शरीर से ज्यादा थकता है मन, जानें कैसे पड़ता है थैलेसीमिया का साइकोलॉजिकल इम्पैक्ट

Thalassemia Ka Psychological Impact: कई बीमारियां ऐसी होती हैं जिनका साइकोलॉजिकल इम्पैक्ट होता है, लेकिन हम उसे सामान्य समझ कर इग्नोर कर देते हैं। ऐसी ही बीमारी है थैलेसीमिया।

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Written By: Vidya Sharma | Updated : May 8, 2026 10:05 AM IST

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Medically Verified By: Dr. Malini Saba

Thalassemia Dimag Par Kaise Asar Dalta Hai: थैलेसीमिया को अक्सर सिर्फ एक ब्लड रिलेटेड बीमारी के रूप में देखा जाता है, लेकिन सच यह है कि इसका असर केवल शरीर तक सीमित नहीं रहता। बार-बार ब्लड ट्रांसफ्यूजन, लगातार दवाइयां, अस्पताल के चक्कर, शारीरिक कमजोरी और भविष्य को लेकर चिंता धीरे-धीरे व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य पर भी गहरा प्रभाव डालते हैं। कई बार शरीर से ज्यादा मन थकने लगता है। थैलेसीमिया से जूझ रहे बच्चों, किशोरों और वयस्कों में अक्सर तनाव, चिंता, अकेलापन, आत्मविश्वास में कमी और डिप्रेशन जैसी समस्याएं देखने को मिलती हैं।

बचपन से ही इलाज और सीमाओं के बीच जीना उन्हें मानसिक रूप से अलग-थलग महसूस करा सकता है। जब अन्य बच्चे सामान्य जीवन जीते दिखाई देते हैं, तब थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चा खुद को अलग और कमजोर महसूस कर सकता है। साइकोलॉजिस्ट और महिला एवं मानवाधिकारों की समर्थक डॉक्टर मालिनी सबा हमें बताती हैं कि यह स्थिति केवल शारीरिक नहीं होती, बल्कि धीरे-धीरे बच्चे की भावनात्मक दुनिया और आत्म-छवि को भी प्रभावित करती है। आइए हर साल 8 मई को मनाए जाने वाले वर्ल्ड थैलेसीमिया डे (World Thalassemia Day) पर थोड़ा विस्तार से जानते हैं कि थैलेसीमिया मानसिक स्थिति को कैसे प्रभावित करता है।

किशोरावस्था में बढ़ता है मानसिक दबाव

साइकोलॉजिस्ट बताती हैं कि किशोरावस्था में थैलेसीमिया होने पर उनके लिए मानसिक दबाव और बढ़ जाता है। इस उम्र में व्यक्ति अपनी पहचान, दोस्ती, करियर और रिश्तों को लेकर अधिक संवेदनशील होता है। ऐसे में बीमारी के कारण होने वाली शारीरिक थकान, चेहरे या शरीर में बदलाव, सामाजिक गतिविधियों में कमी और ‘मैं दूसरों जैसा क्यों नहीं हूं?’ जैसे सवाल उनके आत्मसम्मान को प्रभावित कर सकते हैं। कई बार वे अपनी भावनाएं व्यक्त भी नहीं कर पाते और अंदर ही अंदर मानसिक बोझ उठाते रहते हैं।

थैलेसीमिया कैसे होता है और बच्चे में इसका जोखिम कैसे पहचाना जाए?

यह समझना बहुत जरूरी है कि थैलेसीमिया एक जेनेटिक ब्लड डिसऑर्डर है, जो माता-पिता से बच्चे में ट्रांसफर होता है। अगर माता और पिता दोनों थैलेसीमिया के कैरियर हों (जैसे बीटा थैलेसीमिया माइनर) तो बच्चे में गंभीर थैलेसीमिया (मेजर फॉर्म) होने की संभावना बढ़ जाती है। कई बार कैरियर पर्सन को कोई साफ लक्षण नहीं होते, इसलिए उन्हें अपनी स्थिति का पता भी नहीं चलता जब तक स्पेसिफिक ब्लड टेस्ट या स्क्रीनिंग न कराई जाए। 

बच्चे में बार-बार खून की कमी, लगातार थकान, ग्रोथ में देरी या पीली त्वचा जैसे संकेत दिखें तो डॉक्टर से परामर्श और हीमोग्लोबिन इलेक्ट्रोफोरेसिस जैसी जांच करवाना जरूरी हो सकता है। शादी से पहले या प्रेग्नेंसी प्लान करने से पहले कैरियर स्क्रीनिंग करवाना सबसे असरदार तरीका माना जाता है, ताकि आने वाली पीढ़ी में इस बीमारी के जोखिम को कम किया जा सके।

बीटा थैलेसीमिया माइनर के लक्षण और प्रभाव

बीटा थैलेसीमिया माइनर से प्रभावित लोगों में अक्सर बीमारी के लक्षण बहुत हल्के होते हैं और ज्यादातर मामलों में उन्हें नियमित ब्लड ट्रांसफ्यूजन की आवश्यकता नहीं पड़ती। फिर भी कई लोग लगातार कमजोरी, थकान या सामाजिक गलतफहमियों के कारण मानसिक दबाव महसूस कर सकते हैं। शादी, फैमिली प्लानिंग और फ्यूटर में बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर चिंता भी कई बार इमोशनल स्ट्रेस का कारण बनती है। इसलिए थैलेसीमिया के हर रूप में मानसिक और भावनात्मक स्पोर्ट जरूरी माना जाता है।

