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सिर्फ आसान सा ब्लड टेस्ट बता देगा दिमाग में ट्यूमर! जानें टेस्ट की मदद से ट्यूमर की स्टेज का पता लगाने का तरीका
Brain Tumor Test : क्या आप जानते हैं कि कैंसर या फिर शरीर के किसी भी हिस्से में ट्यूमर का पता अगर शुरू में ही चल जाए तो जीवन कितना आसान हो सकता है? और वो भी जब सिर्फ एक ब्लड टेस्ट की मदद से तो आपके लिए बीमारी को शुरू होने से पहले हील रोक पाना संभव हो जाता है। कुछ ऐसा ही करके दिखाया है सर गंगा राम अस्पताल के शोधकर्ताओं ने। शोधकर्ताओं ने एक सस्ता ब्लड टेस्ट इजात किया है, जिसकी मदद से ब्रेन ट्यूमर का शुरू में ही पता लगाने में मदद मिलेगी। इस टेस्ट की मदद से मरीजों की जान बचाने की संभावना को और ज्यादा बढ़ा देता है।
शोधकर्ताओं का दावा है कि ये तरीका ग्लायोमा की गंभीरता का भी पता लगाने में मदद कर सकता है।
आपको जानकर हैरानी होगी कि ग्लायोमा, ब्रेन ट्यूमर के सबसे गंभीर प्रकार में से एक है, दो कि ग्लायल सेल्स से शुरू होता है। बता दें कि सभी प्रकार के ब्रेन ट्यूमर का 40 फीसदी शुरुआती ब्रेन ट्यमूर होता है और 70 फीसदी घातक होते हैं। ये हमारे केंद्रीय तंत्रिका तंत्र के किसी भी हिस्से में हो सकते हैं और अगर समय पर इसका निदान न किया जाए तो ये ट्यूमर बहुत तेजी से बढ़ने लगता है।
ग्लायोमा के मरीज का इलाज 6 से 15 महीने तक चलता है और इस दौरान उसे अपने जिंदगी के सबसे खराब दौर से गुजरना पड़ सकता है। साथ ही उसे कीमोथेरेपी के अलावा सर्जिक्ल दौरा से भी गुजरना पड़ सकता है।
इस स्टडी की मुख्य शोधकर्ता डॉ. रश्मि राणा का कहना है कि ये स्टडी ग्लायोमा की गंभीरता का शीघ्र निदान करने की दिशा में एक संभावित बायोमार्कर है, जो कि गैलेक्टिन-3 प्रोटीन की पहचान करने में सक्षम है। इतना ही नहीं इसकी मदद से कैंसर कोशिकाओं की निशाना बनाकर जल्द ही उपचार शुरू किया जा सकता है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि अभी तक ग्लायोमा का जल्दी पता लगाने का कोई भी तरीका नहीं है। इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा ये है कि इसमें कोई भी काटा-पीटी नहीं की जाती है और ये भविष्य में होने वाले ब्रेन ट्यूमर का पता लगाने में मदद करता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि ये तरीका बहुत ही विशिष्ट और संवेदनशील है।
डॉ. रश्मि का कहना है कि हमने ब्रेन ट्यूमर के ग्रेड 1, ग्रेड 2 और ग्रेड 3 के मरीजों पर ट्रायल किए हैं, जिसकी शुरुआत 2017 में हुई थी। हमारा मकसद है कि कैंसर का शीघ्र पता लगाने वाले तरीकों को ढूंढा जाए। हमने मरीजों के प्लाजमा से प्रोटीन को अलग कर दिया था। ये तकनीक नई है और इसके लिए हमें आईसीएमआर से फंड भी मिले हैं।
ग्लायोमा कोशिकाओं में बहुत तेजी से बढ़ने और फैलने की क्षमता होती है और ये शरीर के किसी भी अंग में फैल सकती है। ये हमारे आस-पास के परिवेश में बहुत बारीकी से समावेश कर जाती है। डॉ. रश्मि का कहना है कि अभी तक शोधकर्ता सिर्फ अंतिम स्टेड में ही कैंसर का पता लगा पाते हैं। लेकिन हमारा मकसद कैंसर का पहली स्टेज में पता लगाना है ताकि कैंसर को फैलने से रोका जा सके।