रेटिना आंख की रील है, इस तरह रखें इसका ख्‍याल

रेटिना के 50 प्रतिशत रोगियों में रोग की अवस्था एडवांस्ड होती है

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Written By: Editorial Team | Updated : October 12, 2018 8:28 AM IST

जैसे कैमरा में लेंस तस्वीर लेता है, लेकिन अंतिम दृश्य कैमरा की रील में बनता है। इसी तरह, रेटिना आंख की रील है, जहां कॉर्निया (आंख के आगे का भाग) तस्वीर लेता है, लेकिन अंतिम ²श्य रेटिना (आंख के पीछे का भाग) में बनता है। यह कहना है बॉम्बे हॉस्पिटल में ऑफ्थैल्मोलॉजिस्ट डॉ. अजय आई. दुदानी का। 11 अक्‍टूबर को 'वल्र्ड रेटिना डे' के उपलक्ष्‍य में  उन्होंने कहा कि कॉर्निया से संबंधित रोगों, जैसे कैटेरेक्ट का पता आसानी से चल जाता है, लेकिन रेटिना के रोगों, जैसे एज-रिलेटेड मैक्युलर डीजनरेशन (एएमडी) और डायबेटिक मैक्युलर एडीमा (डीएमई) को पहचानना कठिन होता है।

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डॉ. दुदानी ने कहा कि रेटिना के विभिन्न रोगों में से एएमडी और डीएमई ऐसे रोग हैं, जिनमें दिखाई देना बंद हो जाता है। एएमडी और डीएमई का प्रभावी प्रबंधन किया जा सकता है, यदि रोगी की समय पर जाँच हो। इसलिये, इन रोगों से जुड़े लक्षणों को समझना महत्वपूर्ण है, ताकि प्रारंभिक अवस्था में ही इनका पता चल सके।

उन्होंने कहा, "एक माह में आने वाले रोगियों में से लगभग 30 प्रतिशत को एज-रिलेटेड मैक्युलर डीजनरेशन (एएमडी) होता है, जबकि लगभग 40 प्रतिशत को डायबेटिक मैक्युलर एडीमा (डीएमई)। रेटिना के 50 प्रतिशत रोगियों में रोग की अवस्था एडवांस्ड होती है।"

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व्रिटीयो रेटिना सोसायटी ऑफ इंडिया (वीआरएसआई) के सचिव और एल.वी. प्रसाद आई इंस्टीट्यूट, हैदराबाद में क्लीनिकल रिसर्च के प्रमुख डॉ. राजा नारायणन ने कहा, "वर्ष 2020 तक भारत में ²ष्टिहीनों की संख्या 15 मिलियन हो जाएगी। रेटिना के रोग, जैस एज-रिलेटेड मैक्युलर डीजनरेशन और डायबेटिक मैक्युलर एडीमा ऐसी स्थितियां हैं, जिनका प्रभावी प्रबंधन किया जा सकता है, यदि समय पर जांच हो। इसलिए, लक्षण उभरने पर विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए। समय पर जांच होने से रोग का बढ़ना धीमा हो सकता है।"

उन्होंने कहा कि रोगियों को रेटिना रोगों के प्रारंभिक संकेतों और लक्षणों के प्रति सचेत रहना चाहिए। अधिकांशत: एएमडी के लक्षणों का कारण बड़ी आयु को समझा जाता है। मधुमेह रोगियों को प्रति छह माह में नेत्र रोग विशेषज्ञ/रेटिना रोग विशेषज्ञ के पास जाने की सलाह दी जाती है, क्योंकि उन्हें डायबेटिक रेटिनोपैथी होने का जोखिम अधिक होता है। एएमडी और डीएमई का शीघ्र पता लगने से अंधेपन की रोकथाम की संभावना बढ़ जाती है।

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