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Written By: Jitendra Gupta | Published : February 14, 2022 9:42 AM IST
हार्ट फेल्योर के इलाज में 'दवा' नहीं ये तरीके भी बचा सकते हैं आपकी जान! जानें कितनी उम्र से स्क्रीनिंग कराना है जरूरी
हार्ट फेल्योर उन कुछ ह्रदय समस्याओं में से एक है, जिसके कारण पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा जान गंवाते हैं। हार्ट फेल्योर जैसी स्थिति से बचने के लिए आपको अपनी डेली लाइफ रूटीन में बदलाव करने की जरूरत होती है। लेकिन हाल ही में एक्सपर्ट ने बताया है कि हार्ट फेल्योर जैसी स्थिति से बचने के लिए सिर्फ दवाएं ही काम नहीं आती हैं। जी हां, अंग्रेजी के एक अखबार द्वारा आयोजित किए गए वेबिनार में देश के जानें-मानें एक्सपर्ट्स ने इस बात का खुलासा किया है। आइए जानते हैं क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स।
त्रिरूची स्थित कावेरी हार्टसिटी में इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट, चीफ कंसल्टेंट एस. अरविंदकुमार ने वेबिनार के दौरान कहां कि हार्ट फेल्योर जैसी स्थिति से जूझ रहे लोगों में सांस की तकलीफ, अनियमित धड़कान और थकान जैसे आम लक्षण दिखाई देते हैं।
उन्होंने कहा कि अगर हार्ट फेल्योर जैसी स्थिति का सही तरीके से इलाज नहीं किया गया तो ये स्थिति समय-समय के साथ-साथ और भी तेजी से बिगड़ती जाती है। उन्होंने कहा कि हमारी सभी एडवांस हार्ट फेल्योरतकनीक उन लोगों पर काम करती हैं, जिसमें लक्षण कम होते हैं और धीरे-धीरे बढ़ रहे होते हैं। हमारा काम उन लोगों की जिंदगियां बचाना होता है, जो बहुत ज्यादा बीमार होते हैं।
एक्सपर्ट की मानें तो दवाइयां रोग से संबंधित खतरे को 20 से 30 फीसदी तक कम कर देती हैं लेकिन ये हर हार्ट फेल्योर का इलाज नहीं हो सकती है। हमें दवाओं से आगे बढ़ने की जरूरत है और यही एडवांस हार्ट फेल्योर का उपचार है। इनमें से कुछ तरीके हैंः
1-एंजीयप्लास्टी
2-कोरोनरी आर्टरी बाइपास ग्राफ्ट
3-वॉल्व सर्जरी
4-वॉल्व रिप्लेसमेंट
5-पेसमेकर
एक्सपर्ट का कहना है कि हर डॉक्टर और हर मरीज को इन सभी प्राथमिक तरीकों और उपचार के बारे में पता होना चाहिए और उन्हें इसके लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। अगर किसी व्यक्ति को अचानक हार्ट फेल्योर जैसी स्थिति का सामना करना पड़ता है, जो किसी भी तरह का हो सकता है फिर चाहे वो हार्ट अटैकहो या फिर वॉल्व रोग तो हमारे पास बहुत सी दवाएं हैं, जो उपचार में काम आती हैं। अगर इनसे काम नहीं बन रहा है तो हमें दूसरे विकल्पों को तलाशना होता है।
एक्सपर्ट बताते हैं कि देश में डायबिटीज और हार्ट अटैक की दर बढ़ रही है और उसके साथ ही बढ़ रही है देश में युवा रोगियों की संख्या भी इसलिए स्क्रीनिंग को 30 साल की उम्र से शुरू कर देना चाहिए। अगर आपका पारिवारिक इतिहास रहा है तो आपको सालाना स्वास्थ्य जांच करानी चाहिए।