पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर में दोगुना हो जाता है ओवेरियन कैंसर का जोखिम, जानें बचाव के उपाय

वे महिलाएं जो किसी भी वजह से पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर की शिकार रहीं, उनमें ओवरी कैंसर का जोखिम दो गुना तक बढ़ जाता है, वह भी बहुत आक्रामक तरह का कैंसर।

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Written By: Yogita Yadav | Published : September 7, 2019 11:18 AM IST

कैंसर रिसर्च में प्रकाशित अध्‍ययन में दावा किया गया है कि पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD health hazards) और ओवेे‍रियन कैंसर का आपस में गहरा संबंध है। जिन महिलाओं ने किसी भी वजह से पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर यानी पीटीएसडी (PTSD health hazards) का सामना किया है, उनमें ओवरी कैंसर होने का जोखिम दोगुना हो जाता है। यह भी देखने में आया कि उनमें कैंसर का यह प्रकार अतिआक्रामक रहा है। ऐसे में इस तनाव से ग्रस्‍त लोगों के प्रति स्‍वास्‍थ्‍य नजरिया और अधिक सतर्क कर लेने की जरूरत है।

क्‍या है पीटीएसडी (PTSD health hazards) 

पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD) एक मेंटल हेल्थ से जुड़ी समस्या है जो किसी ऐसी भयानक घटना से उत्पन्न होती है जिसे व्यक्ति ने खुद अनुभव किया होता है या देखा होता। इन घटनाओं में सड़क दुर्घटना, ऊंचाई से गिरना, खोना, कहीं फंसना जैसी स्थितियां शामिल हैं। इस डिसऑर्डर के लक्षणों में फ्लैशबैक, घटना से जुड़े सपने आना, हाई ऐंग्जाइटी लेवल और घटना के बारे में लगातार विचार शामिल हैं जिससे साधारण रूप से जीवन जीना मुश्किल हो जाता है। खासतौर से भारतीय महिलाओं में शादी अथवा तलाक से जुड़े खराब अनुभव भी इसमें शामिल किए जा सकते हैं।

क्‍या कहता है शोध (PTSD health hazards) 

"कैंसर रिसर्च" पत्रिका में प्रकाशित अध्‍ययन में कहा गया है कि जिन महिलाओं ने अपने जीवनकाल में कभी भी पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर या पीटीएसडी के छह या अधिक लक्षणों का अनुभव किया, उनमें अन्‍य महिलाओं की तुलना में ओवेरियन कैंसर के विकास का जोखिम दो गुना तक बढ़ जाता है। इस स्थिति में यह आक्रामक किस्‍म का कैंसर होता है। पर फि‍र भी अगर प्रारंभिक स्‍तर पर ही इसे पकड़ लिया जाए, तो सर्वाइवल की संभावना 90 प्रतिशत तक हो सकती है।

क्‍या है पीटीएसडी के लक्षण (PTSD health hazards) 

  • पीटीएसडी से पीड़ित होने पर व्यक्ति चिड़चिड़ा हो जाता है, उसकी एकाग्रता की क्षमता प्रभावित होती है जिससे सामान्य चीजें करने और सोचने में उसे परेशानी आती है।
  • पीड़ित व्यक्ति सोशल सर्कल से कटने लगता है, उसे घुलने-मिलने में दिक्कत आती है।
  • कई स्थितियों में व्यक्ति खुद को नुकसान पहुंचाने की भी कोशिश करता है ताकि वह घटना व उससे जुड़ी यादों से छुटकारा पा सके।
  • डिसऑर्डर के कारण व्यक्ति को सोने में दिक्कत आने लगती है क्योंकि उसके दिमाग में लगातार घटना संबंधी विचार चलते रहते हैं। इससे उसकी मानसिक सेहत पर बुरा असर डालता है।
  • यह उसे डिप्रेशन की स्थिति में भी पहुंचा सकता है।

संभव है उपचार

इस बीमारी का इलाज मनोवैज्ञानिक द्वारा ही किया जा सकता है। यह इलाज लंबे समय तक या फिर जिंदगीभर चल सकता है। इस दौरान मरीज के ट्रीटमेंट के लिए काउंसलिंग, हिप्नोसिस और दवाइयों का सहारा लिया जाता है।

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