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पार्किंसंस रोग (Parkinson's disease)

उम्र बढ़ने के साथ-साथ बीमारियां होने का खतरा भी बढ़ता रहता है। वृद्धावस्था में कुछ लोगों का स्वास्थ्य अपेक्षाकृत स्वस्थ रह सकता है, जबकि अन्य लोगों को नई-नई बीमारियों के साथ अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इन्हीं में से एक परेशानी को पार्किंसंस रोग (Parkinson's Disease) कहा जाता है। पार्किंसंस रोग एक ऐसा विकार है, जो मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है। यह विकार ज्यादातर बुजुर्ग व्यक्तियों को ही होता है, लेकिन यह कम कम उम्र वाले लोगों को भी प्रभावित कर सकता है। दरअसल, पार्किंसंस रोग उन कोशिकाओं को प्रभावित करता है, जो शरीर के हिलने-ढुलने की कार्य प्रक्रिया (मोटर फंक्शन) को प्रभावित करती हैं। इस कारण से व्यक्ति को सामान्य रूप से शारीरिक हलचल करने में दिक्कत होने लगती है। पार्किंसंस पुरुषों और महिलाओं दोनों को बराबर रूप से प्रभावित करता है, हालांकि, भारत के आंकड़ों की बत करें तो पुरुषों की तुलना में महिलाओं में यह अधिक देखा जाता है।

पार्किंसंस रोग के लक्षण

शरीर के अंगों में कंपन (या हिलना), अकड़न और हलचल धीमी होना पार्किंसंस रोग के प्रमुख लक्षण हैं और इन्हें मोटर सिंपटम भी कहा जाता है। मोटर लक्षणों को अलावा पार्किंसंस रोग से कुछ अन्य लक्षण भी विकसित हो सकते हैं, जैसे शारीरिक मुद्रा को सीधा न रख पाना, धीमी आवाज में बोलना, मलमूत्र त्यागने में दिक्कत और रात को सो न पाना आदि। पार्किंसंस रोग की एक यह भी विशेषता है कि इससे ग्रसित व्यक्ति को महसूस हो रहे लक्षणों में रोजाना बदलाव होते रहते हैं और कई बार हर घंटे उसके लक्षण बदल जाते हैं। पार्किंसंस रोग से कुछ लक्षण ऐसे भी होते हैं, जो हर व्यक्ति के स्वास्थ्य व उसे हुई अन्य बीमारियों पर निर्भर करते हैं जैसे -


  • कब्ज

  • त्वचा संवेदनशील हो जाना व दर्द होना

  • बोलने व निगलने में कठिनाई

  • थकान महसूस होना

  • डिप्रेशन व अन्य मानसिक समस्याएं


डॉक्टर को दिखाएं?

यदि आपको ऊपरोक्त में से कोई लक्षण महसूस हो रहा है या फिर परिवार में पहले से ही किसी व्यक्ति को यह रोग होने के कारण आपको भी इस रोग का खतरा है, तो ऐसे में डॉक्टर से संपर्क जरूर करें।

पार्किंसंस रोग का निदान

पार्किंसंस रोग का निदान करने के लिए कोई विशिष्ट टेस्ट उपलब्ध नहीं हैं। हालांकि, ऐसे कई टेस्ट हैं जिनकी मदद से पार्किंसंस रोग जैसे न्यूरोलॉजिकल का पता लगाने में मदद मिल सकती है। पार्किंसंस रोग का निदान न्यूरोलॉजिस्ट द्वारा की जाती है, जो मरीज को महसूस हो रहे लक्षणों और अन्य शारीरिक परीक्षणों के आधार पर इस रोग का निदान शुरू करते हैं। यदि मरीज को लगता है कि व्यक्ति पार्किंसंस रोग से ग्रसित है, तो स्थिति की पुष्टि करने के लिए कुछ प्रकार के इमेजिंग टेस्ट व अन्य परीक्षण किए जा सकते हैं।

पार्किंसंस रोग के कारण

शरीर में तंत्रिका कोशिकाएं (Nerve cells) डोपामाइन नामक एक खास केमिकल जारी करती हैं, जो शरीर की हलचल को नियंत्रित करने में मस्तिष्क की मदद करता है। पार्किंसंस रोग से ग्रसित लोगों में ये कोशिकाएं क्षतिग्रस्त होने लगती हैं, जिससे जिससे मस्तिष्क शरीर की हलचल को सामान्य रूप से नियंत्रित नहीं कर पाता है। जब न्यूरोन्स धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त होने लगते हैं, जो डोपामाइन पर्याप्त मात्रा में बन नहीं पाता है और मस्तिष्क की कार्य करने की क्षमता धीमी पड़ जाती है। लेकिन, अभी तक इस बात का पूरी तरह से पता नहीं चल पाया है कि न्यूरोन्स किस कारण से नष्ट होने लग जाते हैं। हालांकि, कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस रोग में न्यूरोन्स नष्ट होने के पीछे का कारण कुछ जीन (गुणसुत्रों) में गड़बड़ी हो सकती है।

पार्किंसंस रोग के जोखिम कारक

पार्किंसंस रोग पर किए गए कुछ अध्ययनों के अनुसार जिन लोगों के परिवार में किसी व्यक्ति को पहले से ही पार्किंसंस रोग है, तो उन्हें भी यह रोग होने का खतरा हो सकता है। वहीं अगर किसी व्यक्ति के मता-पिता या सगे भाई-बहन में से किसी को पार्किंसंस रोग है, तो उसे पार्किंसंस रोग होने का खतरा काफी अधिक हो सकता है। हालांकि, ये अनुमान सिर्फ अध्ययनों पर आधारित हैं और अभी भी इस रोग के कारणों व जोखिम कारकों का पता लगाने के लिए शोध किए जा रहे हैं। इसलिए अभी इसके सटीक कारणों व जोखिम कारकों की पुष्टि नहीं की जा सकती है।

