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आपके आस-पास तो नहीं कोई शेयर्ड साइकोसिस डिसऑर्डर का शिकार

ऐसे लोगों को नफरत की नहीं, आपकी मदद की जरूरत है।

शेयर्ड साइकोसिस डिसऑर्डर

शेयर्ड साइकोसिस डिसऑर्डर यानी साझा मनोवैज्ञानिक विकार एक दुर्लभ मनोवैज्ञानिक बीमारी है। अकसर परिवार के मुखिया के इसके शिकार होने पर धीरे-धीरे पूरा परिवार इसका शिकार हो जाता है। इसके फैलने का सबसे बड़ा कारण ही यह है कि जिस व्‍यक्ति से घनिष्‍ठ संबंध हैं, वह ऐसे किसी भ्रम का शिकार हो जाए, जिसमें उसे ऐसा लगने लगे कि उसकी जान को खतरा है और कुछ ऐसे गुण-अवगुण हैं जिनसे उन्‍हें बचना चाहिए। उसके प्रति आस्‍था और प्रेम परिवार या समूह के अन्‍य सदस्‍यों को इस डिसऑर्डर का शिकार होने के लिए दबाव बनाता है।

विवरण

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दुनिया भर में सामने आए ऐसे मामलों में 95 फीसदी मामलों में पीडि़त समूह परिवार ही था। अमूमन दो लोगों के बीच भावनात्‍मक घनिष्‍ठता में यह और बढ़ता है। एक की दूसरे पर नि:संदेह भावनात्‍मक निर्भरता इसके बढ़ने का आसान कारण बन जाती है। शुरुआत में ऐसा लगता है कि यह सब सामान्‍य है, लेकिन धीरे-धीरे इसका प्रभाव बहुत बढ़ जाता है। मनोविज्ञान की भाषा में शेयर्ड साइकोसिस डिसऑर्डर को कंटीजीनियस इन्‍सेनिटी (contagious insanity), इन्‍फेक्शियस इन्‍सेनिटी  (infectious insanity), डबल इन्‍सेनिटी (double insanity), और कम्‍यूनिकेटेड इन्‍सेनिटी (communicated insanity) के नाम से भी जाना जाता है।

कारण

किसी निकटतम घनिष्‍ठ व्‍यक्ति की मृत्‍यु इसे जन्‍म देने के प्राथमिक कारण के रूप में अब तक सामने आई है। हालांकि इसका इस बीमारी से कोई संबंध नहीं है, फि‍र भी इस समय व्‍यक्ति भावनात्‍मक रूप से इतना कमजोर हो जाता है कि वे खुद के बुने हुए भ्रम में सहारा ढूंढने लगता है। यही भावनात्‍मक कमजोरी समूह या परिवार के अन्‍य सदस्‍यों में भी होती है, जो डिसऑर्डर के फैलने की आदर्श स्थिति है। इसके साथ ही अन्‍य समाज से अलगाव इसे और मजबूत करता है। दो भ्रमित व्‍यक्ति जब पूरी दुनिया से कटकर एक-दूसरे के और नजदीक आ जाते हैं तो डिसऑर्डर को फैलने का पूरा माहौल मिल जाता है।

बचाव

शेयर्ड साइकोसिस डिसऑर्डर समूह में फैलता है । इससे ग्रसित समूह को यदि अलग-अलग कर दिया जाए, तो बहुत हद तक समाधान की संभवना बढ़ सकती है। इसके अलावा यदि आपके आसपास भी ऐसा कोई व्‍यक्ति, दोस्‍त या रिश्‍तेदार है, जो किसी घनिष्‍ठ निकटतम व्‍यक्ति की मौत से भावनात्‍मक रूप से बहुत टूट गया है और अपना सामाजिक जीवन धीरे-धीरे समाप्‍त कर रहा है, तो बहुत संभावना है कि वह इस तरह के डिसऑडर्र का शिकार हो सकता है। सामाजिकता और दर्द बांटना प्राथमिक भावनात्‍मक समाधान है। कुछ चीजों को लेकर, जो संभव नहीं हैं, उन पर यदि उसका विश्‍वास बढ़ने लगा है, तो भी बातचीत, संवाद, सामाजिकता के माध्‍यम से यथार्थ से परिचित करवाया जाए। यदि लग रहा है कि स्थिति नियं‍त्रण से बाहर हो रही है, तो फौरन किसी मनोचिकित्‍सक से संपर्क करना चाहिए। ऐसे लोगों को नफरत की नहीं, आपकी मदद की जरूरत है।

चित्रस्रोत: Shutterstock.

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