आयुर्वेदिक तरीके से पार्किंसंस का इलाज
Parkinson disease treatment in ayurveda in hindi: आयुर्वेद की मदद से पार्किंसंस का उपचार किया जा सकता है। कुछ हर्ब्स भी पार्किंसस रोग (Herbs to cure parkinson's disease) के लक्षणों को कम करने में मदद करते हैं।
उम्र बढ़ने के साथ-साथ बीमारियां होने का खतरा भी बढ़ता रहता है। वृद्धावस्था में कुछ लोगों का स्वास्थ्य अपेक्षाकृत स्वस्थ रह सकता है, जबकि अन्य लोगों को नई-नई बीमारियों के साथ अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इन्हीं में से एक परेशानी को पार्किंसंस रोग (Parkinson's Disease) कहा जाता है। पार्किंसंस रोग एक ऐसा विकार है, जो मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है। यह विकार ज्यादातर बुजुर्ग व्यक्तियों को ही होता है, लेकिन यह कम कम उम्र वाले लोगों को भी प्रभावित कर सकता है। दरअसल, पार्किंसंस रोग उन कोशिकाओं को प्रभावित करता है, जो शरीर के हिलने-ढुलने की कार्य प्रक्रिया (मोटर फंक्शन) को प्रभावित करती हैं। इस कारण से व्यक्ति को सामान्य रूप से शारीरिक हलचल करने में दिक्कत होने लगती है। पार्किंसंस पुरुषों और महिलाओं दोनों को बराबर रूप से प्रभावित करता है, हालांकि, भारत के आंकड़ों की बत करें तो पुरुषों की तुलना में महिलाओं में यह अधिक देखा जाता है।
शरीर के अंगों में कंपन (या हिलना), अकड़न और हलचल धीमी होना पार्किंसंस रोग के प्रमुख लक्षण हैं और इन्हें मोटर सिंपटम भी कहा जाता है। मोटर लक्षणों को अलावा पार्किंसंस रोग से कुछ अन्य लक्षण भी विकसित हो सकते हैं, जैसे शारीरिक मुद्रा को सीधा न रख पाना, धीमी आवाज में बोलना, मलमूत्र त्यागने में दिक्कत और रात को सो न पाना आदि। पार्किंसंस रोग की एक यह भी विशेषता है कि इससे ग्रसित व्यक्ति को महसूस हो रहे लक्षणों में रोजाना बदलाव होते रहते हैं और कई बार हर घंटे उसके लक्षण बदल जाते हैं। पार्किंसंस रोग से कुछ लक्षण ऐसे भी होते हैं, जो हर व्यक्ति के स्वास्थ्य व उसे हुई अन्य बीमारियों पर निर्भर करते हैं जैसे -
पार्किंसंस रोग का निदान करने के लिए कोई विशिष्ट टेस्ट उपलब्ध नहीं हैं। हालांकि, ऐसे कई टेस्ट हैं जिनकी मदद से पार्किंसंस रोग जैसे न्यूरोलॉजिकल का पता लगाने में मदद मिल सकती है। पार्किंसंस रोग का निदान न्यूरोलॉजिस्ट द्वारा की जाती है, जो मरीज को महसूस हो रहे लक्षणों और अन्य शारीरिक परीक्षणों के आधार पर इस रोग का निदान शुरू करते हैं। यदि मरीज को लगता है कि व्यक्ति पार्किंसंस रोग से ग्रसित है, तो स्थिति की पुष्टि करने के लिए कुछ प्रकार के इमेजिंग टेस्ट व अन्य परीक्षण किए जा सकते हैं।
शरीर में तंत्रिका कोशिकाएं (Nerve cells) डोपामाइन नामक एक खास केमिकल जारी करती हैं, जो शरीर की हलचल को नियंत्रित करने में मस्तिष्क की मदद करता है। पार्किंसंस रोग से ग्रसित लोगों में ये कोशिकाएं क्षतिग्रस्त होने लगती हैं, जिससे जिससे मस्तिष्क शरीर की हलचल को सामान्य रूप से नियंत्रित नहीं कर पाता है। जब न्यूरोन्स धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त होने लगते हैं, जो डोपामाइन पर्याप्त मात्रा में बन नहीं पाता है और मस्तिष्क की कार्य करने की क्षमता धीमी पड़ जाती है। लेकिन, अभी तक इस बात का पूरी तरह से पता नहीं चल पाया है कि न्यूरोन्स किस कारण से नष्ट होने लग जाते हैं। हालांकि, कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस रोग में न्यूरोन्स नष्ट होने के पीछे का कारण कुछ जीन (गुणसुत्रों) में गड़बड़ी हो सकती है।
