
आशु कुमार दास
आशु कुमार दास एक अनुभवी हेल्थ कंटेंट स्पेशलिस्ट हैं। इन्हें हेल्थ कंटेंट राइटर के तौर पर काम करते हुए 6 ... Read More
Written By: Ashu Kumar Das | Published : May 6, 2026 6:28 PM IST
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एक दशक पहले तक भारत में अगर किसी बच्चे को लिवर, किडनी या किसी अन्य अंग से जुड़ी गंभीर बीमारी हो जाती थी, तो परिवार के लिए यह खबर किसी बड़े सदमे से कम नहीं होती थी। क्योंकि 1 दशक पहले न सिर्फ इलाज मुश्किल था, बल्कि बच्चों के लिए सही डोनर मिलना भी काफी मुश्किल का काम होता था। पर डिजिटल दौर में लोग स्वास्थ्य के प्रति जागरूक हो रहे हैं और अब आधुनिक मेडिकल सर्विस की मदद से बच्चों के शरीर के अंगों को ट्रांसप्लांट भी आसानी से हो रहा है। नई दिल्ली के इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल के सीनियर कंसल्टेंट लिवर ट्रांसप्लांट, HPB सर्जरी डॉ. नीरव गोयल का कहना है कि समय के साथ आम लोगों के बीच बच्चों के अंगों के ट्रांसप्लांट के प्रति जागरूकता बढ़ी है। इस प्रक्रिया से हजारों बच्चों को नई जिंदगी मिल रही है। आज भारत के कई बड़े अस्पतालों में छोटे बच्चों के लिवर ट्रांसप्लांट आसानी से सक्सेफुली किए जा रहे हैं।सही समय पर इलाज मिलने से बच्चे न सिर्फ स्वस्थ हो रहे हैं, बल्कि स्कूल जा रहे हैं, खेल रहे हैं और सामान्य बच्चों की तरह अपना बचपन जी रहे हैं।
डॉ. नीरव गोयल के अनुसार, कुछ बच्चों को जन्म से ही लिवर या दूसरे अंगों से जुड़ी गंभीर बीमारियां होती हैं। वहीं कुछ मामलों में बीमारी धीरे-धीरे बढ़ती है और एक समय के बाद अंग सही तरीके से काम करना बंद कर देता है। ऐसी स्थिति में उस अंग का ट्रांसप्लांट ही सबसे बड़ा इलाज होता है। ट्रांसप्लांट से बच्चे के खराब अंग को हटाकर नया अंग लगाया जाता था। इस प्रक्रिया को अपनाने से शरीर के अन्य अंग भी सही तरीके से काम करते हैं और बच्चा सामान्य जीवन जी सकता है।
आधुनिक तकनीक से बच्चों में कई प्रकार के ट्रांसप्लांट सक्सेसफुली हो पा रहे हैं।
डॉक्टर बताते हैं कि लिवर ट्रांसप्लांट की जरूरत हर बच्चे को नहीं होती है। सिर्फ कुछ खास बच्चों को ही लिवर ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ती है। इसमें शामिल हैः
इस प्रकार की समस्या होने पर बच्चे को तुरंत इलाज न मिले तो उसकी स्थिति न सिर्फ गंभीर हो सकती है, बल्कि कुछ मामलों में बच्चों की जान भी जा सकती है।
डॉ. नीरज गोयल के अनुसार, 1 दशक पहले बच्चों में ट्रांसप्लांट का सबसे बड़ा चैलेंज सही डोनर मिलना था। छोटे बच्चों के शरीर के हिसाब से अंग का आकार मैच करना आसान नहीं होता था। खासतौर पर नवजात बच्चों के लिए किसी भी अंग के ट्रांसप्लांट का प्रोसेस काफी मुश्किल होता है। साथ ही, कई परिवार अंगदान को लेकर डर और गलतफहमियों का शिकार भी होते थे। जागरूकता की कमी के कारण लोग अंगदान के लिए आगे नहीं आते थे। पर अब समय बदल चुका है। मेडिकल साइंस में आई नई तकनीकों ने बच्चों के ट्रांसप्लांट को काफी सुरक्षित और सफल बना दिया है। अब डॉक्टर बड़े लिवर के हिस्से को छोटे बच्चे के शरीर के अनुसार तैयार कर सकते हैं। इससे बच्चों के अंगों का ट्रांसप्लांट करना आसान हो गया है।
तकनीक की मदद से ट्रांसप्लांट आसान हो गया है।
पहले लोगों को लगता था कि ट्रांसप्लांट के बाद बच्चा सामान्य जीवन नहीं जी पाएगा, लेकिन अब तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। बच्चों के शरीर के किसी भी अंग का ट्रांसप्लांट करवाने के बाद वह एक आसान जिंदगी जी सकता है। नॉर्मल बच्चों की तरह स्कूल जाना, खेल कूद करना, स्कूल की एक्टिविटी, पढ़ाई भी बिल्कुल नॉर्मल तरीके से कर सकता है। डॉक्टर कहते हैं कि ट्रांसप्लांट सिर्फ एक सर्जरी नहीं है, बल्कि यह लंबी देखभाल की प्रक्रिया होती है। ऑपरेशन के बाद बच्चे को नियमित दवाइयां और डॉक्टर की निगरानी की जरूरत होती है।
भारत में आज भी हजारों मरीज अंग मिलने का इंतजार करते हैं। कई बच्चों की जान सिर्फ इसलिए नहीं बच पाती क्योंकि समय पर डोनर नहीं मिल पाता है। ऐसे में डॉ. नीरज का कहना है कि देश में अंगदान को लेकर जागरूकता बढ़ाना बहुत जरूरी है। अगर ज्यादा लोग अंगदान के लिए आगे आएंगे तो कई बच्चों को नई जिंदगी मिल सकती है।
Disclaimer: डॉक्टर के साथ बातचीत के आधार पर हम यह सकते हैं कि आज ट्रांसप्लांट सिर्फ इलाज नहीं, बल्कि हजारों परिवारों के लिए उम्मीद बन चुका है। सही समय पर इलाज, आधुनिक तकनीक और जागरूकता की मदद से अब बच्चों को नई जिंदगी मिल रही है। अगर समाज और परिवार सहयोग दें तो बच्चे अंग ट्रांसप्लांट के बाद एक नॉर्मल लाइफ जी सकते हैं।