
विद्या शर्मा
विद्या शर्मा को डिजिटल मीडिया में लगभग 3 साल का अनुभव है। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता ... Read More
Written By: Vidya Sharma | Published : January 15, 2026 2:26 PM IST
Medically Verified By: Dr. Rajesh Pathak
School Mai Bacche Ki Sehat Ka Khayal Kaise Rakhe: अब कई शहर पॉल्यूशन की धुंध में ढक गए हैं, जिनमें जाहिर सी बात है कि स्कूल शामिल हैं। ऐसे में कई माता-पिता प्रदूषण से अपने बच्चों की तबियत खराब होने से बचाने के लिए स्कूल नहीं भेज रहे हैं। लाजमी है कि जिस पॉल्यूशन में बड़ नहीं टिक पा रहे, उसमें बच्चे सांस कैसे लेंगे! छोटे फेफड़े, ज्यादा समय बाहर खेलने की आदत और कमजोर इम्यूनिटी के कारण बच्चे वायु प्रदूषण के असर में जल्दी आ जाते हैं। ऐसे में किसी भी माता-पिता को स्कूलों से बहुत ही ज्यादा उम्मीद होती है कि वह बच्चों की सेफ्टी के लिए कुछ कर भी रहे हैं या नहीं।
पेरेंट्स द्वारा यह उम्मीद की जाती है कि स्कूल सिर्फ पढ़ाई ही नहीं, बल्कि बच्चों की सेहत की सुरक्षा को भी प्राथमिकता देंगे। खासकर स्मॉग और पॉल्यूशन में बच्चे को स्कूल भेजने से पहले कुछ बातें क्लियर होनी बहुत जरूरी होती है। इसलिए हमने नारायणा हॉस्पिटल के पीडियाट्रिक्स डॉक्टर राजेश पाठक से बात की। हमने उनसे पूछा कि 'बच्चों की सेहत को लेकर स्कूल से कौन से सवाल पूछे जाने चाहिए?' उन्होंने कहा कि 'स्कूलों में AQI यानी एयर क्वालिटी इंडेक्स को लेकर क्या रणनीति अपनाई जा रही है? यह जानना बहुत जरूरी है।' आइए आपको बताते हैं कि डॉक्टर ने माता-पिता से स्कूल में कौन से सवाल पूछने को कहा है।
डॉक्टर ने बताया कि माता-पिता द्वारा स्कूल में सबसे पहला सवाल यही पूछा जाना चाहिए कि क्या स्कूल में रोजाना AQI को ट्रैक किया जाता है?कई स्कूलों में यह जिम्मेदारी किसी स्टाफ सदस्य को सौंपी गई होती है, जबकि कुछ जगहों पर यह प्रक्रिया अनियमित पाई जाती है। यह भी समझा जाना जरूरी है कि AQI की जानकारी किस स्रोत से ली जा रही है और क्या उसी के आधार पर दिनचर्या में बदलाव किया जाता है। अगर हवा बेहद खराब पाई जाती है, तो क्या स्कूल प्रशासन को इसकी जानकारी समय पर मिलती है, यह सवाल भी अहम माना जाता है। आपकी एक गलती बच्चे के स्वास्थ्य पर भारी पड़ सकती है।
डॉक्टर राजेश कहते हैं कि पेरेंट्स का यह जानना जरूरी समझा जाता है कि जब AQI खराब या बहुत खराब स्तर पर पहुंच जाता है, तब बच्चों की बाहरी गतिविधियों का क्या किया जाता है। क्या पीटी पीरियड, असेंबली और खेल का समय कम किया जाता है?या पूरी तरह बंद कर दिया जाता है? कई बार यह देखा गया है कि रूटीन वैसे ही चलता रहता है, जिससे बच्चों को अनजाने में प्रदूषित हवा में सांस लेनी पड़ती है। स्कूल से यह स्पष्टता मांगी जानी चाहिए कि ऐसे दिनों में क्या वैकल्पिक व्यवस्था की जाती है।
इनडोर एयर क्वालिटी पर अक्सर कम ध्यान दिया जाता है, जबकि बच्चे दिन का बड़ा हिस्सा क्लास रूम में बिताते हैं। इसलिए डॉक्टर राजेश पाठक ने कहा कि ‘माता-पिता स्कूल में यह पूछे कि क्या क्लासरूम में एयर प्यूरीफायर लगाए गए हैं? या किसी तरह का फिल्ट्रेशन सिस्टम मौजूद है? अगर एयर प्यूरीफायर लगाए गए हैं, तो उनकी क्षमता क्या है और उनका मेंटेनेंस कितनी नियमितता से किया जाता है। फिल्टर कब बदले जाते हैं और क्या उनकी सफाई का कोई रिकॉर्ड रखा जाता है, यह सवाल भी महत्वपूर्ण माना जाता है।’
