
मुकेश शर्मा
मुकेश शर्मा दिल्ली यूनिर्विसिटी से जर्नलिज्म डिग्री होल्डर हैं और पिछले 8 साल से Health Journalism से जुड़े हुए ... Read More
Heart disease causes in women: हृदय से जुड़ी बीमारियां जैसे कार्डियोवैस्कुलर डिजीज (सीवीडी) आदि के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं और असमय मृत्यु के प्रमुख कारणों में से एक बना हुआ है। हार्ट से जुड़ी बीमारियां पुरुषों और महिलाओं दोनों को ही प्रभावित करती हैं और यह किसी भी उम्र में हो सकती हैं। हालांकि, इसके बावजूद भी हार्ट से जुड़ी बीमारियों का निदान, इलाज व बचाव आमतौर पर जेंडर के आधार पर किया जाता है। देखा गया है कि हृदय के स्वास्थ्य या बीमारियों से जुड़े मामलों में महिलाओं को ज्यादा चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ये चुनौतियां महिलाओं के लिए हार्ट डिजीज से जुड़ी बीमारियों का खतरा लगातार बढ़ा रहा है। दिल्ली के इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल में कार्डियोलॉजी एंड कार्डियो थोरेसिक सर्जरी और कंसल्टेंट डॉक्टर वरुन बंसल ने महिलाओं और हार्ट डिजीज के बीच संबंध से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बाते बताई, इस लेख के माध्यम से हम ये सभी जानकारी आपके साथ साझा कर रहे हैं।
महिलाओं और पुरुषों दोनों में ही हार्ट डिजीज विकसित होने के लक्षण अलग-अलग हो सकते हैं और इस कारण से कई बार हार्ट डिजीज के शुरुआती लक्षणों का पता लगाना या उनका निदान करना काफी मुश्किल हो जाता है। पुरुषों की तुलना में महिलाओं में सीवीडी देर से विकसित होता है और उनके लक्षण असामान्य हो सकते हैं। जबकि सीने में दर्द पुरुषों के लिए एक सामान्य लक्षण है, महिलाओं को अक्सर सांस की तकलीफ, थकान, मतली और गर्दन, पीठ या जबड़े में दर्द जैसे सूक्ष्म लक्षणों का अनुभव होता है। ये अंतर गलत निदान या विलंबित निदान का कारण बन सकते हैं, जिससे महिलाओं को हृदय संबंधी जटिलताओं का अधिक खतरा होता है।
हार्ट अटैक या हार्ट से जुड़ी अन्य बीमारियों को आमतौर पर पुरुषों की बीमारी ही समझा जाता था और इसलिए महिलाओं में हार्ट डिजीज से जुड़ी जांच बहुत ही कम हो पाती थी। वर्तमान में भी देश के कई हिस्सों में लोग हार्ट से जुड़ी बीमारियों का खतरा सिर्फ पुरुषों में ही समझते हैं। यह भी एक प्रमुख कारण है कि महिलाओं मे हार्ट से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ता जा रहा है।
महिलाओं के शरीर में एस्ट्रोजन हार्मोन हृदय की सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी कारक है और शरीर से भी काफी करीब से संबंधित है। हालांकि, रजोनिवृत्ति के दौरान, जब एस्ट्रोजन का स्तर कम हो जाता है, तो महिलाएं हृदय रोग के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाती हैं। हार्मोन में किसी भी तरह का बदलाव रक्त वाहिका के कार्य को प्रभावित कर सकता है।
कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार महिलाएं की उम्र पुरुषों से ज्यादा होती है और औसत महिलाएं पुरुषों से ज्यादा साल जीती हैं। ज्यादा उम्र बढ़ना भी हार्ट से जुड़ी बीमारियों के खतरे को बढ़ाता है। बुजुर्ग महिलाओं में हार्ट डिजीज का खतरा ज्यादा रहता है, जिसकी विशेष रूप से देखभाल करना जरूरी है।
कुछ हृदय संबंधी जोखिम कारक, जैसे उच्च रक्तचाप और मधुमेह, महिलाओं को अलग तरह से प्रभावित करते हैं। चिकित्सकों को इन अंतरों के बारे में जागरूक होने और तदनुसार रोकथाम और प्रबंधन रणनीतियों को समायोजित करने की आवश्यकता है।
अध्ययनों से पता चलता है कि महिलाओं में हार्ट से जुड़ी बीमारियों के कारण डॉक्टर से दिशा निर्देश-आधारित उपचार लेने की संभावना बहुत कम है। यही कारण है कि समय पर और सही उपचार न मिल पाने के कारण हार्ट से जुड़ी बीमारियों के कारण महिलाओं में मृत्यु का खतरा बढ़ जाता है।
इस अवधारणा को दूर करना बहुत जरूरी है कि महिलाओं में हार्ट से जुड़ी बीमारियां नहीं होती हैं। सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियानों के माध्यम से इस बात पर जोर देना चाहिए की हार्ट से जुड़ी बीमारियों का खतरा पुरुषों और महिलाओं में समान रूप से हो सकता है। इसलिए सिर्फ पुरुषों को ही नहीं बल्कि महिलाओं को भी समय-समय पर डॉक्टर से जांच कराते रहना चाहिए।
महिलाओं में भी यदि किसी भी प्रकार के हार्ट से जुड़े लक्षण महसूस हो रहे हैं, तो उसकी जल्द से जल्द जांच करा लेनी चाहिए। वहीं जो महिलाएं मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज या फिर किसी हार्ट डिजीज से ही पीड़ित है, तो समय-समय पर डॉक्टर से स्क्रीनिंग कराते रहना चाहिए।
स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं को हृदय रोग से पीड़ित महिलाओं के लिए उनके अद्वितीय जोखिम कारकों और जरूरतों को ध्यान में रखते हुए व्यक्तिगत उपचार योजनाएं विकसित करनी चाहिए। इसमें जीवनशैली में बदलाव, दवा प्रबंधन और आवश्यकता पड़ने पर सर्जिकल हस्तक्षेप पर ध्यान केंद्रित करना शामिल है।