke (NINDS) के अनुसार, मल्टीफोकल मोटर न्यूरोपैथी भी नसों को बुरी तरह से प्रभावित कर सकती है। यह एक दुर्लभ ऑटोइम्यून बीमारी है, जिसकी वजह से धीरे-धीरे हाथों की मांसपेशियों में कमजोरी आती है। यह समस्या महिलाओं की तुलना में पुरुषों में ज्यादा देखने को मिलती है।

4. क्रॉनिक किडनी-लिवर रोग

किडनी और लिवर शरीर के सबसे महत्वपूर्ण अंग हैं। हालांकि, आजकल लिवर और किडनी से जुड़े रोगों के मामलों में काफी तेजी देखने को मिल रही है। जब किडनी और लिवर से जुड़ी बीमारियां होती हैं, तो खून में विषैले पदार्थों की मात्रा बढ़ सकती है, इससे नसों के ऊतकों को नुकसान पहुंचता है। इससे नसों में धीरे-धीरे कमजोरी भी आ सकती है और पेरिफेरल न्यूरोपैथी विकसित हो सकती है।

5. वायरस और संक्रमण

NINDS के अनुसार, कई तरह के संक्रमण भी नसों के ऊतकों पर हमला कर सकते हैं और न्यूरोपैथी को विकसित कर सकते हैं। वैरीसेला-जोस्टर वायरस, वेस्ट नाइल वायरस, साइटोमेगालोवायरस और हर्पीज सिम्प्लेक्स वायरस नसों को प्रभावित कर सकते हैं। ये संक्रमण पेरिफेरल न्यूरोपैथी का कारण बन सकते हैं और इसकी वजह से तेज चुभने वाला दर्द महसूस हो सकता है।

6. हाइपोथायरॉयडिज्म

जब थायराइड ग्रंथि पर्याप्त मात्रा में हार्मोन का उत्पादन नहीं कर पाती है, तो हाइपोथायराइडिज्म की स्थिति हो सकती है। इस स्थिति में व्यक्ति का वजन तेजी से बढ़ सकता है। लंबे समय तक थायराइड हार्मोन की कमी से नसों पर दबाव पड़ता है, इससे सूजन हो सकती है और नसें कमजोर हो सकती हैं। इससे पैरों में झनझनाहट और सुन्नपन हो सकता है।

7. विटामिन B12 की कमी

डॉक्टर विनीत बांगा बताते हैं कि विटामिन बी12 नसों को स्वस्थ रखने के लिए एक बेहद जरूरी पोषक तत्व होता है। जब शरीर में इसकी कमी होती है, तो नसें बुरी तरह से प्रभावित होने लगती हैं। इसकी वजह से सुन्नपन और झनझनाहट महसूस हो सकता है। जब शरीर में विटामिन बी12 की कमी होती है, तो ये लक्षण महसूस हो सकते हैं-

  • हर वक्त थकान और कमजोरी महसूस होना
  • हाथ और पैरों में झनझनाहट महसूस होना
  • सुन्नपन और चुभन जैसा लगना
  • मांसपेशियों में दर्द होना
  • संतुलन बनाने में मुश्किल होना

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8. कीमोथेरेपी की दवाइयां

कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली कीमोथेरेपी की दवाइयां भी पेरिफेरल न्यूरोपैथी का कारण बन सकती हैं। हालांकि, ऐसा हर कीमोथेरेपी लेने वाले मरीज के साथ नहीं होता है। कुछ ही लोगों में कीमोथेरेपी की वजह से नसों को नुकसान पहुंच सकता है। कुछ मामलों में रेडिएशन थेरेपी भी नसों को नुकसान पहुंचा सकती है।

9. गिलियन-बैरे सिंड्रोम

यह एक ऑटोइम्यून डिसऑर्डर है। इसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से शरीर की अपनी नसों पर हमला करने लगती है। इसकी वजह से हाथ-पैरों में कमजोरी आ सकती है। हाथ-पैरों में झनझनाहट भी महसूस हो सकती है।

पेरिफेरल न्यूरोपैथी के लक्षण क्या हैं?

