CRISPR से थैलेसीमिया का इलाज: अब “खून चढ़ाने” से मिलेगी आजादी? जानें क्या कहती है स्टडी

थैलेसीमिया मरीजों के लिए एक खुशखबरी है, CRISPR थेरेपी की मदद से उनमें बार-बार खून चढ़ाने की जरूरत खत्म हो सकती है।

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Written By: Anju Rawat | Updated : May 6, 2026 7:04 PM IST

थैलेसीमिया के मरीजों को हर 15 से 20 दिन में खून चढ़ाने की जरूरत पड़ती है। लेकिन, क्या आपको पता है अब इन मरीजों में ट्रांसफ्यूजन या खून चढ़ाने की जरूरत जल्द ही खत्म हो सकती है। ऐसा हम नहीं, बल्कि The New England Journal of Medicine पर प्रकाशित एक रिपोर्ट कह रही है। इस रिपोर्ट की मानें तो अब थैलेसीमिया के मरीज बिना ट्रांसफ्यूजन के ही सामान्य जीवन जी सकते हैं। यह मुमकिन है- CRISPR जीन एडिटिंग थेरेपी से। इस थेरेपी की मदद से थैलेसीमिया जैसी जेनेटिक बीमारी को जड़ से खत्म किया जा सकता है। वैसे तो इसके शुरुआती और बड़े ट्रायल्स काफी हद तक सफल हो चुके हैं। लेकिन, अभी भी बच्चों और अलग-अलग उम्र के लोगों में इसके ट्रायल चल रहे हैं यानी रिसर्च अभी भी जारी है। हालांकि, कई देशों में इस थेरेपी से थैलेसीमिया के मरीजों का इलाज शुरू हो चुका है।

आपको बता दें कि थैलेसीमिया एक जेनेटिक ब्लड डिसऑर्डर है, जिसमें शरीर सही तरीके से हीमोग्लोबिन नहीं बना पाता है। यह मुख्य रूप से HBB gene में खराबी की वजह से होता है। इसकी वजह से थैलेसीमिया रोगियों को गंभीर एनीमिया हो सकता है और उसे बार-बार खून चढ़ाने की जरूरत पड़ सकती है। हर साल 8 मई को विश्व थैलेसीमिया दिवस (World Thalassaemia Day) मनाया जाता है। आइए, इस मौके पर जानते हैं कि CRISPR से थैलेसीमिया का इलाज कैसे होता है?

CRISPR थेरेपी क्या है और कैसे काम करती है?

CRISPR एक एडवांस जीन एडिटिंग तकनीक है, जो डीएनए को एडिट कर सकती है। PubMed पर प्रकाशित एक रिसर्च के अनुसार CRISPR, थैलेसीमिया मरीजों पर 2 तरह से काम करता है।

  • पहला- इस थेरेपी की मदद से खराब जीन को ठीक किया जाता है। इसमें CRISPR सीधे एचबीबी जीन म्यूटेशन को ठीक करता है।
  • दूसरा- बचपन में शरीर में HbF बनता है। थैलेसीमिया रोगियों में यह बाद में बंद हो जाता है। ऐसे में CRISPR, BCL11A जीन को टारगेट करके HbF को शुरू करता है। इससे शरीर हेल्दी हीमोग्लोबिन बनाने लगता है।

इस थेरेपी को सीधे मरीजों पर इस्तेमाल किया गया और थैलेसीमिया के मरीजों में इसका असर भी देखने को मिला।

क्या अब “खून चढ़ाने” की नहीं होगी जरूरत?

  • क्लीनिकल ट्रायल्स में इस थेरेपी के चौंकाने वाले रिजल्ट मिले हैं।
  • इसमें पाया गया है कि थेरेपी के बाद 91 फीसदी मरीजों को खून चढ़ाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
  • 90 फीसदी से ज्यादा रेड ब्लड सेल्स में HbF पाया गया है।
  • हीमोग्लोबिन का स्तर भी 13 g/dL तक रहा।

इस थेरेपी से थैलेसीमिया का इलाज कैसे होता है?

इस थेरेपी की मदद से सबसे पहले थैलेसीमिया के मरीजों के स्टेम सेल्स निकाले जाते हैं, इसके बाद उन्हें CRISPR-Cas9 से एडिट किया जाता है। इसमें BCL11A जीन (यह फेटल हीमोग्लोबिन को बंद कर देता है) को टारगेट किया जाता है। इससे हीमोग्लोबिन बनना शुरू हो जाता है। रिसर्च के अनुसार, CRISPR थेरेपी के बाद मरीजों के जीवन में सुधार हुआ है। यह शारीरिक और मानसिक सेहत में सुधार करता है। ट्रायल में इस थेरेपी के बाद मरीजों में खून चढ़ाई की जरूरत भी महसूस नहीं हुई।

Disclaimer: थैलेसीमिया एक आनुवंशिक रक्त विकार है। यह माता-पिता से बच्चों में जीन के माध्यम से फैलता है। थैलेसीमिया के मरीजों को हर बार कुछ दिन में ब्लड चढ़ाने की जरूरत पड़ती है। अब ऐसा कहा जा रहा है कि CRISPR थेरेपी लेने के बाद ट्रांसफ्यूजन की जरूरत नहीं पड़ेगी। हालांकि, thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।

FAQs

थैलेसीमिया का खतरा सबसे ज्यादा किसे होता है?

जिनके परिवार में थैलेसीमिया का इतिहास हो, उन्हें इस बीमारी का खतरा ज्यादा रहता है।

क्या थैलेसीमिया पूरी तरह ठीक हो सकता है?

बोन मैरो ट्रांसप्लांट से कुछ मामलों में थैलेसीमिया पूरी तरह ठीक किया जा सकता है।

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