ब्रेस्ट कैंसर दोबारा होने पर किन बीमारियों का रिस्क बढ़ जाता है? जानिए डॉक्टर से

Breast Cancer Recurrence Risk: ब्रेस्ट कैंसर दोबारा होने पर कई तरह की बीमारियों का जोखिम बढ़ जाता है। आइए, जानते हैं इसके बारे में विस्तार से -

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Written By: priya mishra | Published : April 8, 2025 3:06 PM IST

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Medically Verified By: Dr Amit Upadhyay

Health Risks After Breast Cancer Recurrence: ब्रेस्ट कैंसर एक गंभीर बीमारी है, और अगर यह दोबारा हो जाए, तो शरीर को कई तरह से प्रभावित कर सकता है। इसके इलाज के दौरान जो प्रक्रियाएं अपनाई जाती हैं, जैसे सर्जरी, कीमोथेरेपी, रेडिएशन या हार्मोन थेरेपी—उनके भी कई दीर्घकालिक प्रभाव हो सकते हैं। ऐसे में यह जरूरी है कि हम यह समझें कि ब्रेस्ट कैंसर के दोबारा लौटने पर किन-किन बीमारियों या समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। इस विषय पर बेहतर जानकारी के लिए हमने दिल्ली स्थित पीएसआरआई अस्पताल के वरिष्ठ सलाहकार (ऑन्कोलॉजी और हेमेटोलॉजिस्ट), डॉ अमित उपाध्याय से बातचीत की।

ब्रेस्ट कैंसर के इलाज में अक्सर सर्जरी की जाती है। इसमें कभी-कभी केवल गांठ को निकाला जाता है, तो कभी-कभी पूरे स्तन को हटाना पड़ता है। कई बार सर्जरी के दौरान बगल के लिम्फ नोड्स को भी हटा दिया जाता है ताकि कैंसर के फैलाव को रोका जा सके। लिम्फ नोड्स हटाने के बाद हाथों में सूजन आना आम समस्या है, जिसे लिंफेडेमा कहा जाता है। यह सूजन जिस ओर की सर्जरी हुई होती है, उसी हाथ में होती है और यह स्थिति कई बार लंबे समय तक बनी रह सकती है।

अगर रेडिएशन दिया गया है, खासकर बाएं स्तन पर, तो हृदय को नुकसान पहुंचने का खतरा बढ़ जाता है क्योंकि हृदय बाईं ओर होता है। इसके अलावा, रेडिएशन का असर फेफड़ों पर भी हो सकता है, जिससे आगे चलकर फेफड़ों की कार्यक्षमता कम हो सकती है। मरीजों को सांस लेने में परेशानी या थकान महसूस हो सकती है, विशेष रूप से किसी शारीरिक गतिविधि के दौरान।

कीमोथेरेपी का उद्देश्य कैंसर कोशिकाओं को खत्म करना होता है, लेकिन इसके साथ-साथ यह शरीर की सामान्य कोशिकाओं पर भी असर डालती है। कुछ विशेष दवाएं, जैसे एंथ्रासाइक्लिन्स, हृदय को नुकसान पहुंचा सकती हैं। इसके अलावा, कीमोथेरेपी के कारण तंत्रिकाओं को नुकसान और फेफड़ों की कार्यक्षमता में गिरावट भी देखी गई है।

कई बार मरीजों को हाथ-पैर में झनझनाहट, कमजोरी, या जलन जैसी समस्याएं भी होने लगती हैं। यह संकेत होते हैं कि नसों पर असर पड़ा है। कुछ दुर्लभ मामलों में कीमोथेरेपी के कारण एक नया प्रकार का कैंसर भी उत्पन्न हो सकता है, हालांकि इसकी संभावना बहुत कम होती है।

ब्रेस्ट कैंसर के इलाज में अक्सर हार्मोन थेरेपी भी दी जाती है, खासकर उन मरीजों को जिनका कैंसर हार्मोन-सेंसिटिव होता है। इन दवाओं को लंबे समय तक (कभी-कभी 5-10 साल तक) लेना पड़ता है। इस थेरेपी का एक आम साइड इफेक्ट है हड्डियों की कमजोरी (ऑस्टियोपोरोसिस)। हार्मोनल दवाओं के कारण शरीर में कैल्शियम की कमी हो जाती है, जिससे हड्डियों में टूट-फूट होने का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए, मरीजों को नियमित रूप से कैल्शियम, विटामिन D और हड्डियों को मजबूत करने वाली दवाएं दी जाती हैं।

शारीरिक बीमारियों के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य पर भी गहरा असर पड़ता है। जब ब्रेस्ट कैंसर दोबारा लौटता है, तो मरीज के मन में बार-बार डर, चिंता और तनाव का भाव बना रहता है। यह एक तरह की चिरकालिक मानसिक थकावट बन सकती है, जिससे जीवन की गुणवत्ता प्रभावित होती है। कई मरीजों को एंग्जायटी, डिप्रेशन और आत्मविश्वास की कमी जैसी मानसिक समस्याएं भी हो सकती हैं।

अगर बीमारी पहले से एडवांस स्टेज में थी या शरीर के अन्य अंगों जैसे हड्डियों, लिवर या ब्रेन में फैल चुकी थी, तो उससे संबंधित लक्षण दोबारा उभर सकते हैं। उदाहरण के लिए, हड्डियों में कमजोरी या फ्रैक्चर, लीवर से जुड़ी समस्याएं या न्यूरोलॉजिकल लक्षण (जैसे भूलने की समस्या, सिरदर्द, संतुलन बिगड़ना) देखे जा सकते हैं।

Disclaimer: प्रिय पाठकों यह आर्टिंकल केवल सामान्य  जानकारी और सलाह देता है। यह किसी भी तरह से चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है। इसल‍िए अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करें। thehealthsite.com इस जानकारी के लिए ज‍िम्मेदारी का दावा नहीं करता है।

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