
विद्या शर्मा
विद्या शर्मा को डिजिटल मीडिया में लगभग 3 साल का अनुभव है। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता ... Read More
Written By: Vidya Sharma | Published : June 2, 2026 12:56 PM IST
Medically Verified By: Dr.Vaibhaw Kumar
लिवर ट्रांसप्लांट
Liberian Patient Ka India Mai Liver Transplant: लिवर ट्रांसप्लांट करने की नौबत तब आती है जब किसी व्यक्ति का लिवर बहुत ही ज्यादा खराब हो जाता है और कोई दूसरा इलाज असरदार नहीं रह जाता है। लिवर खराब होने के कई कारण हो सकते हैं जैसे अधिक मात्रा में एल्कॉहल लेना, फैट का बढ़ना, गलत खानपान, हेपेटाइटिस बी और सी होने के कारण लिवर में सूजन पैदा होना, किसी भी बीमारी की अधिक दवाइयां खाना और ऑटोइम्यून बीमारियों को बढ़ जाना आदि। ऐसा ही कुछ मैरी के साथ भी था। लाइबेरिया की रहने वाली यह मैरी (मरीज की नीजता के लिए बदलवा हुआ नाम) लगभग पांच सालों से हेपेटाइटिस B के साथ जी रही थी और लगभग तीन साल पहले उसे HIV संक्रमण का पता चला था।
समय के साथ, उनकी सेहत काफी बिगड़ गई, जिसके कारण उन्हें लिवर फेलियर (लिवर का काम करना बंद कर देना) की गंभीर समस्या हो गई। इसके साथ ही उसे पीलिया, पेट में पानी जमा होना और लिवर में कई ट्यूमर होने जैसी समस्याएं भी हो गईं। बेहतर इलाज की तलाश में, वह विशेष देखभाल के लिए भारत आई। जहां पारस हेल्थ, गुरुग्राम के डॉक्टरों ने 42 साल की विदेशी महिला मैरी का बेहद जटिल 'लिविंग डोनर लिवर ट्रांसप्लांट' सफलतापूर्वक किया। आइए लिवर ट्रांसप्लांट और GI सर्जरी के डायरेक्टर डॉक्टर वैभव कुमार से जानते हैं कि लिवर ट्रांसप्लांट की जरूरत कब होती है और उन्हें 42 साल की महिला के इलाज में कौन सी चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
42 साल की मैरी को हेपेटाइटिस B वायरस (HBV) से जुड़ी लिवर की लास्ट स्टेज की बीमारी, HIV इंफेक्शन और 'मल्टीफोकल हेपेटोसेलुलर कार्सिनोमा' (लिवर कैंसर का एक प्रकार) का पता चला था। अपने लिवर ट्रांसप्लांट के लिए वह भारत आईं। उनके इस प्रोस इस प्रोसेस को लिवर ट्रांसप्लांटऔर GI सर्जरी के डायरेक्टर डॉक्टर वैभव कुमार ने लीड किया, जिसमें अस्पताल की एक मल्टीडिसीप्लीनरी ट्रांसप्लांट टीम शामिल थी।
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मैरी लगभग पांच सालों से हेपेटाइटिस B के साथ जी रही थी। लगभग तीन साल पहले उन्हें HIV संक्रमण हुआ था। समय के साथ उनकी सेहत काफी बिगड़ गई, जिसके कारण उन्हें लिवर फेलियर भी हो गया। इसके साथ ही उन्हें पीलिया, पेट में पानी जमा होना और लिवर में कई ट्यूमर होने जैसी समस्याएं भी हो गईं। बेहतर इलाज की तलाश में, वह खास देखभाल के लिए भारत आई।
हमने केस स्टडी से जुड़ा यह सवाल डॉक्टर से पूछा, जिसका जवाब उन्होंने दिया कि "जांच के बाद हमने उनकी HBV से जुड़ी 'डीकंपेंसेटेड क्रोनिक लिवर डिजीज'(लिवर की पुरानी बीमारी) के साथ-साथ 'मल्टीफोकल हेपेटोसेलुलर कार्सिनोमा' होने का भी पता लगाया। HIV-पॉजिटिव मरीज में लिवर ट्रांसप्लांट करना अपने आप में एक मेडिकल चैलेंज होता है, क्योंकि सर्जरी के बाद इंफेक्शन और बाकी समस्याओं का खतरा ज्यादा हो जाता है। लिवर में कई ट्यूमर और लिवर की गंभीर बीमारी होने के कारण यह मामला और भी जटिल हो गया था, जिसके लिए एक बड़ी प्लानिंग, कड़ी निगरानी और अलग-अलग एक्सपर्ट्स के बीच आपसी तालमेल की जरूरत थी।"
