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उज्बेकिस्तान से 12 वर्षीय खुसानबेक ओजोटिला जब 3 साल का था, तब उसके साथ एक दुर्घटना घटी। वह अपने घर की छत से गिर गया और उसके सिर में गंभीर चोट लगी, जिसके बाद उसे उज्बेकिस्तान के सिटी हॉस्पिटल में भर्ती किया गया। वहां उसकी जीवनरक्षक प्रक्रिया ट्रैकियोस्टोमी की गई। इस प्रक्रिया में गर्दन में एक छेद कर मरीज की सांस की नली में एक ट्यूब डाली जाती है, ताकि मरीज सांस ले सके। इसके बाद बच्चे की गर्दन में स्थायी छेद हो गया, जिसकी वजह से उसकी बोलने की क्षमता चली गई।
बचपन ऐसा समय है, जब बच्चा बोलना सीखता है, दुनिया के बारे में रोजाना कुछ नया सीखता है। हालांकि, खुसानबेक जीवन की इस खुशी से वंचित था, क्योंकि वह बोल नहीं सकता था। 10 साल तक वह बोल नहीं पाया, जिसके बाद उसकी मां ने अपोलो हॉस्पिटल्स में उसका इलाज करवाने का फैसला लिया। अपोलो होस्पिटल्स के डॉ. सुरेश सिंह नरूका, कन्सलटेन्ट, ईएनटी डिपार्टमेन्ट, डॉ (प्रोफेसर) अमित किशोर, सीनियर कन्सलटेन्ट सर्जन, ईएनटी, और डॉ. निशांत राना रजिस्ट्रार की टीम ने हाल ही में बच्चे की सर्जरी की, जिसमें उसकी ट्रैकिया को रीकन्सट्रक्ट किया गया।
16 दिसम्बर 2019 को बच्चे को अस्पताल में भर्ती किया गया। सर्जरी की योजना दो चरणों में तैयार की गई थी। पहले चरण में मरीज खुसानबेक की एंडोस्कोपिक जांच की गई, जिसमें पाया गया कि उसका वायुमार्ग संकरा है। इस स्थिति को सबग्लोटिस स्टेनोसिस कहते हैं। इस प्रक्रिया में बच्चे की ट्रैकिया में टी-ट्यूब डाली गई। इस के बाद रीकन्सट्रक्टिव सर्जरी (Reconstructive surgery) का फैसला लिया गया, जो तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण था। 7 दिनों के बाद, दूसरे चरण की सर्जरी की गई, जिसमें विंडपाइप का रीकन्स्ट्रक्शन किया गया। इसके लिए उसकी पसली के एक हिस्से से ग्राफ्ट बनाकर विंडपाइप को चौड़ा किया गया। सर्जरी बिना किसी जटिलता के पूरी हुई। इससे गर्दन का छेद बंद हो गया।
बच्चे को एक दिन के लिए डॉ. नमीत जेरथ, सीनियर पीडिएट्रिशियन की निगरानी में पीडिएट्रिक इंटेंसिव केयर युनिट में रखा गया। अगली सुबह बच्चे को वेंटीलेटर से हटाया गया। इस तरह उसके गर्दन में पिछले 10 सालों से जो ट्यूब डाली हुई थी, उसे निकाल दिया गया।
डॉ. नरूका ने कहा, ‘‘आखिरकार 10 साल आवाज से वंचित रहने के बाद एक बच्चा फिर से बोल पाया है। 29 दिसम्बर 2019 को उसे छुट्टी दे दी गई। अब वह सामान्य जीवन जी रहा है और अपने देश लौट गया है।’