पार्किंसंस रोग की रोकथाम

डॉक्टर व रिसर्चर पार्किंसंस डिजीज के सटीक कारण का अभी तक पता नहीं लगा पाए हैं और न ही इस बारे में अभी तक कोई जानकारी मिल पाई है, कि यह रोग हर व्यक्ति को अलग तरीके से प्रभावित क्यों करता है। इसलिए अभी तक यह भी साफ नहीं हो पाया है कि पार्किंसंस रोग की रोकथाम कैसे की जा सकती है। हालांकि, एक्सपर्ट्स यह मानते हैं कि स्वस्थ जीवनशैली की आदतें अपनाना और संतुलित आहार लेना मस्तिष्क को स्वस्थ रखने में मदद कर सकता है।

पार्किंसंस रोग का इलाज

पार्किंसंस रोग का कोई स्थायी इलाज नहीं है और यह व्यक्ति को जीवनभर झेलना पड़ता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि आपको इलाज कराने के लिए जाना ही नहीं चाहिए। पार्किंसंस रोग के लिए कई अलग-अलग प्रकार के ट्रीटमेंट ऑप्शन उपलब्ध हैं, जिनकी मदद से इसके लक्षणों और गंभीरता को कम किया जा सकता है। पार्किसंस डिजीज एंड मूवमेंट डिसऑर्डर सोसायटी की सीईओ डॉक्टर मारिया बैरेर्टो के अनुसार पार्किंसंस रोग से ग्रसित व्यक्ति को दवाओं के साथ-साथ अन्य अलग-अलग प्रकार उपचार तरीकों की भी आवश्यकता पड़ती है। पार्किंसंस रोग के इलाज में निम्न को शामिल किया जाता है -

दवाएं


पार्किंसंस रोग के इलाज में एक निश्चित स्तर तक दवाएं काम कर सकती हैं, लेकिन, जैसे-जैसे व्यक्ति की उम्र बढ़ती हैं तो दवाएं पार्किंसंस रोग के लक्षणों को नियंत्रित करना धीरे-धीरे कम करके बंद कर देती हैं। पार्किंसंस रोग का इलाज करने के लिए आमतौर पर निम्न दवाएं दी जाती हैं -

  • लेवाडोपा - पार्किंसंस रोग के लक्षणों को नियंत्रित करने के लिए लेपाडोपा को सबसे प्रभावी दवा माना जाता है और इस रोग में ज्यादातर मामलों में सबसे पहले यही दवा दी जाती है।

  • डोपामाइन एगोनिस्ट - डोपामाइन एगोनिस्ट्स दवाएं पार्किंसंस रोग के लक्षणों को कम करने और मस्तिष्क की कार्य प्रक्रिया को सामान्य रूप से चलने में मदद करती है।

  • मोनो एमाइन ऑक्सीडेज बी (MAO-B) इनहिबिटर - यह दवा डोपामाइन को छोटे टुकड़ों में टूटने से बचाती है। हालांकि, इस दवा से मतली और उल्टी जैसे लक्षण भी हो सकते हैं।

  • सीओएमटी इनहिबिटर्स - इन दवाओं का इस्तेमाल पार्किंसंस रोग के लक्षणों को लंबे समय तक निंयत्रित करने के लिए किया जाता है। हालांकि, इससे गंभीर लक्षणों को नियंत्रित नहीं किया जा सकता है।

  • एंटीकोलिनर्जिक - पार्किंसंस रोग के कारण हो रही अंगों की कंपन को रोकने के लिए एंटीकोलिनर्जिक का इस्तेमाल किया जाता है।

  • अमैंटेडाइन - पार्किंसंस रोग के शुरुआती चरणों में कुछ माइल्ड लक्षणों को नियंत्रित करने के लिए अमैंटेडाइन का इस्तेमाल किया जा सकता है।


सर्जरी


अगर दवाओं की मदद से पार्किंसंस रोग के लक्षणों को नियंत्रित नहीं किया जा रहा है या फिर रोग गंभीर चरणों में पहुंच गया है, तो ऐसी स्थिति में लक्षणों को नियंत्रित करने के लिए कुछ प्रकार की सर्जरी व अन्य थेरेपी करने पर विचार किया जा सकता है, जिनमें निम्न शामिल हैं -

  • डीप ब्रेन स्टीमुलेशन (DBS) - इस प्रक्रिया में सर्जरी की मदद से न्यूरोट्रांसमीटर नामक के दो उपकरणों को सर्जरी की मदद से सीने में इंप्लांट कर दिया जाता है। ये उपकरण आवश्यकता के अनुसार सटीक रूप से मस्तिष्क के दोनों तरफ इलेक्ट्रिकल सिग्नल भेजते रहते हैं। ये सिग्नल मस्तिष्क के उन सिग्नल को रोक कर रखते हैं, जो पार्किंसंस रोग के लक्षण पैदा करते हैं।


सर्जरी के अलावा कुछ अन्य थेरेपी भी की जा सकती हैं, जो पार्किंसंस रोग के लक्षणों से निपटने के लिए मरीज की मदद करती हैं। इनमें मुख्य रूप से फिजियोथेरेपी, ऑक्युपेश्नल थेरेपी और स्पीच एंड लैंग्वेज थेरेपी (SLT) आदि शामिल हैं।

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