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Down syndrome day 2024: डाउन सिंड्रोम से पीड़ित बच्चों में रहता है हार्ट डिजीज का खतरा, जानिए क्या है इसके पीछे की वजह

कुछ स्टडीज के अनुसार, डाउन सिंड्रोम से पीड़ित लगभग 40 फीसदी बच्चों में जन्म के साथ ही किसी ना किसी प्रकार की हार्ट डिजिज होती है।

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Written By: Sadhna Tiwari | Updated : March 21, 2024 8:12 PM IST

Down syndrome and risk of heart diseases: डाउन सिंड्रोम एक जेनेटिक डिसऑर्डर है जो बच्चों को मां के पेट मे रहते ही हो सकता है। इस स्थिति के साथ जन्म लेने वाले बच्चे में एक क्रोमोजोम एक्स्ट्रा होता है। बता दें कि जब नॉर्मल बच्चे का जन्म होता है तो उसमें क्रोमोसोम की संख्या 46 होती है। इसमें मां से 23 क्रोमोसोम मिलते हैं जबकि 23 पिता से। जबकि डाउन सिंड्रोम वाले बच्चों में क्रोमोजोम की संख्या 47 तक होती है। मेडिकल जगत में इस स्थिति को डाउन सिंड्रोम और टाइसॉमी कहा जाता है। आंकड़ों के अनुसार, 1000 में से 1 बच्चे में डाउन सिंड्रोम की बीमारी देखी जाती है।

डाउन सिंड्रोम के साथ बच्चों में हार्ट डिजिज का रिस्क अधिक  (High risk of heat diseases in kids, reason and causes)

डाउन सिंड्रोम का सबसे अधिक असर बच्चे के ब्रेन पर (effect of down syndrome in kids) देखा जाता है। वहीं, कुछ स्टडीज के अनुसार, डाउन सिंड्रोम से पीड़ित बच्चों में हार्ट  डिजिज का खतराभी अन्य बच्चों की तुलना में अधिक होता है। एक्सपर्ट्स के अनुसार, डाउन सिंड्रोम से पीड़ित लगभग 40 फीसदी बच्चों में जन्म के साथ ही किसी ना किसी प्रकार की हार्ट डिजिज (Down syndrome and heart diseases )होती है। वहीं, 15 प्रतिशत बच्चों में गैस्‍ट्रोइंस्‍टेस्‍टाइनल डिसॉर्डर्स का खतरा होता है। जबकि, इन बच्चों को देखने और सुनने की क्षमता भी कम होती है या इससे जुड़ी परेशानियां उन्हें हो सकती हैं।

डाउन सिंड्रोम वाले व्यक्ति में एक क्रोमोसोम या गुणसूत्र एक्स्ट्रा होता है जिसकी वजह बच्चे के शारीरिक औऱ मानसिक विकासपर असर पड़ता है। इसीलिए यह स्थिति बच्चे के लिए मेंटली और फिजकिली अधिक चुनौतिपूर्ण हो सकती है।

डाउन सिंड्रोम के लक्षण क्या हैं?  (Symptoms of Down syndrome in kids)

  • पीड़ित बच्चों के चेहरे सपाट होते हैं।
  • इनकी आंखे और ऊपर की ओर तिरछी होती हैं।
  • गर्दन का आकार छोटा हो जाता है
  • पैर-हाथ छोटे और चौड़े होते हैं।
  • हाथों-पैरों की उंगलियां छोटे आकार की होती हैं।

डाउन सिंड्रोम का पता लगाने के तरीके क्या हैं ?

डाउन सिंड्रोम की बीमारी का पता जन्म से पहले ही लग सकता है। प्रेगनेंसी के दौरान गर्भवती महिला के एम्नियोसेंटेसिस टेस्ट से बच्चे में डाउन सिंड्रोम का पता लगाया जा सकता है। गर्भ में ही इस बीमारी का पता लग जाने से प्रेग्नेंसी को टर्मिनेट करने की सलाह डॉक्टरों द्वारा दी जा सकती है। इसे कानूनी रूप से मान्यता भी मिली है।

डाउन सिंड्रोम से पीड़ित बच्चे की मदद कैसे की जा सकती है?

जन्म के बाद बच्चे में डाउन सिंड्रोम का पता चलने के बाद बच्चे को फिजियोथेरेपिस्ट की मदद से इलाज उपलब्ध कराया जा सकता है। बच्चे की थेरेपीज में उसे पढ़ने-लिखने, बोलने और अन्य साधारण काम आसानी से करने के लिहाज से तैयार किया जाता है।