कई लोगों द्वारा यह मान लिया जाता है कि खिड़कियां खोल देने से हवा साफ हो जाती है, लेकिन स्मॉग के दिनों में यह तरीका उल्टा असर डाल सकता है। इसलिए डॉक्टर ने माता-पिता को सलाह दी कि स्कूल में आप यह पूछे कि ‘स्कूल में खराब AQI के दौरान खिड़कियां बंद रखने या सीमित रूप से खोलने को लेकर क्या नीति अपनाई जाती है? वेंटिलेशन सिस्टम अगर मौजूद है, तो क्या वह बाहर की हवा को फिल्टर करके अंदर लाता है या सीधे प्रदूषित हवा अंदर खींची जाती है, इस पर भी स्पष्ट जवाब मांगा जाना चाहिए।

पेरेंट्स यह भी समझें कि अगर किसी बच्चे में सांस लेने में तकलीफ, खांसी, आंखों में जलन या सिरदर्द जैसे लक्षण दिखते हैं, तो स्कूल में क्या प्रक्रिया अपनाई जाती है?,क्या पेरेंट्स को तुरंत सूचित किया जाता है? और क्या ऐसे बच्चों को आराम देने के लिए कोई अलग जगह तय की गई है? लंबे समय तक स्मॉग रहने की स्थिति में हेल्थ एडवाइजरीको बच्चों तक कैसे पहुंचाया जाता है या नहीं? ऐसे सवाल भी पूछे जाने भी जरूरी है।
ट्रांसपेरेंसी की भूमिका यहां अहम हो जाती है। आप अपने बच्चे के स्कूल में यह पूछा जाना चाहिए कि स्कूल AQI और उससे जुड़े फैसलों की जानकारी पेरेंट्स को कैसे देता है। क्या मैसेज, ईमेल या नोटिस के जरिए रोजाना अपडेट भेजे जाते हैं या सिर्फ स्थिति बिगड़ने पर सूचना दी जाती है। नियमित संवाद से भरोसा बनाया जाता है और पेरेंट्स भी बच्चों की सेहत को लेकर बेहतर फैसले ले पाते हैं।
स्मॉग अब कुछ दिनों की समस्या नहीं मानी जाती, बल्कि यह एक लंबा चलने वाला संकट बन चुका है। ऐसे में स्कूलों से सवाल पूछना किसी टकराव के रूप में नहीं, बल्कि साझेदारी के रूप में देखा जाना चाहिए। जब सही सवाल पूछे जाते हैं, तब बेहतर नीतियां बनाई जाती हैं और बच्चों के लिए सुरक्षित माहौल सुनिश्चित किया जा सकता है। हवा भले ही बाहर खराब पाई जाए, लेकिन स्कूल के भीतर बच्चों की सांसों को सुरक्षित रखने की कोशिश जरूर की जानी चाहिए।
Disclaimer: प्रिय पाठकों यह आर्टिकल केवल सामान्य जानकारी और सलाह देता है। यह किसी भी तरह से चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है। इसलिए अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करें। thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।
प्रदूषण से बचने के लिए N95 मास्क पहनें, घर में एयर प्यूरीफायर और पौधे (तुलसी, मनी प्लांट) लगाएं।
जी हां। खराब वायु गुणवत्ता के संपर्क में आने से धमनियों में ऐंठन हो सकती है, प्रदूषण और रक्तचाप बढ़ सकता है, और सीने में दर्द या यहां तक कि दिल का दौरा भी पड़ सकता है।
हां, इसके अलावा उच्च रक्तचाप, हृदय की लय में परिवर्तन, रक्त के थक्के जमने संबंधी विकार, कोरोनरी धमनी रोग और स्ट्रोक शामिल हैं।
वायु प्रदूषण के कारण होने वाली सबसे आम बीमारियों में अस्थमा जैसी श्वसन संबंधी बीमारियाँ, क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी), हृदय संबंधी विकार जैसे दिल का दौरा और स्ट्रोक, फेफड़ों का कैंसर और तंत्रिका संबंधी स्थितियाँ शामिल हैं।