
प्रिया मिश्रा
प्रिया को पिछले 4 सालों से हेल्थ और लाइफस्टाइल विषयों पर लिखने का अनुभव है। इन्हें हेल्थ और ... Read More
Written By: priya mishra | Published : April 2, 2025 10:43 AM IST
Signs of Autism During Pregnancy: ऑटिज्म एक न्यूरोडेवलपमेंटल विकार है, जो बच्चों के सामाजिक व्यवहार, संवाद और सीखने की क्षमता को प्रभावित करता है। यह एक स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर है, जिसका अर्थ है कि इसके लक्षण अलग-अलग बच्चों में अलग-अलग स्तर पर हो सकते हैं। माता-पिता अक्सर यह जानना चाहते हैं कि क्या प्रेगनेंसी के दौरान ऑटिज्म का पता लगाया जा सकता है? और क्या यह ठीक किया जा सकता है? इस विषय पर बेहतर जानकारी प्राप्त करने के लिए हमने दिल्ली स्थित क्लाउडनाइन हॉस्पिटल की वरिष्ठ सलाहकार और एसोसिएट निदेशक डॉ शैली शर्मा से बातचीत की। तो आइए, जानते हैं इसके बारे में विस्तार से -
वर्तमान में, कोई भी निश्चित प्रीनेटल टेस्ट (गर्भावस्था के दौरान जांच) ऑटिज्म का सटीक रूप से पता लगाने में सक्षम नहीं है। हालांकि, कुछ शोध यह संकेत देते हैं कि गर्भावस्था के दौरान कुछ कारक ऑटिज्म के विकास के जोखिम को बढ़ा सकते हैं।
जेनेटिक कारण: यदि परिवार में पहले से ऑटिज्म के मामले हैं, तो बच्चे में इसके होने की संभावना बढ़ सकती है।
गर्भावस्था में संक्रमण या बीमारियां: प्रेगनेंसी के दौरान किसी गंभीर संक्रमण (जैसे रूबेला या जीका वायरस) से बच्चे के न्यूरोडेवलपमेंट पर प्रभाव पड़ सकता है।
मातृ स्वास्थ्य समस्याएं: गर्भावस्था में डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, या मोटापा होने पर ऑटिज्म का जोखिम बढ़ सकता है।
प्रेगनेंसी में दवाइयों का प्रभाव: कुछ दवाइयां, जैसे एंटी-एपिलेप्टिक मेडिकेशन, भ्रूण के मस्तिष्क के विकास को प्रभावित कर सकती हैं।
प्रेगनेंसी में अत्यधिक तनाव: यदि गर्भावस्था के दौरान माँ को अत्यधिक तनाव रहता है, तो यह बच्चे के न्यूरोलॉजिकल विकास पर असर डाल सकता है।
हालांकि, ये सभी कारक केवल संभावनाएँ दर्शाते हैं और इसका मतलब यह नहीं है कि यदि ये स्थितियां मौजूद होंगी तो बच्चा निश्चित रूप से ऑटिज्म से प्रभावित होगा।
बच्चे में ऑटिज्म का पता कैसे चलता है?
चूंकि गर्भावस्था के दौरान ऑटिज्म की सटीक पहचान संभव नहीं है, इसलिए इसके लक्षण जन्म के बाद ही धीरे-धीरे स्पष्ट होते हैं। आमतौर पर, 12 से 24 महीने की उम्र के बीच ऑटिज्म के लक्षण दिखने लगते हैं।
सामाजिक संपर्क में कठिनाई: बच्चा आँखों में आँखें डालकर कम देखता है, मुस्कुराने या प्रतिक्रिया देने में देरी करता है।
बोलने और संवाद करने में देरी: बच्चा अपेक्षित उम्र में बोलना शुरू नहीं करता या बहुत सीमित शब्दों का उपयोग करता है।
बार-बार दोहराए जाने वाले व्यवहार: हाथ हिलाना, एक ही क्रिया बार-बार करना, किसी एक चीज़ में ज्यादा रुचि रखना।
भावनात्मक प्रतिक्रिया में अंतर: बच्चे को अचानक गुस्सा आ सकता है या वह अप्रत्याशित रूप से ज्यादा संवेदनशील हो सकता है।
बदलाव को स्वीकार न करना: बच्चा दिनचर्या में बदलाव पसंद नहीं करता और नए वातावरण में असहज महसूस करता है।
ऑटिज्म कोई बीमारी नहीं है जिसे पूरी तरह से “ठीक” किया जा सके, लेकिन समय पर सही थेरेपी और प्रशिक्षण से बच्चे के जीवन को बेहतर बनाया जा सकता है।
स्पीच थेरेपी: यदि बच्चे को बोलने या समझने में कठिनाई होती है, तो यह थेरेपी फायदेमंद होती है।
ऑक्यूपेशनल थेरेपी: यह बच्चे की दैनिक गतिविधियों को आसान बनाने में मदद करती है।
स्पेशल एजुकेशन: विशेष स्कूलों या शिक्षण विधियों से बच्चे को सीखने में मदद मिलती है।
दवा: कुछ मामलों में, यदि बच्चा अत्यधिक चिंता, आक्रामकता या अन्य व्यावहारिक समस्याओं से जूझ रहा है, तो डॉक्टर की सलाह से दवा दी जा सकती है।
परिवार की भूमिका: माता-पिता और परिवार का सहयोग बहुत महत्वपूर्ण होता है। सही मार्गदर्शन और प्यार से बच्चे को आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है।
गर्भावस्था के दौरान ऑटिज्म का सटीक पता लगाना संभव नहीं है, लेकिन कुछ जोखिम कारक इसके होने की संभावना को बढ़ा सकते हैं। बच्चे के जन्म के बाद, अगर माता-पिता को संदेह हो कि उनके बच्चे का विकास सामान्य नहीं हो रहा है, तो उन्हें जल्द से जल्द विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए। सही समय पर उपचार और विशेष शिक्षण विधियों के माध्यम से ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों को एक आत्मनिर्भर और सुखद जीवन जीने में मदद की जा सकती है।
Disclaimer: प्रिय पाठकों यह आर्टिकल केवल सामान्य जानकारी और सलाह देता है। यह किसी भी तरह से चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है। इसलिए अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करें। thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।