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डॉक्टर और मरीज का रिश्ता विश्वास पर आधारित है और विश्वास की कमी के कारण डॉक्टर उसे दूसरी राय के लिए कह सकता है। कई बार ऐसी स्थिति होती है जब आपको दूसरी राय के ही नहीं डॉक्टर बदलने का भी फैसला लेना पड़ता है। यानि जब लक्षण काफी गंभीर होने लगते हैं और आपको दवाओं से भी कोई असर नहीं हो रहा होता है। कई बार डॉक्टर सही होता है लेकिन इलाज के बारे में स्पष्टीकरण देने में सक्षम या तैयार नहीं होता है। इसलिए आपके लिए क्रोस चेक करना ही आखिरी विकल्प होता है। उदहारण के लिए कई बार एक्स-रे या एमआरआई के जरिये आपको कोई बड़ा जोखिम प्रकट हो सकता है। लेकिन उसका इलाज कराना जरूरी है या नहीं यह सलाह आपको डॉक्टर ही दे सकता है। जाहिर है इसकी पुष्टि करने के लिए आप कई डॉक्टर की सलाह ले सकते हैं। खैर इन मामलों में दूसरी राय की जरूरत पड़ सकती है।
1.बीमारी की गंभीरता समझने के लिए
कभी-कभी बीमारी को लेकर डॉक्टर की राय से स्पष्ट नहीं होता है और वो इस बात को लेकर सहमत नहीं होता है कि बीमारी बढ़ सकती है। ऐसे मामले में आप तीसरी राय ले सकते हैं ताकि आपको सही मार्गदर्शन मिल सके।
2.बीमारी के बारे में सही और ज़्यादा जानकारी के लिए
हालांकि ऐसा इमरजेंसी में लागू नहीं होता है। बेशक आप डायबिटीज जैसी स्थिति में ऐसा कर सकते हैं। अगर आप डायबेटोलॉजिस्ट के पास जा रहे हैं, तो आपको अभी भी डायबिटिक फूट या नेफ्रोलॉजिस्ट में स्पेशलिस्ट की जरूरत है।
3.इलाज के आधुनिक विकल्पों के बारे में जानने के लिए
डेंटिस्ट्री से लेकर यूरोलॉजी तक के लिए कई सारे उपचार विकल्प हैं। संभव है आप जिस क्लिनिक या हॉस्पिटल में इलाज करा रहे हैं, वहां यह उपचार उपलब्ध ना हो।
4.सस्ते या चैरिटेबल इलाज के लिए
जब आप सस्ती दवाइयों या फिजियोथेरेपिस्ट के पास जाने की सोच रहे हों। जैसे टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल कैंसर के इलाज का एक सस्ता विकल्प बन गया है। ऐसे ही कई सार स्थानीय अस्पताल और ट्रस्ट हैं जो बहुत कम शुल्क में उपचार प्रदान करते हैं।
5.रोगी की देखभाल के तरीके समझने के लिए
आपके डॉक्टर को आपके एरिया के होम-नर्स या अटेंडेंट के बारे में नहीं पता है। कुछ मामलों में मरीजों की घर पर देखभाल नहीं हो पाती है, ऐसे मामले में आप एक बेहतर सेंटर के लिए कह सकते हैं जो कि आपके घर के पास हो।
6.अल्टरनेटिव ट्रीटमेंट
कुछ डॉक्टर एलोपैथिक थेरेपी के साथ आयुर्वेद या हर्बल उपचार जैसे कई वैकल्पिक उपचारों की सलाह भी देते हैं।