पीड़ित के परिवार पर ऐसे पड़ता है मानसिक प्रभाव

अगर किसी परिवार में को थैलेसीमिया हो तो परिवार भी उसके मानसिक प्रभाव से अछूता नहीं रहता। माता-पिता लगातार चिंता, फाइनेंशियल प्रेशर और भविष्य को लेकर शक के कारण इमोशनल स्ट्रेस से गुजरते हैं। कई परिवारों में गिल्ट, डर और मानसिक थकावट धीरे-धीरे रिश्तों पर असर डालने लगती है। अगर परिवार मानसिक रूप से मजबूत न रहे, तो इसका प्रभाव मरीज पर भी पड़ता है।

थैलेसीमिया के इलाज में जरूरी होता है इमोशनल स्पोर्ट

साइकोलॉजिस्ट कहती हैं कि थैलेसीमिया के इलाज में सिर्फ दवाइयां और ब्लड ट्रांसफ्यूजन ही काफी नहीं होता हैं। मेंटर और इमोशनल स्पोर्ट भी उतना ही जरूरी होता है। मरीजों को ऐसा वातावरण मिलना चाहिए जहां वह खुलकर अपने इमोशनल्स को एक्सप्रेस कर सकें, बिना जजमेंट के अपनी परेशानियां साझा कर सकें और खुद को अकेला महसूस न करें। 

काउंसलिंग, सपोर्ट ग्रुप्स, परिवार का सहयोग और समाज की संवेदनशीलता मरीज के मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। साथ ही स्कूलों और ऑफिसों में भी जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है ताकि थैलेसीमिया से जूझ रहे लोग भेदभाव या गलत व्यवहार का सामना न करें।

साइकोलॉजिस्ट ने समझाई जरूरी बात

डॉक्टर कहती हैं कि यह समझना जरूरी है कि थैलेसीमिया सिर्फ एक शारीरिक बीमारी नहीं है। यह मन, भावनाओं और जीवन के अनुभवों को भी प्रभावित करती है। इसलिए इलाज केवल खून बढ़ाने का नहीं, बल्कि उम्मीद, आत्मविश्वास और मानसिक मजबूती बनाए रखने का भी होना चाहिए।

बीटा थैलेसीमिया पेशेंट का अनुभव

हमने गगनदीप कौर जी से बात की। उन्हें बीटा थैलेसीमिया है। उन्होंने हमारे साथ अपना अनुभव शेयर किया, जो कई लोगों को थोड़ा तो प्ररणा दे ही सकता है। उन्होंने बताया कि ‘मैं, एक बीटा थैलेसीमिया माइनर हूं और यह कहने का मतलब मेरे लिए किसी कमजोरी या कमी को दिखाना नहीं है, बल्कि अपनी एक जेनेटिक सिचुएशन के साथ जागरूक जीवन जीना है। इसमें लो बीपी और हल्की थकान जैसी स्थिति महसूस होती है, लेकिन यह मेरी पहचान, मेरी क्षमता या मेरे जीवन की दिशा को परिभाषित नहीं करता। इस अनुभव ने मुझे अपने शरीर के संकेतों को समझना, अपनी सेहत लिए ज्यादा अलर्ट रहना और मानसिक रूप से संतुलित और मजबूत बने रहना सिखाया है। मैं इसे किसी लिमिटेशन के रूप में नहीं, बल्कि सेल्फ अवेयरनेस, डिसिप्लिन और अपने जीवन में जिम्मेदारी की तरह देखती हूं।’ (गगनदीप कौर, स्ट्रेटेजिक कम्युनिकेशनिस्ट एंड एडवाइजर)

डिस्क्लेमर- गगनदीप की तरह कई ऐसे लोग होंगे जिन्हें बीटा थैलेसीमिया होगा, लेकिन वह इतने मजबूत नहीं होंगे। अगर आपके परिवार में भी कोई थैलेसीमिया का मरीज है तो उसे इमोशनल स्पोर्ट दें। आप चाहें तो उनकी काउंसलिंग भी करवा सकते हैं।

FAQs

क्या आप थैलेसीमिया के साथ सामान्य जीवन जी सकते हैं?

हालांकि थैलेसीमिया से जुड़ी मुख्य स्वास्थ्य समस्याओं का इलाज से अक्सर नियंत्रण किया जा सकता है, फिर भी यह एक गंभीर बीमारी है जो किसी व्यक्ति के जीवन पर गहरा प्रभाव डाल सकती है।

क्या थैलेसीमिया मेंटल हेल्थ को प्रभावित करता है?

हां, थैलेसीमिया मानसिक स्वास्थ्य को काफी प्रभावित कर सकता है, क्योंकि इसमें मरीजों में थकान, बार-बार अस्पताल जाने के कारण डिप्रेशन, एंग्जाइटी और आत्मविश्वास की कमी होना आम है।

थैलेसीमिया का खतरा सबसे ज्यादा किसे होता है?

जिनके परिवार में थैलेसीमिया का इतिहास हो, उन्हें इस बीमारी का खतरा ज्यादा रहता है।

थैलेसीमिया की पहचान कैसे करें?

बार-बार कमजोरी, खून की कमी, पीली त्वचा और थकान के लक्षण दिखने पर जांच करानी चाहिए।

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