मैंटल हेल्थ से जुड़े इन 5 मिथकों को करें दूर, वरना हो सकता है स्वास्थ्य को नुकसान

Mental Health Day: हम चाहते हैं कि आप अपनी मेंटल हेल्थ पर ध्यान दें और कोई समस्या हो तो आप इसे शेयर कर पाएं, लेकन अगर आपके मन में कोई वहम है तो आइए उसे इस लेख के माध्यम से दूर कर देते हैं।

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Written By: Vidya Sharma | Published : October 9, 2025 10:55 AM IST

Mental Health Se Jude Myths: हर साल 10 अक्टूबर को मेंटल हेल्थ डे मनाया जाता है, जो हमें इस विषय पर जागरूक करता है कि मानसिक समस्याएं किसी को भी हो सकती हैं और इनका इलाज करवाना किसी को पागल घोषित नहीं करता है। इन दिवस का मुख्य उद्देश्य दुनिया भर में मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों के बारे में जागरूकता बढ़ाना और मानसिक स्वास्थ्य के समर्थन में प्रयासों को गति देना है। लेकिन ऐसा क्यों है कि प्रगति के इस दौर में हमें आज भी लोगों को उन्हें की मेंटल हेल्थ के लिए अवेयर करने की जरूरत पड़ रही है?

इसका कारण है, लोगों के मन में बैठे मिथक, जो हर किसी को डरा देते हैं। मेंटल हेल्थ से जुड़े लोगों के मन में बैठे मिथकों को जानने के लिए हमने एमपावर मेंटल हेल्पलाइन की क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट मीनल पाटिल से बात की। उन्होंने मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े इन 5 मिथकों के बारे में बताया। साथ ही उन्होंने कहा कि 'सच कहूं तो, इंटरनेट खराब मानसिक स्वास्थ्य सलाहों का अड्डा बन गया है। एक तरफ कोई 'हमेशा खुश रहो' और 'सिर्फ अच्छी बातें सोचो' जैसे पोस्ट डालता हैं, तो दूसरी तरफ कुछ इन्फ्लुएंसर 'जादुई इलाज और दुआओं' से सब ठीक करने का झांसा देते हैं।' आइए हम मेंटल हेल्थ के जुड़ी 5 मिथकों के बारें में जानें, ताकि आप अपनी मानसिक स्वास्थ्य का सही से ध्यान रख सकें।

मिथक 1: डिप्रेशन से जूझ रहा इंसान बस 'हिम्मत' करके तुरंत बाहर आ सकता है

साइकोलॉजिस्ट ने हकीकत बताते हुए कहा कि 'यह सोचना कि डिप्रेशन से पीड़ित व्यक्ति सिर्फ इच्छाशक्ति या 'सोच' से इसे हरा सकता है, इस बीमारी की सच्चाई को पूरी तरह नजरअंदाज करता है। डिप्रेशन के कई कारण होते हैं, जैसे दिमाग की केमिस्ट्री, जेनेटिक्स और जिंदगी के तनाव आदि। ऐसे में किसी को यह कहना कि 'बस खुश हो जाओ' या 'हिम्मत करो', उसकी बीमारी की गहराई को कम आंकना है। जरा सोचिए, डिप्रेशन कोई मूड खराब होना नहीं है, यह एक जटिल बीमारी है जिसमें ब्रेन केमिस्ट्री गड़बड़ा जाती है। आप इसे सिर्फ अच्छी बातें बोलकर वैसे ही ठीक नहीं कर सकते, जैसे आप चाकू से सर्जरी नहीं कर सकते।

मिथक 2: डिप्रेशन और उदासी (Sadness) एक ही बात है

डिप्रेशन के बारे में सबसे बड़ी गलतफहमी यही है कि इसे 'थोड़ा उदास' या 'मन खराब' होने जैसा मान लिया जाता है। उदासी एक आम भावना है जो थोड़े समय के लिए आती है और चली जाती है, जिससे आपकी रोजमर्रा की जिंदगी पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। लेकिन डिप्रेशन एक मानसिक स्वास्थ्य विकार (mental health disorder) है, सिर्फ एक भावना नहीं। इसमें उदासी लंबे समय तक बनी रहती है और इसके साथ-साथ कई मानसिक और शारीरिक लक्षण भी दिखते हैं। डिप्रेशन में इंसान उन चीजों से भी खुश नहीं हो पाता जिनमें उसे पहले मजा आता था। उसके रिश्ते भी खराब होने लगते हैं।

सीधी बात है कि अगर उदासी एक बारिश का बादल है, तो डिप्रेशन एक पूरा मॉनसून है जो आपके घर में पानी भर देता है और सब कुछ खराब कर देता है। ध्यान दें कि मुख्य फर्क क्या है? उदासी तब होती है जब आपका बाहर जाने का मन नहीं करता, लेकिन डिप्रेशन तब होता है जब आपका जिंदा रहने का मन नहीं करता। इस अंतर को पहचानें।