पार्किंसंस रोग पर किए गए कुछ अध्ययनों के अनुसार जिन लोगों के परिवार में किसी व्यक्ति को पहले से ही पार्किंसंस रोग है, तो उन्हें भी यह रोग होने का खतरा हो सकता है। वहीं अगर किसी व्यक्ति के मता-पिता या सगे भाई-बहन में से किसी को पार्किंसंस रोग है, तो उसे पार्किंसंस रोग होने का खतरा काफी अधिक हो सकता है। हालांकि, ये अनुमान सिर्फ अध्ययनों पर आधारित हैं और अभी भी इस रोग के कारणों व जोखिम कारकों का पता लगाने के लिए शोध किए जा रहे हैं। इसलिए अभी इसके सटीक कारणों व जोखिम कारकों की पुष्टि नहीं की जा सकती है।
डॉक्टर व रिसर्चर पार्किंसंस डिजीज के सटीक कारण का अभी तक पता नहीं लगा पाए हैं और न ही इस बारे में अभी तक कोई जानकारी मिल पाई है, कि यह रोग हर व्यक्ति को अलग तरीके से प्रभावित क्यों करता है। इसलिए अभी तक यह भी साफ नहीं हो पाया है कि पार्किंसंस रोग की रोकथाम कैसे की जा सकती है। हालांकि, एक्सपर्ट्स यह मानते हैं कि स्वस्थ जीवनशैली की आदतें अपनाना और संतुलित आहार लेना मस्तिष्क को स्वस्थ रखने में मदद कर सकता है।
पार्किंसंस रोग का कोई स्थायी इलाज नहीं है और यह व्यक्ति को जीवनभर झेलना पड़ता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि आपको इलाज कराने के लिए जाना ही नहीं चाहिए। पार्किंसंस रोग के लिए कई अलग-अलग प्रकार के ट्रीटमेंट ऑप्शन उपलब्ध हैं, जिनकी मदद से इसके लक्षणों और गंभीरता को कम किया जा सकता है। पार्किसंस डिजीज एंड मूवमेंट डिसऑर्डर सोसायटी की सीईओ डॉक्टर मारिया बैरेर्टो के अनुसार पार्किंसंस रोग से ग्रसित व्यक्ति को दवाओं के साथ-साथ अन्य अलग-अलग प्रकार उपचार तरीकों की भी आवश्यकता पड़ती है। पार्किंसंस रोग के इलाज में निम्न को शामिल किया जाता है -
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पार्किन्सन रोग (What is parkinson's disease) एक न्यूरोडिजेनरेटिव डिसॉर्डर है, जिसके लक्षण बहुत धीरे-धीरे काफी समय में अभिव्यक्त होते हैं। इसमें मरीज की मोटर स्किल्स पर असर पड़ता है, क्योंकि इस रोग में सेंट्रल नर्वस सिस्टम प्रभावित होता है।
पार्किन्संस रोग के प्रमुख लक्षणों को अगर देखें तो कंपकंपी, शरीर में जकड़न, सुस्ती लगना और चलने फिरने में संतुलन बनाने में परेशानी आती है। पार्किन्संस रोग जब बढ़ने लगता है तो लोगों में स्ट्रेस और डिप्रेशन की भी शिकायत हो जाती है।
पार्किन्संस रोग हो या कोई अन्य बीमारी हर इंसान यही चाहता है कि वह बीमारी का शिकार न बनें। किसी भी बीमारी का शिकार बनने से अगर बचना है तो आपनी डेली लाइफ में खान-पान को जरूर ध्यान देना होता है। एक्सपर्ट्स की मानें तो इंसान का खान-पान उसे सिर्फ मजबूत शरीर और ऊर्जा ही नहीं देता बल्कि उसे कई तरह के रोगों से बचाता भी है।
पार्किंसंस रोगियों के लिए विशेषज्ञों द्वारा ऐसी कोई खास और विशेष आहार नहीं बताई गई है, लेकिन दिमाग के साथ-साथ संपूर्ण सेहत को बनाए रखने के लिए पार्किंसंस के मरीजों को अधिक से अधिक साबुत अनाज, सब्जियां, फल, दूध, डेयरी प्रोडक्ट्स, मांस और बीन्स जैसे प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थों को भोजन में शामिल करना चाहिए।
पार्किंसंस डिजीज से ग्रस्त लोगों को पवनमुक्तासन का अभ्यास जरूर करना चाहिए। इसके साथ ही उत्तानपादासन, धनुरासन, शलभासन, भुजंगासन, नौकासन, विपरीतकरणी, गोमुखासन, पश्चिमोत्तानासन और शवासन का प्रतिदिन अभ्यास करने से पार्किंसंस रोग के लक्षणों में कमी आती है।
पार्किंसंस रोग के कुछ प्रमुख लक्षणों में हाथों, बाहों, पैरों, जबड़े और चेहरे पर कंपकंपी होना प्रमुख है। इसमें चाल धीमी होने के अलावा मरीज को चलने और संतुलन बनाने में परेशानी होती है। बीमारी जब बढ़ने लगती है तो लोग अवसाद और डिमेंशिया के भी शिकार होने लगते हैं। World Parkinson's Day पर जानते हैं इसके मुख्य कारण और इलाज।
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ज्यादा तनाव और नशे की लत से भी बढ़ जाती है यह बीमारी ।
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