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कॉइल और अगरबत्तियां नहीं, बल्कि अब लैब में तैयार ये मच्छर ही खत्म करेगा डेंगू का खतरा

आज वर्ल्ड डेंगू डे के मौके पर हम जानेंगे कि किस तरह से आजकल मच्छर भगाने वाले प्रोडक्ट्स ने काम करना बंद कर दिया है और उससे निपटने के लिए वैज्ञानिकों ने किस तरह से लैब में खास मच्छर तैयार किया है।

Written By Mukesh Sharma
Updated : May 17, 2026 12:08 PM IST

research on dengue (this image was edited with the help of chatgpt)

आपने शायद नोटिस किया होगा अब पिछले कुछ सालों से मच्छर भगाने वाली कॉइल, अगरबत्ती और यहां तक कि सॉकेट में लगने वाली मशीनें भी मच्छरों को भगाने में फेल होने लगी हैं। पहले जहां एक छोटी कॉइल को जला देने से ही कमरे के सारे मच्छर गायब हो जाते थे और कुछ घंटों के लिए ही मशीन को ऑन करने भर से ही मच्छर भाग जाते थे आज के टाइम में वही मशीनें हैं जो फेल होने लगी हैं। इसके पीछे आखिर क्या कारण है, इस बारे में भी हम इस लेख में बात करेंगे लेकिन सबसे पहले जानेंगे कि आखिर ऐसी स्थितियों से बचने के लिए वैज्ञानिक क्या कर रहे हैं। आज विश्व डेंगू दिवस है और डेंगू मच्छरों से होने वाली एक बेहद गंभीर बीमारी है, जो कुछ लोगों में इतनी गंभीर हो जाती है कि मरीज को लंबे समय तक अस्पताल में रहना पड़ सकता है।

मच्छरों की बढ़ रही इम्यूनिटी

हम आपको साधारण तरीके से समझाने की कोशिश करेंगे कि आखिर अब मच्छरों पर इन चीजों का असर क्यों नहीं होता। जब आप इन कॉइल, अगरबत्तियों या मच्छर मारने या भगाने वाले किसी भी प्रोडक्ट का इस्तेमाल करते हैं, तो इससे कमजोर मच्छर मर जाते हैं या भाग जाते हैं, जबकि कुछ मच्छर जो थोड़ा कमजोर या सामान्य मच्छरों की तुलना में थोड़ा शक्तिशाली होते हैं वे बच जाते हैं।

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अब इन बचे हुए शक्तिशाली मच्छरों से ही आगे मच्छर पैदा होते हैं और जेनेटिक की वजह से वे मच्छर भी शक्तिशाली ही होते हैं। इसी को मच्छरों की इम्यूनिटी बनना कहते हैं। पिछले 10 से 15 सालों में इन प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल ज्यादा बढ़ा है, जिसके कारण मच्छरों की इम्यूनिटी डेवलप हुई है।

FAQ'S

1. डेंगू बुखार का पहला संकेत क्या है?

डेंगू बुखार का सबसे पहला संकेत तेज बुखार है। डेंगू होने पर व्यक्ति को 104°F तक बुखार हो सकता है। इसके अलावा, सिरदर्र और मांसपेशियों में दर्द भी हो सकता है।

(और पढ़ें - क्या यूरीन टेस्ट से डेंगू का पता लग सकता है?)

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लैब में तैयार किया गया खास मच्छर

डेंगू, जीका, चिकनगुनिया और येलो फीवर जैसी बीमारियों को कंट्रोल करने के लिए रिसर्चर लगातार रिसर्च कर रहे थे जो एडीज नाम के मच्छर के द्वारा फैलाई जाती हैं। जैसे की धीरे-धीरे मच्छरों की इम्यूनिटी केमिकलों के विरुद्ध बढ़ती जा रही थी, इसलिए रिसर्चर कुछ नए तरीकों की तलाश में थे।

इसलिए इंडोनेशिया के योग्याकार्ता (Yogyakarta) शहर में एक स्टडी कई गई जिसमें मच्छरों को वोलबैकिया नाम का नेचुरल बैक्टीरिया दिया गया। धीरे-धीरे लैब के कंट्रोल इनवायरमेंट में जहां वोलबैकिया बैक्टीरिया वाले मच्छर थे, उनकी संख्या धीरे-धीरे बढ़ने लगी और कुछ महीनों में कई लाख हो गए।

इसके बाद वैज्ञानिकों ने इन मच्छरों को धीरे-धीरे अपने आसपास शहर में छोड़ना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे ये मच्छर दूसरे बाहरी मच्छरों से घुलने मिलने लगे और संबंध बनाने लगे, जिससे बैक्टीरिया दूसरे मच्छरों में भी फैलने लगा जो कि वैज्ञानिकों का मुख्य लक्ष्य था।

वोलबैकिया बैक्टीरिया क्या करता है

वोलबैकिया बैक्टीरिया जब मच्छर से शरीर में चला जाता है, जो डेंगू जैसी बीमारियां फैलने वाले वायरस कमजोर पड़ने लगते हैं। मच्छर के शरीर में यह वायरस के बढ़ने की क्षमता काफी कमजोर पड़ जाती है और ऐसे में अगर मच्छर किसी व्यक्ति को काटता भी है, तो उसके द्वारा शरीर में छोड़ा गया वायरस इतना कमजोर होता है कि उससे डेंगू फैलने का खतरा भी बहुत कम रहता है।

डॉक्टर नीरज कुमार से वीडियो में जानें डेंगू के बारे में

डिसक्लेमर: इस लेख का उद्देश्य केवल डेंगू से जुड़ी सही जानकारी देना है और इसमें दी गई किसी भी जानकारी का इस्तेमाल डेंगू या मच्छरों से होने वाली किसी भी बीमारी के इलाज के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। इसके लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करें। thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।