मिथक 3: 'FOMO' कोई बड़ी बात नहीं है; यह तो बस एक चरण है

हकीकत यह है कि FOMO (Fear Of Missing Out) यानी कुछ छूट जाने का डर, महज एक चरण नहीं है। यह एक वास्तविक मनोवैज्ञानिक समस्या है जिसके गंभीर स्वास्थ्य परिणाम होते हैं, जैसे चिंता (anxiety) और डिप्रेशन का बढ़ना। FOMO को 'बस एक स्टेज' कहकर टालना वैसा ही है जैसे आप चिंता को 'बस थोड़ी-सी फिक्र' कह दें।

मिथक 4: मानसिक स्वास्थ्य के बारे में बात करना शर्म की बात है

कई लोग अपनी मेंटल हेल्थ के बारे में बात करने से शर्माते हैं। लेकिन मानसिक स्वास्थ्य के बारे में खुलकर बात करना कमजोरी नहीं, बल्कि ताकत दिखाता है। अक्सर लोग इस शर्म (Stigma) के कारण मदद नहीं मांगते। उन्हें डर होता है कि अगर उन्होंने कुछ कहा तो लोग उन्हें जज करेंगे, गलत समझेंगे या कोई लेबल लगा देंगे। चुप रहने से अक्सर लक्षण और भी बिगड़ जाते हैं और अकेलापन बढ़ जाता है।

जब हम परिवार, स्कूल या ऑफिस में मानसिक स्वास्थ्य पर बातचीतको सामान्य बनाते हैं, तो लोगों को मदद मिलती है। तो आइए, इस कहानी को पलटते हैं। अपनी परेशानी के बारे में चुप न रहें और मानसिक स्वास्थ्य पर बात करने को ताकत की निशानी मानें, न कि कमजोरी की। जरा सोचिए अगर आपका हाथ टूट जाए, तो डॉक्टर के पास जाने में शर्म नहीं आती। आपका दिमाग तो आपके हाथ से भी ज्यादा जरूरी है।

मिथक 5: 'परफेक्ट' परिवारों में मानसिक स्वास्थ्य की समस्याएं नहीं होतीं

"परफेक्ट परिवार" एक झूठ है, जो जादुई यूनिकॉर्न और अपने-आप भरने वाले फ्रिज जितना ही बड़ा धोखा है। किसी भी परिवार में कमी न हो, यह हो ही नहीं सकता, और मानसिक स्वास्थ्य की समस्याएं किसी भी परिवार में हो सकती हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपकी आमदनी, सामाजिक स्थिति या पारिवारिक इतिहास क्या है। सच यह है कि हर परिवार उतार-चढ़ाव से गुजरता है, और मानसिक स्वास्थ्य की चुनौतियां इंसान होने का एक हिस्सा हैं।

मानसिक स्वास्थ्य की समस्याएं आपके सजे-संवरे इंस्टाग्राम पोस्ट, आपकी अमीरी या आपके बड़े घर की परवाह नहीं करतीं। अक्सर इसी "परफेक्ट" दिखने के दबाव के कारण लोग मदद लेने से कतराते हैं। इसलिए ध्यान दें कि हर परिवार थोड़ा-बहुत उलझा हुआ होता है। सबसे स्वस्थ परिवार वे हैं जिन्होंने इस उलझन को स्वीकार किया है और थेरेपिस्ट की मदद से मिलकर इससे निपटना सीख लिया है।

ये मिथक सिर्फ आपको गलत जानकारी नहीं देते, ये आपके विश्वासों को नुकसान पहुंचाते हैं। हमारा लक्ष्य एकदम सही, समस्या-मुक्त जीवन जीना नहीं है, बल्कि सही तरीके और सही सहारे के साथ जिंदगी की चुनौतियों का सामना करना है। तो, खुलकर बात करें, और एक-दूसरे का सहयोग करें।

Disclaimer: प्रिय पाठकों यह आर्टिकल केवल सामान्य जानकारी और सलाह देता है। यह किसी भी तरह से चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है। इसलिए अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करें। thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।

FAQs

प्रेगनेंसी के बाद अच्छी मेंटल हेल्थ के लिए क्या करें?

प्रेगनेंसी के बाद मेंटली हेल्दी रहने के लिए आप अच्छी तरह आराम करें और अपना अच्छी तरह ध्यान रखें।

मानसिक स्वास्थ्य कैसे ठीक करें?

मानसिक स्वास्थ्य को ठीक करने के लिए, नियमित रूप से व्यायाम करना, पर्याप्त नींद लेना, तनाव का प्रबंधन करना, सामाजिक संबंध बनाए रखना, और जरूरत पड़ने पर पेशेवर मदद लेना महत्वपूर्ण है।

क्या बच्चों को डिप्रेशन हो सकता है?

जी हां,  बच्चों को भी डिप्रेशन और स्ट्रेस जैसी मानसिक समस्याएं हो सकती हैं।  कई स्टडीज और रिसर्च में बच्चों में मेंटल हेल्थ से जुड़ी कई गम्भीर समस्याएं देखी गयी हैं।

क्या अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करता है?

कई शोधों में पाया गया है कि अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड्स के अधिक सेवन से डिप्रेशन, एंग्जायटी और मूड स्विंग्स जैसी मानसिक समस्याएं बढ़ सकती हैं। अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड्स में पोषक तत्वों की कमी होती है, जिसके कारण ब्रेन फंक्शनिंग प्रभावित होती है।

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