डॉक्टर बताते हैं कि "इलाज के इस सफर में एक बड़ी चुनौती तब सामने आई, जब मरीज के साथ आए डोनर की जांच में पता चला कि वह हेपेटाइटिस B-पॉजिटिव है और इसलिए वह लिवर दान करने के लिए सही चुनाव नहीं हैं। इसी की वजह से मरीज को लगभग चार महीने तक भारत में ही रहकर इलाज जारी रखना पड़ा। इस दौरान ट्रांसप्लांट टीम ने उन्हें कई बार अस्पताल में भर्ती करके बिगड़ती लिवर कंडिशन को कंट्रोल किया और साथ ही ट्यूमर के बढ़ने पर भी बारीकी से नजर रखी, ताकि यह तय किया जा सके कि कैंसर लिवर से बाहर न फैल रहा हो। इसके साथ ही, सफल ट्रांसप्लांट की संभावनाओं को बेहतर बनाने के लिए, मेडिकल उपायों द्वारा उसके HIV और हेपेटाइटिस B की स्थिति को भी कंट्रोल और स्टेबल किया गया।
डॉक्टर बताते हैं कि "जब स्थित खराब हो गई थी तो आखिर में मरीज का 50 साल का भाई लिवर दान करने के लिए आगे आया। लिवर दान के लिए सुटेबल घोषित किए जाने से पहले, उनकी पूरी तरह से चिकित्सकीय जांच की गई। इसके बाद, ट्रांसप्लांट टीम ने 'राइट लोब लिविंग डोनर लिवर ट्रांसप्लांट' (LDLT) की प्रक्रिया को अंजाम दिया।
इसके तहत डोनर के लिवर का लगभग 57% हिस्सा मरीज में ट्रांसप्लांट किया गया। यह सर्जरी लगभग नौ घंटे तक चली, जिसमें सर्जनों, एनेस्थीसिया एक्सपर्ट, क्रिटिकल केयर एक्सपर्ट, नर्सिंग स्टाफ और ट्रांसप्लांट कोर्डीनेटर्स की एक टीम ने मिलकर काम किया। केस की जटिलता के बावजूद, सर्जरी के बाद मरीज अच्छी तरह से ठीक हो गया।"
डॉक्टर ने जानकारी दी कि "सर्जरी के पहले ही दिन मरीज की ट्यूब निकाल दी गई, उन्होंने लगभग पांच दिन इंटेंसिव केयर यूनिट में बिताए और दो हफ्तों के अंदर उन्हें डिस्चार्ज कर दिया गया। लाइबेरिया लौटने से पहले मैरी लगभग तीन महीनों तक फॉलो-अप देखभाल के लिए भारत में ही रही। ट्रांसप्लांट के एक साल से भी ज्यादा समय बाद भी, वह पूरी तरह से स्थिर और इन्फेक्शन-मुक्त है, और उसने अपनी सामान्य निजी और पेशेवर जिंदगी फिर से शुरू कर दी है।
इस केस के बारे में बात करते हुए, पारस हेल्थ गुरुग्राम में लिवर ट्रांसप्लांट और GI सर्जरी के डायरेक्टर डॉ. वैभव कुमार ने कहा, “यह सबसे चुनौतीपूर्ण ट्रांसप्लांट केसों में से एक था, क्योंकि मरीज एक ही समय में HIV इन्फेक्शन, हेपेटाइटिस B के कारण लिवर की गंभीर विफलता, और लिवर में कई ट्यूमर जैसी समस्याओं से जूझ रहा था। HIV-पॉजिटिव मरीजों में, ट्रांसप्लांट के बाद इम्यूनोसप्रेसिव थेरेपी और इन्फेक्शन नियंत्रण के बीच संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी हो जाता है।
इलाज के हर चरण में सावधानीपूर्वक योजना बनाने की जरूरत थी- सही डोनर चुनने से लेकर ट्यूमर के बढ़ने पर नजर रखने और सर्जरी के बाद ठीक होने की प्रक्रिया को संभालने तक। सबसे अच्छी बात यह है कि एक साल से भी ज्यादा समय बाद, मरीज पूरी तरह से ठीक है और अपनी सामान्य दिनचर्या पर लौट पाया है।”
पारस हेल्थ के डॉक्टरों ने बताया कि जहां हेपेटाइटिस B के मरीजों में लिवर ट्रांसप्लांट नियमित रूप से किए जाते हैं, वहीं कई जगहों पर लिवर में ट्यूमर वाले HIV-पॉजिटिव लोगों में ट्रांसप्लांट करना दुनिया भर में अभी भी काफी दुर्लभ है, क्योंकि इसमें कई तरह की मेडिकल कॉम्पलीकेशन शामिल होते हैं। इस सफल परिणाम से पता चलता है कि भारत में ट्रांसप्लांट चिकित्सा, इन्फेक्शन प्रबंधन और मरीजों की देखभाल के लिए कई विशेषज्ञताओं के मेल के क्षेत्र में कितनी प्रगति हुई है।
डिस्क्लेमर: लिवर से जुड़ी बीमारियां ठीक की जा सकती हैं। अगर आप समय रहते उन्हें पहचान लें तो लिवर ट्रांसप्लांट की जरूरत न पड़े। अपनी सेहत का ख्याल रखें और समय-समय पर LFT-KFT आदि जैसे सामान्य चेकअप करवाते रहें। ताकि समस्या गंभीर रूप न ले।