कोई भी काम पूरा न कर पाना हो सकता है अवसाद का लक्षण

लोगों से बातचीत और पढ़ाई में भी परेशानी महसूस करते हैं ऐसे बच्‍चे ।

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Written By: Yogita Yadav | Updated : September 3, 2018 1:27 PM IST

अवसाद से पीड़ित बच्चों में सामाजिक और एकेडेमिक कौशल में कमी की छह गुना अधिक संभावना होती है। ऐसे बच्चों को लोगों से बातचीत और पढ़ाई में परेशानी हो सकती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि छह से 12 वर्ष तक की आयु के तीन प्रतिशत बच्चों में अवसाद की समस्या हो सकती है लेकिन माता-पिता तथा शिक्षक बच्चों में अवसाद को आसानी से नहीं पहचान पाते।

अमेरिका के मिसौरी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर कीथ हर्मन ने कहा कि जब आप शिक्षकों और माता-पिता को बच्चों में अवसाद का स्तर मापने के लिए कहते हैं तो आम तौर पर उनकी रेटिंग में 5-10 प्रतिशत का अंतर होता है। उन्होंने कहा कि उदाहरण के तौर पर शिक्षक को यह पता हो सकता है कि बच्चे को कक्षा में दोस्त बनाने में परेशानियां आ रही हैं लेकिन शायद माता-पिता घर में इस बात पर ध्यान न दे सके हों।

क्‍या कहता है अध्‍ययन

शोधकर्ताओं ने इस अध्ययन के लिए प्राथमिक स्कूल के 643 बच्चों के प्रोफाइल का विश्लेषण किया। उन्होंने बताया कि पढ़ाई में 30 प्रतिशत बच्चों में अवसाद का हल्के से ज्यादा अनुभव हुआ लेकिन माता-पिता और शिक्षक अक्सर बच्चों में अवसाद को पहचानने में विफल हो जाते हैं। हर्मन ने पाया कि जिन बच्चों में अवसाद के संकेत पाए गए, उनमें अपनी उम्र के अन्य बच्चों के मुकाबले कौशल की कमी की छह गुना ज्यादा आशंका होने की बात सामने आई।

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क्‍या कहते हैं आंकड़ें

अगर खुशी के मौके पर आप खुश नही हो पाते और बेहद गमगीन मौका भी आपको दुखी न कर पाता हो तो आपको सतर्क होने की ज़रूरत है। डॉक्टर कहते हैं कि ये अवसाद यानी डिप्रैशन के लक्षण हैं।

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विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के आँकड़ों के मुताबिक दुनिया भर में लगभग 35 करोड़ लोग अवसाद ग्रस्त हैं। इनमें भी तीन-चौथाई से अधिक लोग विकासशाल देशों में रहते हैं। भारत में करीब पांच करोड़ लोग इससे पीड़ित माने जाते हैं।

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कैसे पहचानें अवसाद को

  • ज़्यादातर समय उदास और मन डूबा हुआ महसूस करना।
  • दैनिक गतिविधियों को पूरा करने में अनिच्छा और कठिनाई।
  • दिन भर थकान और सुस्ती। पहले जिन चीज़ों में मन लगता था, उनसे मन ऊब जाना, आनंद महसूस न कर पाना।
  • ध्यान केंद्रित करने में, सोचने में और फ़ैसला करने में कठिनाई। ऐसे बच्‍चे यह भी तय नहीं कर पाते कि उनकी हॉबी क्‍या है और उन्‍हें क्‍या करना चाहिए।
  • आत्मविश्वास और आत्म सम्मान में कमी।
  • अपने बारे में, जीवन के बारे में और भविष्य को लेकर नकारात्मक ख़्याल।
  • भूख न लगना, ज़्यादा खा लेना।
  • स्‍कूल से अनुपस्थित रहने लगना या स्‍कूल में अटेंटिव न रहना।
  • भविष्य को लेकर निराशा की भावना।
  • नींद में गतिरोध, नींद न आना।

ऐसे करें बचाव

अगर किसी बच्‍चे में उपरोक्‍त में से कुछ लक्षण नजर आ रहे हों, तो उन्‍हें तुरंत मनोचिकित्‍सक के पास ले जाना चाहिए। वे बताते हैं कि ऐसे बच्‍चों के साथ आपको कैसा व्‍यवहार करना है। बाल मनोविशेषज्ञ में इससे में ज्‍यादा मददगार साबित हो सकते हैं। पेरेंट्स और टीचर का व्‍यवहार इसमें बहुत अहम भूमिका निभा सकता है।

इसमें दवाओं की भी आवश्‍कता पड़ सकती है। उचित देखभाल और काउंसलिंग से अवसाद से छुटकारा पाया जा सकता है।

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