छोटे शहरों में बदलेगी हेल्थकेयर की तस्वीर, अब लोकल स्तर पर मिलेगा हार्ट केयर

इंडियन एकेडमी ऑफ इकोकार्डियोग्राफी के डॉ. राकेश गुप्ता का कहना है कि भारत कार्डियोलॉजी विशेषज्ञों की बढ़ती और गैर-रिपोर्टेड कमी का सामना कर रहा है, जबकि भारत में हार्ट की बीमारियां सिर्फ बुजुर्ग ही नहीं बल्कि युवाओं की मौत का कारण बन रही है।

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Written By: Ashu Kumar Das | Published : May 1, 2026 8:21 AM IST

देश में बढ़ते हार्ट के मरीजों की संख्या को देखते हुए इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू) के पीजीडीसीसी (पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन क्लिनिकल कार्डियोलॉजी) को राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (एनएमसी) से आधिकारिक मान्यता दे दी गई है। इस कोर्स को मान्यता मिलने के बाद टियर-2 और टियर-3 शहरों में हार्ट का इलाज करवाने वाले मरीजों को बड़ी उम्मीद मिल सकती है। इंडियन एकेडमी ऑफ इकोकार्डियोग्राफी के डॉ. राकेश गुप्ता का कहना है कि भारत कार्डियोलॉजी विशेषज्ञों की बढ़ती और गैर-रिपोर्टेड कमी का सामना कर रहा है, जबकि भारत में हार्ट की बीमारियां सिर्फ बुजुर्ग ही नहीं बल्कि युवाओं की मौत का कारण बन रही है। उन्होंने कहा- 140 करोड़ से अधिक की आबादी को सेवाएं देने के लिए हमारे पास 5,000 से 6,000 से भी कम प्रशिक्षित कार्डियोलॉजिस्ट हैं। इसका मतलब है कि लगभग 2 से 3 लाख लोगों पर एक कार्डियोलॉजिस्ट है। इसके विपरीत, विकसित देशों में अक्सर यह अनुपात 20 से 30 हजार पर एक के करीब होता है। इस कोर्स को मान्यता मिलने के बाद भारत के टायर- 3 और टायर 3 सिटी में हार्ट के मरीजों को बेहतर इलाज मिल पाएगा।

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क्या बदल जाएगा छोटे शहरों में?

डॉ. कपिल खन्ना एमडी (फिजिशियन), पीजीडीसीसीपी (एनआई) बताते हैं कि भारत में हार्ट की बीमारी इन दिनों मौत का सबसे बड़ा कारण बन चुका है और समस्या टियर-2 व टियर-3 शहरों में तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में इस कोर्स की मान्यता से कई बड़े फायदे सामने आएंगे। इसमें प्रमुख रूप से शामिल होंगे।

1. विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी होगी कम

अब एमबीबीएस डॉक्टर इस विशेष डिप्लोमा के जरिए कार्डियोलॉजी में प्रशिक्षित हो सकेंगे। इससे छोटे शहरों में भी हार्ट के मरीजों को विशेषज्ञ जैसी देखभाल मिल पाएगी।

2. समय पर बीमारी की पहचान

स्थानीय स्तर पर ही डॉक्टर हार्ट की बीमारी का पता लगा सकेंगे। इस कोर्स की मदद से छोटे शहरों में रहने वाले डॉक्टरों को शहरों के बड़े अस्पताल पर बीमारी की पहचान और टेस्ट के लिए निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।

3. रेफरल में देरी होगी कम

डॉक्टर बताते हैं कि वर्तमान में हार्ट अटैक या हार्ट स्ट्रोक के जो भी मामले सामने आते थे, उसमें पहले मरीजों को देर से बड़े अस्पताल भेजा जाता था, जिससे स्थिति गंभीर हो जाती थी। लेकिन अब स्पेशलिस्ट डॉक्टर समय रहते सही इलाज या रेफरल कर सकेंगे। इससे न सिर्फ हार्ट की बीमारी का इलाज समय पर हो पाएगा, बल्कि हार्ट अटैक और स्ट्रोक के कारण होने वाली मौतों का आंकड़ा भी घटेगा।

4. बड़े अस्पतालों पर दबाव कम होगा

बेहतर ट्राइएज (प्राथमिक जांच और प्रबंधन) से केवल गंभीर मामलों को ही बड़े अस्पतालों में इलाज के लिए भेजा जाएगा। इससे हेल्थ सिस्टम पर पड़ने वाला अतिरिक्त दबाव कम करने में मदद मिलेगी।

5. प्रिवेंटिव केयर को बढ़ावा

डॉक्टर अब हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और अन्य जोखिम कारकों को शुरुआती स्तर पर ही मैनेज कर सकेंगे, जिससे हार्ट अटैक के मामलों में कमी आ सकती है।

क्यों है यह फैसला अहम?

भारत में 140 करोड़ की आबादी के मुकाबले सिर्फ 5-6 हजार कार्डियोलॉजिस्ट हैं, और इनमें से 80% बड़े शहरों में केंद्रित हैं। ऐसे में छोटे शहरों के मरीजों को सही समय पर इलाज नहीं मिल पाता। यह नया कदम इस असमानता को कम करने की दिशा में एक बड़ा समाधान माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस कार्यक्रम का विस्तार किया जाता है, तो हर साल हजारों प्रशिक्षित डॉक्टर तैयार हो सकते हैं। इससे आने वाले 5-10 सालों में टियर-2 और टियर-3 शहरों में हृदय रोग के इलाज की पहुंच और गुणवत्ता दोनों में बड़ा सुधार देखने को मिल सकता है।

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