Pediatric Emergency: क्या करें जब बच्चे खेलते हुए कोई गलत चीज निगल जाएं? जानिए बच्चों की डॉक्टर गीता जयपति से

पीडियाट्रिक इमरजेंसी रूम में ब्लड प्रेशर चेक करने, कफ, नाक कान में फंस गई चीजों को निकालने वाले यंत्र, और ऐसी टीम शामिल होती है जो बच्चे को उनके शरीर के हिसाब से दवाई देने में मदद करती है।

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Written By: Atul Modi | Published : December 10, 2021 1:58 PM IST

छोटे बच्चे बड़ों की तरह बोल कर अपने दर्द या तकलीफ के बारे में नहीं बता सकते। उनको कुछ समस्या है इसका अंदाजा केवल बच्चों के रोने या कुछ न खाने पीने से लगाया जा सकता है। अगर बच्चा काफी चिड़चिड़ा हो गया हो तो उसकी जांच कर पाना भी डॉक्टर के लिए मुश्किल हो जाता है। कुछ आपातकालीन स्थिति (Pediatric Emergency) जो एक्सीडेंट या शारीरिक स्थिति से जुड़ी हों और उनके प्रबंधन में देरी की जाए तो बच्चे के लिए जानलेवा हो सकती हैं। बच्चे को ठीक करने के लिए केवल अच्छे डॉक्टर की ही नहीं बल्कि अच्छे माहौल और अच्छी टीम की भी जरूरत होती है।

उदाहरण के तौर पर जैसे अधिक ऊंचाई से गिरने से बच्चे को सूजन और चोट आ सकती है। लेकिन आंतरिक रूप से भी उसे चोट आ सकती हैं जो बाहर से दिखाई नहीं देती हैं। इसलिए पूरी तरह से चोट की जांच करवाने के लिए सीटी स्कैन (CT Scan) करवाना या पूरा एग्जामिनेशन करवाना काफी आवश्यक हो जाता है।

चूंकि बच्चे अधिकतर घरों में ही रह रहे हैं इसलिए आजकल उनको चोट लगना काफी अधिक हो गया है। अगर बच्चा छोटा है तो वह किसी भी चीज को मुंह या नाक में भी डाल सकता है। कपूर की गोलियां जैसी वस्तु बच्चे के मुंह में जाकर काफी नुकसान पहुंचा सकती हैं। बढ़ते बच्चे मच्छर मारने वाले स्प्रे को भी अपने ऊपर छिड़क लेते हैं। बच्चों को ऐसी दवाई भी नहीं दी जा सकती कि उसे लेने से उनके पेट से सारे टॉक्सिंस उल्टी के माध्यम से निकल कर आ सकें क्योंकि बच्चों के लिए ऐसी चीजें भी हानिकारक हो सकती हैं। ऐसी स्थिति में विशेषज्ञों के मुकाबले तुरंत इमरजेंसी केयर पीडियाट्रिशियन (बच्चों का डॉक्टर) के पास जाना चाहिए।

डॉक्टर गीता जयपति कहती हैं कि, बच्चा बाहर रखी कुछ चीजों को अपने कान, नाक मुंह में आसानी से डाल सकता है। इन चीजों को समय पर ही बच्चे के नाक या कान से निकाल दिया जाए तो उन्हें लंबे समय तक होने वाले नुकसान से बचाया जा सकता है। इस स्थिति में बच्चे के प्रभावित क्षेत्र को पूरी तरह से साफ करना और उन्हें दर्द से राहत दिलाने वाली दवाई देने के लिए भी विशेषज्ञ की राय लेना काफी जरूरी है। इस प्रकार की स्थिति में सुरक्षा के साथ बच्चे को हैंडल करना भी एक स्किल होती है। जो समय और अनुभव के साथ विकसित होती है।

सांस लेने में दिक्कत होना या छाती से सीटी की आवाज आने के समय, अगर तुरंत डॉक्टर के पास न लेकर जाया जाए तो स्थिति और अधिक खराब हो सकती है।