NINDS के अनुसार, पेरिफेरल न्यूरोपैथी के लक्षण सामान्य से लेकर गंभीर हो सकते हैं। लेकिन, यह समस्या जानलेवा नहीं होती है। पेरिफेरल न्यूरोपैथी के लक्षण इस बात पर निर्भर करते हैं कि कौन-सी नसें प्रभावित हुई हैं और कितना नुकसान पहुंचा है। नसों को नुकसान पहुंचने पर पीड़ित व्यक्ति की दिनचर्या प्रभावित हो सकती है और यह नींद में भी बाधा डाल सकता है। इसके लक्षणों में शामिल हैं-

  • मांसपेशियों में दर्द और कमजोरी का अनुभव
  • मांसपेशियों का सिकुड़ना या कमजोर हो जाना
  • हाथ और पैरों में तेज दर्द और झनझनाहट महसूस होना
  • शरीर का संतुलन बनाए रखने में मुश्किल होना
  • शरीर के तापमान में बार-बार बदलाव होना
  • पाचन से जुड़ी समस्याएं होना

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पेरिफेरल न्यूरोपैथी की जांच कैसे की जाती है?

जब किसी व्यक्ति को हाथ-पैरों में सुन्नपन और झनझनाहट जैसे लक्षण महसूस होते हैं, तो डॉक्टर इन टेस्ट की मदद से पेरिफेरल न्यूरोपैथी का पता लगा सकते हैं।

  • सबसे पहले डॉक्टर मेडिकल हिस्ट्री जान सकते हैं। उनकी लाइफस्टाइल पूछ सकते हैं, शराब के सेवन और संक्रमण के जोखिम का भी पता लगाया जा सकता है।
  • डॉक्टर न्यूरोलॉजिकल जांच के दौरान कंपन और तापमान महसूस करने की क्षमता की जांच कर सकते हैं। इससे पता चलता है कि नसों को अभी तक कितना नुकसान पहुंच चुका है।
  • इस स्थिति में डॉक्टर डायबिटीज, लिवर और किडनी की जांच भी करवा सकते हैं। क्योंकि ये बीमारियां भी नसों को नुकसान पहुंचाती हैं।
  • डॉक्टर एमआरआई टेस्ट की मदद से पेरिफेरल न्यूरोपैथी की जांच कर सकते हैं। डॉक्टर जेनेटिक टेस्ट भी करवा सकते हैं।
  • नर्व बायोप्सी भी कराई जा सकती है। इसमें नर्व टिशू का छोटा सा नमूना लिया जाता है और इसकी जांच की जाती है।

पेरिफेरल न्यूरोपैथी का इलाज कैसे होता है?

  • NINDS के अनुसार, कुछ मामलों में पेरिफेरल न्यूरोपैथी को शुरुआत में रोका जा सकता है। अगर किसी वायरस या संक्रमण की वजह से नसों को नुकसान पहुंच रहा होता है, तो इसे काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। अगर बीमारी का इलाज करवा लिया जाए, तो नसों को होने वाले नुकसान को भी रोका जा सकता है।
  • अगर डायबिटीज, लिवर या किडनी रोगों की वजह से नसों को नुकसान पहुंचता है, तो इनका इलाज करने पर नसों को ठीक करने में मदद मिल सकती है।
  • संतुलित और पौष्टिक खाना खाने से भी नसों की सेहत में सुधार किया जा सकता है। नियमित व्यायाम से नसों की कमजोरी को दूर करने में मदद मिल सकती है।

Disclaimer:  पेरिफेरल न्यूरोपैथी, नसों से जुड़ी समस्याओं का समूह है, जिसकी वजह से हाथ-पैरों में तेज जलन और झनझनाहट हो सकती है। यह समस्या कई बीमारियों की वजह से हो सकता है। अगर आपको पेरिफेरल न्यूरोपैथी का कोई भी लक्षण महसूस हो तो अनदेखी बिल्कुल न करें और तुरंत डॉक्टर से मिलें।