आपातकालीन स्थिति में पीडियाट्रिक इमरजेंसी रूम लेने के फायदे

बच्चों की मेडिकल, साइकोलॉजिकल और विकासशील जरूरतें बड़े के मुकाबले अलग होती हैं। पीडियाट्रिक इमरजेंसी रूम में ब्लड प्रेशर चेक करने, कफ, नाक कान में फंस गई चीजों को निकालने वाले यंत्र, और ऐसी टीम शामिल होती है जो बच्चे को उनके शरीर के हिसाब से दवाई देने में मदद करती है। ऐसे कमरों में अधिकतर न्यूरोसर्जरी, यूरोलॉजी, ईएनटी आदि भी होते हैं। बच्चों में आने वाली आपातकालीन स्थितियों को हैंडल करने के लिए सुरक्षा का ध्यान रखना काफी आवश्यक होता है। बच्चे के मां बाप के लिए ऐसा इमरजेंसी रूम पहले ही ढूंढ कर रखना काफी आवश्यक होता है जिसमे सभी सुविधाएं उपलब्ध हों ताकि इमरजेंसी के समय अधिक समय व्यर्थ न हो सके। इस प्रकार के इमरजेंसी रूम में कंसल्टेंसी के लिए डायरेक्ट फोन कॉल करने की भी सुविधा उपलब्ध होती है। पहले ही डॉक्टर से राय ले लेने से समय पर होने वाली चिंता और आगे क्या करना है इस बात की हड़बड़ाहट से बचा जा सकता है। एम्बुलेंस सुविधा के साथ-साथ ऐसे पीडियाट्रिशियन की सुविधाएं उपलब्ध करने के लिए डॉक्टर का नंबर पहले ही प्राप्त कर लें।

इमरजेंसी रूम से जुड़े कुछ मिथ और फैक्ट्स

1. झूठ: यह एक ऐसा रूम होता है जहां पहले आने वाले मरीजों का इलाज पहले किया जाता है।

सच: सबसे ज्यादा गंभीर मरीज का इलाज पहले किया जाता है। अगर आपके बच्चे की स्थिति ठीक है और बाद में कोई ऐसा बच्चा आया है जिसकी सेहत उससे खराब है तो आपको अपनी बारी आने तक इंतजार किया जा सकता है।

2. झूठ: इमरजेंसी रूम में सारे लक्षण कुछ ही क्षणों में ठीक हो जाते हैं।

सच: बच्चे के लक्षणों के आधार पर हो सकता है उसे ठीक होने में समय लग जाए, हो सकता है उसका गहनता से उपचार करने के लिए खून की जांच या Xrey आदि करने की भी जरूरत पड़ जाए। इस सब में थोड़ा समय लग जाता है और इस समय में धैर्य होना काफी जरूरी है।

3. झूठ: इमरजेंसी रूम में जाने के तुरंत बाद बच्चे को एडमिट कर लिया जाता है।

सच: जो बच्चे ज्यादा गंभीर हैं और जिन्हें लंबे उपचार और मॉनिटरिंग की जरूरत होती है, उन्हें ही एडमिट किया जाता है।

4. झूठ: इमरजेंसी रूम में सभी मरीज खून से लथपथ होते हैं और यह मानसिक रूप से एक ट्रॉमा हो सकता है।

सच: अधिक गंभीर बच्चों के लिए अलग स्थान होता है और बाद में इन बच्चों को आईसीयू में शिफ्ट कर दिया जाता है। यह जगह बच्चों के लिए सुरक्षित और चाइल्ड फ्रेंडली माहौल वाली होती है।

5. झूठ: जो बच्चे इमरजेंसी रूम में जाते हैं वह कोरोना इंफेक्शन से संक्रमित होने के अधिक रिस्क में आ जाते हैं।

सच: नहीं, जो बच्चे कोविड के लक्षणों के साथ आते हैं उन्हें अलग से भर्ती किया जाता है। यह स्थान नॉन फेब्राइल और नॉन रेस्पिरेटरी आपातकाल स्थितियों के लिए होता है।

इनपुट्स: डॉक्टर गीता जयपति, चिल्डरेन्स, पिडियाट्रिक एंड पिडियाट्रिशन, रेनबो चिल्ड्रन अस्पताल, चेन्नई